
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से यह स्पष्ट करने को कहा है कि मृत व्यक्तियों के बैंक खातों की जानकारी उनके वैध वारिसों को देने में आखिर क्या बाधा है।
एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई। याचिका में कहा गया है कि देशभर के बैंकों में बिना दावे वाली जमा राशि लगातार तेज़ी से बढ़ रही है। अदालत ने केंद्र और आरबीआई से पूछा कि जब किसी खाताधारक का निधन हो जाता है, तो उसके वारिसों को खातों की जानकारी उपलब्ध कराने में दिक्कत क्यों आती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार को इस विषय पर एक स्पष्ट और प्रभावी नीति तैयार करनी चाहिए। यह मामला पत्रकार सुचेता दलाल द्वारा दायर जनहित याचिका से संबंधित है, जिसमें मृत खाताधारकों के बैंक खातों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए एक व्यवस्थित तंत्र विकसित करने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के विभिन्न बैंकों में कई खाते हों और उसकी बिना वसीयत मृत्यु हो जाए, तो उसके वारिस उन खातों की जानकारी कैसे प्राप्त करेंगे। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की जानकारी साझा करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए और सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि आरबीआई पहले ही एक केंद्रीकृत और सर्चेबल डेटाबेस बनाने की सिफारिश कर चुका है, जिससे लोग अपने दिवंगत परिजनों के बैंक खातों का पता लगा सकें। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि यदि कोई वास्तविक वारिस सामने आता है, तो उसे ‘डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड’ से धन वापस कर दिया जाता है। यह फंड आरबीआई द्वारा 2014 में स्थापित किया गया था, जिसमें लंबे समय तक बिना दावा किए गए पैसे जमा रहते हैं। हालांकि, अदालत इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई और केंद्र व आरबीआई को इस मामले में नए हलफनामे दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि बिना दावे वाली रकम में तेजी से वृद्धि हो रही है। मार्च 2021 तक यह राशि 39 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुकी थी। अदालत का मानना है कि यदि मृत खाताधारकों की बुनियादी जानकारी (जैसे नाम, पता और अंतिम लेन-देन की तिथि) के साथ एक केंद्रीकृत ऑनलाइन प्रणाली बनाई जाए, तो वारिसों को उनका अधिकारिक धन प्राप्त करने में आसानी होगी और अनावश्यक कानूनी जटिलताएं भी कम होंगी।






