सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धारा 6A उन लोगों को नागरिकता प्रदान करती है जो जुलाई 1949 के बाद भारत में आए थे, लेकिन नागरिकता के लिए आवेदन नहीं किया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 6A उन लोगों को नागरिकता देती है, जो 1 जनवरी 1966 से पहले भारत में प्रवासित हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की वैधता को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि धारा 6A उन लोगों को नागरिकता प्रदान करती है जो संविधानिक और ठोस प्रावधानों के तहत नहीं आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से कहा है कि वे असम में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान, पता लगाने और निर्वासन के लिए पूर्ववर्ती सर्बानंद सोनोवाल सरकार द्वारा एनआरसी को लेकर दिए गए निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करें। अब से सुप्रीम कोर्ट इस पहचान और निर्वासन प्रक्रिया की निगरानी करेगा। वास्तव में, 1985 के असम समझौते के तहत नागरिकता अधिनियम में धारा 6A जोड़ी गई थी, जिससे 1 जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच बांग्लादेश से आए प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान था। इस धारा के अनुसार, उन्हें नागरिकता प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना होता है। 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तिथि असम में बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए अंतिम तिथि तय कर दी गई थी।
हाल ही में, दिसंबर 2023 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था कि अवैध प्रवासियों का सटीक डेटा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वे गुप्त रूप से देश में आए थे। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6A की वैधता पर चार-एक के बहुमत से फैसला दिया, जिसमें जस्टिस जे पारदीवाला असहमत थे। उन्होंने इसे असंवैधानिक करार दिया। जबकि सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, एमएम सुंदरेश, और मनोज मिश्रा ने बहुमत में धारा 6A को सही ठहराया।
कोर्ट ने कहा कि असम में 40 लाख और पश्चिम बंगाल में 56 लाख प्रवासी हैं, लेकिन असम में इसका प्रभाव अधिक है। 1971 की कट-ऑफ तिथि तर्कसंगत है, क्योंकि ऑपरेशन सर्चलाइट के बाद पूर्वी पाकिस्तान से पलायन में वृद्धि हुई थी। कोर्ट ने कहा कि धारा 6A का उद्देश्य असम के निवासियों के अधिकारों को कमजोर किए बिना दीर्घकालिक समाधान प्रदान करना है। संसद को अलग-अलग शर्तें निर्धारित करने का अधिकार है, और धारा 6A को केवल इस आधार पर असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि यह पंजीकरण व्यवस्था का अनुपालन नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक नागरिक को भारत के कानून और संविधान का पालन करना आवश्यक है, और नागरिकता प्रदान करने से पहले निष्ठा की शपथ का अभाव कानून का उल्लंघन नहीं है। कोर्ट ने कहा कि धारा 6A का उद्देश्य सिर्फ 1971 से पहले आए प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करना है, और इसके बाद आए अवैध प्रवासियों को निर्वासन की अनुमति देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सिटीजनशिप एक्ट की धारा 6A की वैधता बरकरार





