हिमाचल: बागवानों को राहत: अब वन भूमि से नहीं हटेंगे सेब के बगीचे-सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के लाखों सेब बागवानों को बड़ी राहत देते हुए वन भूमि पर लगाए गए फलदार बागों को हटाने संबंधी हिमाचल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह हाशिए पर पड़े वर्गों और भूमिहीन लोगों की सहायता के लिए केंद्र सरकार के समक्ष एक प्रस्ताव प्रस्तुत करे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को दूरगामी और गंभीर परिणाम वाला बताया। पीठ ने कहा कि इस तरह का आदेश पारित करना एक गंभीर भूल थी, जिसका सीधा असर समाज के कमजोर वर्गों और भूमिहीन लोगों पर पड़ता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह विषय नीतिगत दायरे में आता है और हाईकोर्ट को ऐसा आदेश नहीं देना चाहिए था, जिससे फलदार पेड़ों की कटाई सुनिश्चित हो। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वन भूमि पर अतिक्रमण को लेकर राज्य सरकार कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार एक कल्याणकारी राज्य की भावना को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव तैयार कर आवश्यक अनुपालन के लिए केंद्र सरकार को भेज सकती है। अदालत राज्य सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। साथ ही, पूर्व उप महापौर टिकेंद्र सिंह पंवर की याचिका पर भी सुनवाई हुई। पंवर और अन्य याचिकाकर्ताओं की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें कहा गया था कि इस फैसले से, विशेषकर मानसून के दौरान, लाखों लोग प्रभावित होंगे।
याचिका में यह भी बताया गया था कि हाईकोर्ट ने 2 जुलाई के अपने आदेश में वन विभाग को सेब के बाग हटाकर उनकी जगह वन प्रजातियों के पौधे लगाने का निर्देश दिया था और अतिक्रमणकारियों से लागत वसूली का भी आदेश दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सेब के बाग मिट्टी की स्थिरता बनाए रखने, स्थानीय वन्यजीवों को आवास देने और राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाते हैं, जिससे हजारों किसानों की आजीविका जुड़ी है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि मानसून के मौसम में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से भूस्खलन और मिट्टी कटाव का खतरा बढ़ जाएगा। पर्यावरण प्रभाव आकलन के बिना बागों को हटाने का आदेश मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए इसे आजीविका के अधिकार का उल्लंघन करार दिया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार 18 जुलाई तक चैथला, कोटगढ़ और रोहड़ू क्षेत्रों में 3,800 से अधिक सेब के पेड़ काटे जा चुके थे और राज्य भर में 50,000 पेड़ों को हटाने की योजना थी, जिससे व्यापक जन असंतोष फैल गया था।
सेब उत्पादक संघ के सचिव संजय चौहान ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि जब तक आपदा प्रभावित, गरीब परिवारों और किसानों को पांच बीघा तक जमीन उपलब्ध नहीं कराई जाती, तब तक संघर्ष जारी रहेगा। वहीं किसान सभा के राज्य सचिव राकेश सिंघा ने इस निर्णय को किसानों, बागवानों और आम गरीब जनता की जीत बताया और कहा कि यह फैसला किसानों के लंबे संघर्ष का परिणाम है।

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