1962 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत तो बेशक हुई थी मगर जवाहरलाल नेहरू के मन में कुछ खटक रहा था।उन्हें लगता था कि कुछ और बेहतर किया जा सकता था।पंडित जी को कांग्रेस कार्यकर्ताओं से ये भी शिकायत मिल रही थी कि सत्ता के मद में चूर नेताओं ने गाँवों-कस्बों में जाना बेहद कम कर दिया है।लगातार सत्तारूढ़ रहने का ये स्वाभाविक दुष्परिणाम था।कांग्रेस की बैठक में जवाहरलाल ने ये मुद्दा उठाया था कि कैसे गाँवों और कस्बों में रहनेवाले गरीबों तक पार्टी की पहुंच बने।यद्यपि कांग्रेस ने 1962 के आम चुनाव में 488 सीटों में से 361 सीटों पर विजय हासिल की थी।नेहरू दूरदृष्टा थे और उन्होंने समझ लिया था कि यही हाल रहा तो कांग्रेस पार्टी आम जनमानस से दूर हो जाएगी।
1962 में हीं चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था, देश युद्ध के लिए तैयार नहीं था,खासकर जवाहरलाल नेहरू।उन्हें अंत तक ये उम्मीद थी कि चीन बार्डर से वापस लौट जाएगा मगर हुआ ऐसा नहीं।1962 के युद्ध में भारत की बुरी तरह हार हुई और चीन ने भारत के बडे भूभाग को अपने कब्जे में ले लिया।कांग्रेस के भीतर और बाहर नेहरू के विदेश नीति पर सवाल उठने लगें थे।जनता ने खूलकर सवाल पूछने शुरू कर दिये थे।नेहरू बैकफुट पर थे और सरकार के वित्तमंत्री मोरारजी देसाई ने जनता पर विभिन्न कर लगा दिये थे जिससे जनता में रोष था।जनता ने अपना रोष 1964 में हुऐ तीन लोकसभा उपचुनाव में दिखाया और तीनों सीट कांग्रेस हार गई।
संकट की इस घडी में के.कामराज ने नेहरू को एक प्लान सुझाया जिसपर नेहरू समेत सभी वरिष्ठ नेता सहमत थे,वही प्लान आगे चलकर “कामराज प्लान” कहलाया।इस फार्मूले के अनुसार कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सरकार में अपने पद छोड़कर पार्टी के लिए काम करना चाहिए।इस प्लान को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने मंजूरी दे दी और दो महीने के अंदर यह लागू हो गया।इस प्लान के जनक के.कामराज ने स्वंय 02 अक्टूबर,1963 को मद्रास के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।उसके बाद वरिष्ठ नेता बीजू पटनायक और एस.के.पाटिल समेत छह मुख्यमंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया।केन्द्रीय मंत्री मोरारजी देसाई, लालबहादुर शास्त्री और जगजीवन राम समेत छह वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों ने अपने पद छोडकर संगठन में काम करना शुरू कर दिया।
के.कामराज जमीन से जुडे नेता थे और उन्होंने अपने मुख्यमंत्री काल में तमिल शिक्षा के ऊपर बहुत काम किये थे।वे नाडार जाति के थे और ये जाती तमिलनाडु में बेहद गरीब और पिछडा माना जाता था।वे तमिलनाडु के तीन बार मुख्यमंत्री बने और 1963 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने जो उन दिनों प्रधानमंत्री के बराबर का पद माना जाता था।उनके बारे में कहा जाता था कि वे आगे के हालत बेहतर ढंग से समझ लेते थे।कामराज प्लान लाना उनकी दूरदर्शी सोच हीं थी।यद्यपि 1967 के चुनाव में कांग्रेस को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिली।कांग्रेस ने 1967 के चुनाव में 516 सीटों में केवल 283 सीटें हीं जीत पाई मगर कांग्रेस ने काफी हद तक आमजनमानस का गुस्सा थामने में कामयाब रही।जीत हार के बहुत से फैक्टर होते हैं, इंदिरा गांधी को सिंडिकेट से पूरा सहयोग नहीं मिल रहा था।आपसी खींचातानी के बीच इतनी भी सफलता बहुत थी।कामराज प्लान को उस समय वक्त की जरूरत के हिसाब से देखा गया था जो सही भी था।
इंदिरा गांधी पर ये भी आरोप लगे कि नेहरू के आखिरी दिनों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को ठिकाने लगाने के लिए इंदिरा ने हीं इस प्लान को अंजाम दिया था।हलांकि इंदिरा गांधी ने इन आरोपों का कई बार खंडन भी किया था।मैं नहीं समझता के.कामराज जैसे बोल्ड और वरिष्ठ नेता से इंदिरा गांधी जैसी जुनियर नेता कुछ ऐसा काम करा सकतीं थीं।के.कामराज का कद नेहरू के आसपास का था और वे बेहद गंभीर और संजीदगी से राजनीति करते थे।सिंडिकेट की नींव कामराज और मोरारजी देसाई ने रखी थी जो आगे चलकर इंदिरा गांधी के गले की फांस बन गई थी।
के.कामराज के योगदान को देखते हुए सरकार ने 1976 में मरणोपरांत “भारतरत्न” से नवाजा था।
जहाँ तक मैंने अध्यन्न किया है मैं कामराज प्लान को सफल मानता हूँ।अगर वरिष्ठ नेता पद इस्तीफा देकर संगठन में काम नहीं करते, जनता के बीच नहीं रहते तो पराजय भयावह होती ये तो तय था।कांग्रेस के पुनर्निर्माण में “कामराज प्लान” मील का पत्थर साबित हुआ था।
अजय श्रीवास्तव





