पश्चिम बंगाल में बदलाव; ‘इंडिया’ से बांग्लादेश तक सहमा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपनी सरकार बना ली है, जो दशकों पुरानी तृणमूल कांग्रेस की सत्ता को समाप्त करने वाला ऐतिहासिक कदम है। इस बदलाव ने न केवल राज्य की सीमाओं को पार किया है, बल्कि पूरे देश और पड़ोसी बांग्लादेश तक हलचल मचा दी है। विपक्षी दलों के नेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों तक सबकी चिंता बढ़ गई है। मुस्लिम समुदाय के कुछ मौलाना और कट्टरपंथी तत्व सदमे में हैं, जबकि ‘इंडिया’ गठबंधन से लेकर बांग्लादेश तक संसद से सड़क तक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। जबकि बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना जैसी प्रमुख हस्तियां बंगाल में बीजेपी की जीत पर खुशी जता रही हैं, वहीं ममता बनर्जी हार के गम में डूबी हुई हैं। यह बदलाव राज्य की राजनीति को नई दिशा और सोच दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी की जीत ने कांग्रेस और गांधी परिवार को सबसे ज्यादा झटका दिया है। लंबे समय से पश्चिम बंगाल को वामपंथी और उसके बाद तृणमूल के गढ़ के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन अब भाजपा का उदय विपक्ष की एकजुटता को चुनौती दे रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इस हार को लेकर चुप्पी साध ली है, लेकिन उनके करीबी सर्कल में चर्चा है कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की रणनीति प्रभावित होगी। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की है कि यह जीत अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ जनादेश है, लेकिन आंतरिक रूप से वे चिंतित हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में भी भाजपा मजबूत हो रही है।

राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव ने इसे बिहार के लिए खतरे की घंटी बताया है। वे मानते हैं कि पश्चिम बंगाल का मॉडल बिहार में मुस्लिम-यादव गठजोड़ को कमजोर कर सकता है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से बयान दिया कि भाजपा की जीत विकास के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का परिणाम है। केजरीवाल की पार्टी, जो खुद अल्पसंख्यक समर्थन पर निर्भर है, अब पंजाब और दिल्ली में अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो गई है। बुद्धिजीवी वर्ग, जो लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति का समर्थन करता रहा, अब असहज है। टीवी डिबेट्स में वे भाजपा की जीत को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं, लेकिन जनता का जनादेश उनके तर्कों को कमजोर कर रहा है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 27 प्रतिशत है, जो तृणमूल की जीत का प्रमुख आधार रही। भाजपा की सरकार बनने से कई मौलाना और कट्टरपंथी नेता स्तब्ध हैं। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में, जहां मुस्लिम बहुल इलाके हैं, वहां अब चिंता की लहर है। कुछ मौलाना ने फतवे जारी करने की धमकी दी है, जबकि मदरसों में बैठकें हो रही हैं। वे डर जता रहे हैं कि भाजपा की नीतियां उनके प्रभाव को कम करेंगी। वास्तव में, भाजपा ने चुनाव में हिंदू एकजुटता के साथ-साथ विकास और सुशासन का एजेंडा चलाया, जिससे अल्पसंख्यक वोट बंट गए। तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले नेता अब अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर हैं। यह बदलाव लंबे समय से चली आ रही सांप्रदायिक संतुलन को तोड़ सकता है।

सबसे चौंकाने वाली बात है पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत पर बांग्लादेश का मातम। सत्ता परिवर्तन का असर सीमा पार बांग्लादेश ही नहीं, पाकिस्तान में भी दिख रहा है। बांग्लादेश की संसद में विपक्षी नेता पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार को अपने देश के लिए खतरा बता रहे हैं। वे दावा कर रहे हैं कि इससे अवैध घुसपैठ और सीमा विवाद बढ़ेंगे। ढाका की सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, जहां नारे लगाए जा रहे हैं कि भाजपा की सरकार बांग्लादेशी हितों के खिलाफ है। बांग्लादेश की वर्तमान सरकार, जो शेख हसीना के बाद आई है, इस बदलाव से असहज है। उनका मानना है कि ममता बनर्जी की सरकार बांग्लादेश के साथ नरम रुख रखती थी, जबकि भाजपा कठोर रवैया अपनाएगी। नागरिकता कानून और घुसपैठ के मुद्दे पर अब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह हंगामा आंतरिक राजनीति का हिस्सा है, जहां पश्चिम बंगाल का मुद्दा बांग्लादेशी विपक्ष अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रहा है। उधर, भारत में शरणार्थी जीवन जी रही बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना इस सत्ता परिवर्तन से बेहद प्रसन्न हैं। उन्होंने निजी बातचीत में कहा कि भाजपा की जीत उनके लंबे संघर्ष को मजबूती देगी। हसीना का मानना है कि ममता बनर्जी की सरकार ने बांग्लादेशी कट्टरवादियों को संरक्षण दिया था, जो अब समाप्त होगा। वहीं, ममता बनर्जी हार के सदमे से उबर नहीं पा रही हैं। कोलकाता के निवास पर वे चुपचाप बैठी रहती हैं, जबकि उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस सड़कों पर चुनावी धांधली के आरोप लगा रही है। वे राज्यपाल के खिलाफ मोर्चा खोल रही हैं और अदालतों में याचिकाएं दायर कर रही हैं। ममता की पार्टी के कार्यकर्ताओं में भटकाव है, कई विधायक भाजपा की ओर झुक रहे हैं। यह स्थिति तृणमूल के भविष्य को अनिश्चित बना रही है।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनने से राज्य में नई ऊर्जा आई है। नए मुख्यमंत्री ने विकास, बेरोजगारी हटाओ और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का वादा किया है। सिंदूर सहायता योजना और दुर्गा पूजा को राष्ट्रीय उत्सव का दर्जा देने जैसे कदम पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं तृणमूल का विरोध, मुस्लिम बहुल इलाकों में तनाव और बांग्लादेश सीमा पर दबाव। फिर भी, भाजपा का राष्ट्रीय एजेंडा राज्य को केंद्र के करीब लाएगा। केंद्रीय योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा, जैसे आयुष्मान भारत और पीएम आवास। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत 2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मजबूत बनाएगी। विपक्ष को अब नई रणनीति बनानी होगी, जहां तुष्टिकरण के बजाय विकास पर जोर देना पड़ेगा। इस सत्ता परिवर्तन ने न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि भारतीय राजनीति की धरती हिला दी है। जहां एक ओर खुशी की लहर है, वहीं चिंता और विरोध की धाराएं बह रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना रोचक होगा कि भाजपा कैसे इन चुनौतियों का सामना करती है। कुल मिलाकर, जनता ने बदलाव चुना है, जो लोकतंत्र की ताकत दिखाता है।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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