उत्तराखंड में गढ़वाल की 6150 फीट ऊँचीं पहाडियों पर बसा जोशीमठ कस्बे के पतन की दास्तां 24 दिसंबर 2009 को हीं मुक्कमल कर दी गई थी जब विष्णुगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए खोदी जा रही टीबीएम मशीन ने एक प्राकृतिक जलश्रोत को पंचर कर दिया था।साफ पानी के जलश्रोत में छेद होने से लंबे समय तक रोज 6 से 7 करोड़ लीटर पानी बहने लगा।डैमेज कंट्रोल के बहुत सारे उपाय किये गए मगर पानी रोकने में एनटीपीसी नाकाम रही।पानी का बहना तभी रूका जब वो जलभंडार खाली हो गया।यह जलभंडार अलकनंदा नदी के बाएं किनारे पर खडे पहाड़ के तीन किलोमीटर अंदर था।
उत्तराखंड के पर्यावरणविद और स्थानीय नागरिकों ने एनटीपीसी द्वारा बनाये जा रहे “विष्णुगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट” को तत्काल रोकने के लिए सरकार से कई बार गुहार लगाई मगर खादीधारी और नौकरशाहों के कानों पर जूं नहीं रेंगी।लोगों ने मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट का हवाला दिया मगर मलाई खा रहे नेता-अधिकारी-माफियाओं के सिंडिकेट ने सब अनसुना कर दिया।गौरतलब है कि सन् 1976 में गढ़वाल के तत्कालीन कमिश्नर महेशचंद्र मिश्रा के नेतृत्व में सरकार ने एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई थी,जिसे जोशीमठ में बार बार हो रहे लैंडस्लाइड के कारणों का पता लगाना था और उसके रोकथाम के उपाय सुझाने थे।मिश्रा जी और उनकी पूरी टीम ने लैंडस्लाइड के हर एक पहलू का वैज्ञानिक कारण पता किया और अपनी रिपोर्ट में निर्माण कार्यों पर पूरी तरह से रोक लगाने की सिफारिश की थी।साथ हीं कहा था कि बहुत जरूरत हो तो पूरी रिसर्च के बाद हीं इसे किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि इरैटिक बोल्डर को डिस्टर्ब न किया जाय नहीं तो परिणाम घातक हो सकते हैं।इस रिपोर्ट में सीधे तौर पर बडे कंस्ट्रक्शन और ब्लास्टिंग नहीं करने की सलाह दी गई थी।सरकार ने मिश्रा कमेटी की सुझाव को ठंडे बस्ते में डाल दिया और बड़े पैमाने पर निर्माण की अनुमति दे दी।
गढ़वाल मंडल में विधुतीकरण के लिए “विष्णुगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट” की मंजूरी दी गई।यह एनटीपीसी का प्रोजेक्ट है और इसकी क्षमता 520 मेगावाट है।एनटीपीसी को 130 मेगावाट की चार यूनिट तैयार करनी है।इसकी लागत 2978.50 करोड़ है।आननफानन में प्रोजेक्ट की फीजिबिलिटी 2002 के अंत में की गई और 14 फरवरी 2005 में इसका शिलान्यास कर दिया गया।तब के केंद्रीय ऊर्जामंत्री पीएम सईद और मुख्यमंत्री नरायण दत्त तिवारी ने इसका शिलान्यास किया था।
आपको बता दें विष्णुगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट “रन आँफ रिवर” हाइड्रोक्लोरिक प्रोजेक्ट है यानी इसमें नदी के पानी को बांध बनाकर स्टोर नहीं किया जाएगा,बल्कि बैराज के जरिए तेज ढ़लान वाली सुरंगों से गुजरने वाले पानी की ताकत से बिजली बनेगी।प्रोजेक्ट का बैराज 200 मीटर लंबा और 22 मीटर ऊँचा होगा।बैराज में पानी का बहाव कंट्रोल करने के लिए चार गेट होंगे।12 किलोमीटर लंबी ये निर्माणाधीन सुरंग सेलम नाम की जगह से शुरू होती है जो तपोवन तक जाएगी।इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर अब तक सिर्फ आठ किलोमीटर तक काम हुआ है।फिलहाल इस टनल का काम रोक दिया गया है।
24 दिसंबर 2009 की घटना के बाद उत्तराखंड स्पेज एप्लिकेशन सेंटर के निदेशक प्रोफेसर एमपीएस विष्ट ने एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि प्राकृतिक रूप से जमा पानी के इस तरह बह जाने से बड़ी आपदा का अंदेशा है।सुरंग से निकलने वाले पानी की वजह से आसपास के झरने सूख जाएंगे।अचानक और बडे पैमाने पर पानी बहने से क्षेत्र में जमीनें तेजी से धंसना शुरू हो सकती है।इससे जोशीमठ का अस्तित्व खतरे में पड सकता है।प्रोफेसर एमपीएस विष्ट ने यह रिपोर्ट तैयार की थी।उन्होंने इस रिपोर्ट को डिजास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर उत्तराखंड को भेजा था मगर इस रिपोर्ट को भी नजरअंदाज कर दिया गया।
जोशीमठ की जमीन धंसने के अन्य भी कारण है।यह शहर एक नाजुक पहाडी के ढ़लान पर बसा है।जोशीमठ चारों ओर से नदियों से घिरी पहाडी के बीच में स्थित है।पूरब में ढ़कनाला,पश्चिम में कर्मनाशा,उत्तर में अलकनंदा और दक्षिण में धौलीगंगा नदियां बहती हैं।नदियों के कटाव के कारण चट्टानें कमजोर और भुरभुरी हो गई हैं।जो जमीन धंसने का एक महत्वपूर्ण कारण दिखता है।वरिष्ठ भूस्खलन वैज्ञानिक डाँ.स्वप्रनामित चौधरी का कहना है कि बदरीनाथ के उच्च हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली अलकनंदा और धौलीगंगा के संगम स्थल विष्णुप्रयाग में दोनों नदियां लगातार टो कटिंग कर रहीं हैं।विष्णुप्रयाग से हीं जोशीमठ का ढ़लान शुरू होता है।नीचे हो रहे कटाव के चलते जोशीमठ क्षेत्र का पूरा दवाब नीचे की तरफ हो रहा है।इसके चलते भू-धंसाव में बढोतरी हुई है।
जूलाँजिस्ट और डिपार्टमेंट आँफ फाँरेस्टरी रानीचौरी हेड आँफ डिपार्टमेंट एसपी सती कहते हैं कि जोशीमठ टूटे हुए पहाडों के जिस मलबे पर बसा है वह अब तेजी से धंस रहा है और अब इसे किसी भी तरह से रोका नहीं जा सकता है।माना जाता है कि जोशीमठ शहर मोरेन पर बसा हुआ है लेकिन यह सच नहीं है।जोशीमठ मोरेन पर नहीं बल्कि लैंडस्लाइड मटेरियल पर बसा हुआ है।मोरेन सिर्फ ग्लेशियर से लाए मटेरियल को कहते हैं,जबकि ग्रैविटी के चलते पहाडों के टूटने से जमा मटेरियल को लैंडस्लाइड मटेरियल कहते हैं।जोशीमठ शहर ऐसे हीं मटेरियल पर बसा हुआ है।
साल 1939 में एक किताब छपी जिसका नाम था “Central Himalaya Geological observation of the Swiss expedition”.इसके स्विस एक्सपर्ट और लेखक हैं प्रो.अर्नोल्ड हेम और प्रो.अगास्टो गैंसर।किताब में दोनों ने 84 साल पहले हीं लिखा था कि जोशीमठ लैंडस्लाइड के ढ़ेर पर बसा हुआ है।
जोशीमठ की कुल आबादी लगभग चालीस हजार के आसपास है।जिसमें बीस हजार स्थाई आबादी और बीस हजार सेना के जवान हैं।शहर में कुल 4500 इमारतें हैं जिसमें से 678 इमारतों को नुकसान हुआ है।सरकार खतरनाक हो चुकी मकानों से लोगों को निकालने का प्रयास कर रही है मगर वो अपने पुस्तैनी घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।उनका कहना है कि उनके घरों में उनके देवता रहते हैं।सरकार मुआवजा के रूप डेढ़ लाख दे रही है मगर उनका मानना है कि ये नाकाफी है।जोशीमठ के निवासियों ने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया है।मकानों की दरारें दिन-प्रतिदिन बढ़ हीं रही हैं।सरकार की पहली प्राथमिकता डेंजर हो चुके मकानों को ढ़हाना है जिसमें वो कामयाब होती नहीं दिख रही है।सरकार ने वहां के निवासियों को बसाने के लिए कुछ जगह भी चिन्हित किये हैं मगर अभी वो प्रारंभिक अवस्था में है।
धंसते हुए जोशीमठ को कैसे बचाया जाएगा ये किसी को समझ नहीं आ रहा।विशेषज्ञों का मानना है कि जोशीमठ कस्बे की जमीने अंदर से खोखली हो गई हैं और अब वहां कुछ भी उपाय करना संभव नहीं है।तथाकथित विकास के ऐवज में वहां के निवासी कितनी बड़ी कीमत चुका रहें हैं ये किसी से छूपा नहीं है।काश सरकार समय पर चेत गई होती तो एक ऐतिहासिक एंव धार्मिक शहर को मटियामेट होने से बचाया जा सकता था।
अजय श्रीवास्तव






