मुंह बोली माँ… (कहानी)

रात गहरा रही थी। आकाश में चांद आज अभी तक नहीं दिखा था, तारों का दामन अभी पूरा फैल भी नहीं पाया था। शाम का धुंधलका पूर्णतः सिमट कर अपने घर जा चुका था, मगर सागर की लहरें किनारे से ऐसे टकरा रही थी मानो कोई बात न सुलझ पाने पर मन में क्रोध भरा रहता हो!

पेड़ों की छाया भी काले वर्ण की होकर सागर के पानी पर एक छवि बना रही थी।मन के एक पटल पर बार-बार एक बात आ जा रही थी कि पानी खारा होने पर भी ये गगनचुंबी पेड़ों पर आने वाले नारियल का पानी और गिरी इतनी मीठी कैसे होती है! बस इन्हीं विचारों में उलझी स्मिता न जाने कब से सागर किनारे बैठी थी कि याद आया कल मां का खत आया था और मैं रात देर से आकर थक जाने के कारण न पढ़ पाई थी और खाना भी ज्यों की त्यों मेज पर ही रखा रह गया था।

स्मिता ने तुरंत अपना पर्स खोला और वो लिफाफा निकाला,पत्र खोला तो चौंक गई। यह राइटिंग तो मां की नहीं थी। फिर पढ़ना शुरू किया –

बेटी स्मिता,
कैसी हो? बहुत प्रतीक्षा रहती है तुम्हारे आने की मगर समझती हूं कि इतनी दूर से आना इतना आसान नहीं। पिछले दिनों से मेरी तबियत खराब रहने लगी है,स्वयं का काम भी कर पाना असंभव हो गया है। आश्रम की सरिता बहिनजी बहुत अच्छी हैं, इनका साथ पाकर मैं सच धन्य हो गई हूं। आज मेरा मन बहुत रो रहा है, न जाने क्यूं। तुम मुझे उस दिन न मिलती तो मेरा क्या होता, बस यही सोचकर।

बिटिया! यह पत्र कुछ खास वजह से लिख रही हूं। तुम्हारे द्वारा दिये गये प्यार से मेरा ये जीवन संवर गया है। शायद तुम जानना चाहोगी,ये कैसे? बस तुम्हें पाकर।मगर तुमने कभी भी यह जानने की इच्छा न रखी! कहते हैं न ईश्वर किसी को भी किसी से विशेष कारण से ही मिलाता है। तुम मुझे जीवन के उस मोड़ पर मिली जहां कुछ भी हो सकता था। आज एक राज़ की बात बताना चाह रही हूं। तुम्हारे द्वारा आश्रम में छोड़कर जाने के बाद मेरी यहां बहुत अच्छे-से देखभाल की गई, उससे मेरी स्मृति लौट आई थी। मेरे दो बेटे थे, बड़ा तो बहुत पहले ही विदेश जाकर बस गया था, उसके बाद उसने कभी खबर न ली। दूसरे बेटे की शादी से पहले ही मेरे पति चले गए थे, अतः बेटे की शादी के उपरांत आने वाली बहू ने बड़ी सावधानी से सारा जमा पैसा बेटे के नाम करवा लिया। मेरे से घर का सारा काम करवाती और मुझे सताती भी। बेटे को मेरे कमरे में न आने देती थी।

बेटी! पहले उसने मुझे एक समय ही खाना देना शुरू किया,उसके बाद कभी देती, कभी नहीं। बहुत सुनाती और अपशब्द कहती। बेटे के दिमाग पर तो मानो कोई जादू ही कर दिया था,वो इधर झांकता भी नहीं था। उसे जब किसी काम से सात दिन के लिए बाहर जाना पड़ा तो बहू ने मुझे खाना तो छोड़ पानी भी न पीने दिया। मैंने प्रयास किया तो मुझे धक्के देकर घर से निकाल दिया। इस अवस्था में भूखी-प्यासी सड़क पर ढंग से चल भी न पा रही थी कि मुझे बहुत चक्कर आने लगे। मैं धड़ाम से गिरती, उससे पहले सामने आती गाड़ी से टकराई।

उसके बाद क्या हुआ…. कुछ याद नहीं। जब होश आया तो इस आश्रम में लेटे पाया। बिटिया! तुमने मुझे जीवन दिया है,मैं कैसे तुम्हारे उपकार को चुका सकूंगी। तुम कब आओगी? बहिनजी बता रही थी कि तुम रोज फोन करती हो। पहले मैं खत लिख लेती थी तो मन हल्का हो जाता था और तुमसे बात भी हो जाती थी। जबसे स्वास्थ्य खराब रहने लगा है, बस दवा का नशा रहता है तुम समय से पूरा पैसा भी भेजती रहती हो और फल-दवा सबके बारे में पूछताछ भी करती रहती हो। शायद ये हमारा कोई पूर्व जन्म का रिश्ता रहा होगा,मैं यही सोचती हूं। अपने आने की खबर देना, मुझे! मैं तुम्हें देखना चाहती हूं, साथ ही अपनी ममता को अपने हाथों तुम पर लुटाना चाहती हूं।
तुम्हारी मुंह बोली मां

स्मिता की आंखें एक झरने की भांति बह रही थी। मगर आज उन्हें रोकने वाला भी कौन था। गजब है ईश्वर की लीला भी। एक मां जन्म देकर भी मुझे स्वीकार न सकी और एक मां ने जन्म न देकर भी मुझे अपना लिया। आज मैं किसी को मां कह सकती हूं और एक मां मुझे बिटिया कह सकती है।

जिंदगी में शायद इससे बड़ा दिन और सुख कुछ नहीं हो सकता है। यह बात आज मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं। जिस अभाव को मैंने आज तक जिया, ना जाने कितनी बार रोई, बिलखी-तड़पी हूं उस क्षण को अब नहीं खोने देना चाहती हूं। संभवतः उस मां की पुकार के कारण ही मेरा मन भी इतना विचलित है। अब रुकना आसान नहीं है,मेरे लिए। अब मुझे जाना ही होगा, स्मिता तय कर चुकी थी। वह वहां से उठकर कमरे की ओर चल दी, आज उसके पैर नहीं रूक रहे थे। उसने सबसे पहले इस्तीफा लिखा और अपने सामान की ओर निहारने लगी। आज रात की कालिमा में मानो भोर की किरण पर्दे की ओट से झांक रही थी।

समय से स्मिता का इस्तीफा मंजूर हो गया था और टिकट भी कंफर्म हो गया था। विदेश की धरती पर पैसा कमाने हेतु आने वाला हर शख्स जानता है कि यहां प्रेम या लगाव का अंश होने मात्र भी नहीं है। अतः आवश्यक सामान लेकर स्मिता हवाई अड्डे की ओर जा रही थी। आज पच्चीस वर्ष बाद मुझे कोई मेरा अपना कहने वाला होगा, यह सोचकर उसकी आंखें तर होने के साथ खिलते फूल की भांति खुशी भी तलाश रही थी। सभी कार्यवाही पूर्ण करने के बाद हवाई जहाज में बैठते हुए उसे वह पल याद आ रहा था जब वह अपने शहर से विदेश के लिए जिस कार में आ रही थी, उस कार के अचानक रूकने पर उसने कार चालक से कहा-

आपने इतनी तेज ब्रेक क्यों लगाए हैं, क्या हुआ?
मैड़म! कोई एक्सीडेंट हुआ है अभी और एक महिला कराह रही है! कार चालक ने कहा।

इतने में स्मिता दरवाजा खोल बाहर भागी और उस महिला को लेकर सीधे अस्पताल गई। अस्पताल से ही उसने अपने परिचित आश्रम की दीदी को फोन कर दिया था। संभव होता तो वह स्वयं ही रूक जाती, मगर फ्लाइट का समय हो रहा था। संतोष बहिनजी ने सब संभाल लिया था और बहुत सेवा भी की। आज उन्हीं के कारण मुझे मां मिल सकी है। पैदा होने के साथ ही जननी के द्वारा पालने में छोड़ी गई, फिर आश्रम में ही पली-बढ़ी स्मिता का संतोष बहिनजी से काफी प्रेम हो गया था। यूं तो संतोष बहिनजी निराश्रित महिलाओं के आश्रम की संरक्षिका थी, मगर उनका यहां भी आना-जाना लगा रहता था।

स्मिता की आंखें नम हो गई थी, जब उसे मां को इस हालत में छोड़कर जाना पड़ा था। मगर बड़ी मेहनत से मिली नौकरी हेतु उसने जाना ही उचित समझा था।वह डाक्टर और बहिनजी से निरंतर संपर्क में रही। दुर्घटना के बाद कई दिन तक उन्हें स्मृति नहीं थी कि वे कौन और कहां हैं?

स्मिता ने जब भी बहिनजी से बात की, बस यही कहा कि उन्हें पूर्ण संरक्षण दिया जाये। वे कुछ समय बाद यही पूछती रही कि मुझे यहां कौन लाया है? बहिन जी ने कहा-आपकी बेटी स्मिता को अचानक बाहर जाना पड़ा था तो किसके पास छोड़ती, इसलिए यहां छोड़ गई थी। हम सबके साथ आपका मन लग जाएगा, वो जल्द ही आएगी।
फिर वे खत भी लिखने लगी थी। हर बार बस यही कि बेटी!कब आ रही हो? अपने विगत को याद करके घंटों का सफर मिनटों में सिमट गया था एक रील की भांति हर दृश्य आंखों के सामने घूम रहा था। इसके साथ ही बरसती आंखें न जाने कब नींद के आगोश में चली गई थी। खराब मौसम के कारण लगे झटके से वह जाग उठी। सावधान होने की घोषणा बार-बार की जा रही थी, उससे उसका मन आशंका से भर गया, कहीं ऐसा न हो कि….

लगभग दस मिनट तक यही रहा, इतने ही समय में सभी यात्रियों के मन में उठी हलचल को बयां करना असंभव था। सभी ईश्वर को याद कर रहे थे और अब धन्यवाद कि सबको बचा लिया। पूरे पंद्रह घंटों के बाद घोषणा की जा रही थी कि आप सुरक्षित अपनी धरती को स्पर्श करने जा रहे हैं। स्मिता के मन की गति को समझ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था

रिश्ते हमें बहुत कुछ देते हैं तो लेते भी हैं, मगर ये रिश्ता नि:स्वार्थ दोनों को नया जीवन देने वाला था। स्मिता ने दिल्ली उतरकर सामान लिया और अपने शहर के लिए टैक्सी बुक की और चल दी।

हर घंटा काश मिनट में सिमट जाए यही तमन्ना।

तीन घंटे बाद टैक्सी आश्रम के बाहर खड़ी थी। स्मिता ने संतोष बहिनजी को सूचित कर दिया था। बहिनजी कार का हॉर्न सुनकर दरवाजा खोलने आ गई थी। स्मिता ने सामान उतारा और कार चालक को रूपए देकर रवाना किया। स्मिता आज आश्रम को भरी आंखों से निहार रही थी क्योंकि वह आश्रम नहीं, मायका बन चुका था। संतोष जी ने उसे माला पहनाकर स्वागत किया तो वह उनके गले लगकर रो पड़ी।

अरे,! ये तुम्हारा घर है स्मिता! अब तुम यहां ही रहोगी। आओ! अपनी मां से मिलो,वो बहुत इंतजार कर रही हैं तुम्हारा।

स्मिता को कुछ नहीं सूझ रहा था। आज तक आश्रम की दीदी को ही मां कहती आई थी। सब उन्हें मां कहते थे। समझ आने पर यह तो समझ आ गया था कि सबकी मां एक नहीं होती है। पर आज सिर्फ वह एक मां जो मुझे बेटी कह सकती है, आखिर मन धीरज भी कैसे धरता।

बहिनजी ने उसे उसकी मुंहबोली मां के सामने ले जाकर कहा- मधु सुनो! देखो! तुम्हारी बेटी आ गई आज! वो उनींदी अवस्था में उठी और आंखें खोल देखने लगी। इतने में स्मिता उनसे लिपट गई और दोनों भावुक हो कर रोने लगीं। (मधु नाम आश्रम के द्वारा दिया गया था) आज मधु को बेटी और स्मिता को मां मिल गई थी।

पूरे आश्रम की बहिनें उस अद्भुत दृश्य को नम आंखों से निहार रही थी। सभी ने स्मिता पर पुष्प वर्षा की और स्नेह दिया। मधु अपनी बेटी स्मिता को सिर पर हाथ रख बहुत आशीर्वाद दे रही थी, साथ ही बहुत प्यार भी कर रही थी, कभी निहारती तो कभी उसकी बलैया लेती। उनका हालचाल पूछा। मां के आंचल में कितना सुकून होता है, वह उस अहसास को हर पल महसूस कर रही थी। मां से मिलकर स्मिता ने सभी को बताया कि अब वह यहीं रहकर सबकी सेवा करने का प्रण ले चुकी है। सभी ने करतल ध्वनि से उसका और उसके निर्णय का स्वागत किया।

कल्पना गोयल, जयपुर

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