जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर जीत हासिल करने वाले उमर अब्दुल्ला को एक सीट छोड़नी पड़ेगी। संभावना है कि वे गांदरबल सीट अपने पास रखेंगे और बडगाम सीट छोड़ देंगे। सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि गांदरबल सीट उमर के लिए भावनात्मक रूप से खास है, यही से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई थी। यह सीट अब्दुल्ला परिवार के लिए भी खास महत्व रखती है, क्योंकि उनके पिता डॉ. फारूक अब्दुल्ला और दादा शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भी यहां से चुनाव जीत चुके हैं।
ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो उमर अब्दुल्ला इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने का प्रयास करेंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि उनके परिवार और करीबी सहयोगियों ने भी उन्हें यही सलाह दी है। अब यह देखना बाकी है कि उमर कब इस पर फैसला लेंगे। 1962 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अब्दुल सलाम ऐतु, 1967 और 1972 में कांग्रेस के मोहम्मद मकबूल भट, 1977 में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, 1983, 1987 और 1996 में डॉ. फारूक अब्दुल्ला, 2002 में पीडीपी के काजी मोहम्मद अफजल, 2008 में उमर अब्दुल्ला और 2014 में इश्फाक अहमद शेख ने इस सीट से जीत हासिल की थी।
2024 में उमर अब्दुल्ला ने 10,574 वोटों से जीत दर्ज कर पीडीपी के बशीर अहमद मीर को हराया, जिन्हें 22,153 वोट मिले थे। उमर ने कुल 32,727 वोट प्राप्त किए। उनके इस कदम के कारण बडगाम में उपचुनाव की जरूरत होगी और इस सीट के लिए उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर अटकलें चल रही हैं। चूंकि उमर नई सरकार का नेतृत्व करने की तैयारी में हैं, राजनीतिक विश्लेषक इसे गांदरबल में उनकी पार्टी के समर्थन आधार के साथ रणनीतिक तालमेल के रूप में देख रहे हैं।
उमर अब्दुल्ला का जन्म 10 मार्च 1970 को फारूक अब्दुल्ला और दादा शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के घर हुआ था। राजनीतिक परिवार से होने के कारण उमर का झुकाव बचपन से ही राजनीति की ओर था। उन्होंने 1998 में 28 साल की उम्र में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और 12वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र के सदस्य बने। 1998-99 में वे परिवहन और पर्यटन समिति तथा पर्यटन मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य रहे। 1999 में वे 13वीं लोकसभा के लिए फिर से चुने गए। 54 वर्ष की उम्र में उमर अब्दुल्ला दूसरी बार प्रदेश के 14वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं।
उमर अब्दुल्ला की बडगाम सीट छोड़ने की संभावना, गांदरबल सीट रखेंगे अपने पास






