अमेरिका को टैलेंट चाहिए, हम सिर्फ बेरोजगारों पर निर्भर नहीं रह सकते- ट्रंप

एच-1बी वीजा को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख दो महीने बाद नरम होता नजर आ रहा है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अमेरिका को विदेशी कुशल पेशेवरों की जरूरत है। जॉर्जिया राज्य का उदाहरण देते हुए ट्रंप ने बताया कि दुनिया में अमेरिका की बढ़त बनाए रखने के लिए विदेशी प्रतिभाओं का योगदान बेहद आवश्यक है।
अब तक सख्त रुख अपनाने वाले ट्रंप ने स्वीकार किया कि केवल लंबे समय से बेरोजगार बैठे लोगों पर निर्भर रहकर देश की इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उन्होंने कहा, “हमें अपने उद्योगों और रक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञ लोगों की जरूरत है। मैं यह मानता हूं कि अमेरिकी मजदूरों की तनख्वाह बढ़नी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही हमें विदेशी टैलेंट भी लाना होगा, ताकि अमेरिका आगे बना रहे।”

नई वीजा नीति में बदलाव
सितंबर में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत एच-1बी वीजा की आवेदन फीस में भारी बढ़ोतरी की गई। पहले जहां फीस 1,500 डॉलर थी, अब नए आवेदनों के लिए यह 1 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) कर दी गई है। यह नियम 21 सितंबर के बाद दाखिल किए गए सभी नए आवेदन या 2026 की वीजा लॉटरी में शामिल होने वालों पर लागू होगा। हालांकि, पुराने वीजा धारकों या पहले से दाखिल आवेदनों पर इसका असर नहीं पड़ेगा।

‘हर बेरोजगार को मिसाइल बनाना नहीं सिखाया जा सकता’
इंटरव्यू में जब ट्रंप से पूछा गया कि अमेरिका में पहले से ही कई प्रतिभाशाली लोग हैं, तो ट्रंप ने कहा, “ऐसा नहीं है। कुछ विशेष कौशल ऐसे हैं जो हमारे पास नहीं हैं। आप किसी बेरोजगार से सीधे यह नहीं कह सकते कि ‘अब चलो मिसाइल बनाना सीखो।’ इसके लिए अनुभव और प्रशिक्षण की जरूरत होती है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जॉर्जिया स्थित ह्युंडई बैटरी फैक्ट्री में जब दक्षिण कोरिया से आए कुशल मजदूरों को वापस भेजा गया, तो उत्पादन रुक गया। “बैटरियां बनाना बहुत जटिल और खतरनाक प्रक्रिया है। कोरियाई विशेषज्ञ अमेरिकी कर्मचारियों को सिखा रहे थे। जब उन्हें हटा दिया गया, तो पूरी व्यवस्था प्रभावित हो गई,”
उनका यह बयान उनके पुराने रुख से बिल्कुल विपरीत माना जा रहा है। पहले ट्रंप विदेशी कामगारों का विरोध करते थे और कहते थे कि इससे अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छिनती हैं। लेकिन अब वे खुद मान रहे हैं कि कई क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करने में वर्षों लगेंगे, इसलिए फिलहाल विदेशी विशेषज्ञों का सहयोग जरूरी है।

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