
गठबंधन टूटे, पार्टी रूठी, पर पद नहीं छूटा..
राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए एनडीए ने हरिवंश नारायण सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया, और उन्हें लगातार तीसरी बार इस महत्वपूर्ण पद पर चुना गया है। विपक्ष ने लोकसभा में उपाध्यक्ष पद रिक्त रहने और पर्याप्त परामर्श न होने का आरोप लगाते हुए चुनाव प्रक्रिया का बहिष्कार किया। ऐसे में शुक्रवार सुबह 11 बजे शुरू हुई कार्यवाही में हरिवंश को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। राज्यसभा में यह एक ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है, क्योंकि पहली बार किसी मनोनीत सदस्य को उपसभापति पद मिलने जा रहा है। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए हरिवंश नारायण सिंह के नाम पर विपक्ष ने आपत्ति जताई है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों का कहना है कि इस नामांकन को लेकर उनसे कोई सार्थक चर्चा नहीं की गई। साथ ही, भाजपा पर यह आरोप भी लगाया गया कि उसने पिछले सात वर्षों से लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद खाली रखा है। इसी कारण विपक्ष ने उपसभापति चुनाव से दूरी बनाने का निर्णय लिया। गौरतलब है कि हरिवंश नारायण सिंह 2018 से ही इस पद पर आसीन हैं और अब एक बार फिर मनोनीत सदस्य के रूप में इसे संभाल सकते हैं। ऐसे में उनके जीवन, करियर और राजनीतिक सफर को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
हरिवंश नारायण सिंह का जन्म 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनका पैतृक संबंध सारण के सिताब दियारा गांव से है, जो समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण का भी गांव रहा है। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की और वहीं से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा भी प्राप्त किया। छात्र जीवन में जयप्रकाश नारायण और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से वे गहराई से प्रभावित रहे और 1974 के जेपी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी भी निभाई। हरिवंश ने अपने करियर की शुरुआत बेहद साधारण स्तर से की, जहां उन्हें शुरुआती नौकरी में मात्र 500 रुपये मासिक वेतन मिलता था। 1977 में उन्होंने एक प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में काम शुरू किया और बाद में मुंबई जाकर धर्मयुग पत्रिका से जुड़े। 1981 से 1984 तक उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी के रूप में भी कार्य किया, लेकिन बाद में पत्रकारिता में लौट आए। चार दशकों से अधिक समय तक मीडिया जगत में सक्रिय रहने के बाद हरिवंश ने राजनीति में कदम रखा। रांची में एक प्रमुख अखबार के संपादक के रूप में उन्होंने 25 वर्षों से अधिक समय तक कार्य किया। इसी दौरान वे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त मीडिया सलाहकार भी रहे, जिससे उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत हुई। उनका राजनीति में प्रवेश अप्रत्याशित रहा। 2014 में बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया। खुद हरिवंश ने बताया था कि उन्हें इस निर्णय की जानकारी तब मिली जब नीतीश कुमार ने उन्हें फोन कर इसकी सूचना दी।
राजनीतिक सफर और उपलब्धियां
हरिवंश का राजनीतिक करियर उपलब्धियों से भरा रहा, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव भी आए। जिस जदयू ने उन्हें राज्यसभा भेजा, बाद में वही पार्टी एनडीए से अलग हो गई, लेकिन इसके बावजूद हरिवंश उपसभापति पद पर बने रहे।
- पहला कार्यकाल (2018): एनडीए उम्मीदवार के रूप में उन्होंने विपक्ष के बी.के. हरिप्रसाद को हराकर उपसभापति पद हासिल किया।
- दूसरा कार्यकाल (2020): पुनर्निर्वाचन के दौरान उन्होंने विवादास्पद कृषि विधेयकों की कार्यवाही का संचालन किया, जिस पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया।
- संवैधानिक दायित्वों को प्राथमिकता: 2022 में जदयू के एनडीए से अलग होने के बाद भी वे पद पर बने रहे। 2023 में नए संसद भवन के उद्घाटन में हिस्सा लेकर उन्होंने अपनी संवैधानिक भूमिका को पार्टी लाइन से ऊपर रखा।
तीसरा कार्यकाल और ऐतिहासिक उपलब्धि
9 अप्रैल 2026 को उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद, 10 अप्रैल को उन्हें पुनः राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। अब 17 अप्रैल 2026 को उनका लगातार तीसरी बार उपसभापति चुना जाना तय हो गया है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले मनोनीत सांसद बनने जा रहे हैं।




