एलपीजी संकट से खाने-पीने का धंधा चौपट; बेरोजगारी और पलायन बढ़ा

मार्च 2026 का महीना भारत के लाखों रेस्तरां मालिकों, ढाबेदारों और छोटे खाने-पीने के कारोबारियों के लिए एक बुरे सपने जैसा बन गया है। देश के सबसे बड़े सुबह उत्तर प्रदेश के छोटे-बड़े शहरों से लेकर गांव-देहात तक में एलपीजी गैस संकट ने खानपान के धंधे में लगे लोगों की कमर तोड़ दी है। यूपी ही नहीं, दिल्ली की गलियों से लेकर मुंबई के फुटपाथ तक, बेंगलुरु के होटलों से लेकर आंध्र प्रदेश के दूरदराज के ढाबों तक हर जगह एक ही चिंता है, एलपीजी गैस कहां से आएगी? मार्च 2026 के पहले सप्ताह में यह संकट तब शुरू हुआ जब ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच सैन्य संघर्ष के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य व्यावहारिक रूप से बंद हो गया, जो दुनिया के इतिहास में पहली बार हुआ। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और वित्त वर्ष 2025 में उसने 3.13 करोड़ मीट्रिक टन एलपीजी की खपत की। देश अपनी जरूरत का करीब 67 फीसदी एलपीजी आयात करता है, जिसमें से लगभग 90 फीसदी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। जब यह रास्ता बंद हुआ, तो भारत की रसोई की नब्ज थम-सी गई। घरेलू उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए सरकार ने व्यावसायिक एलपीजी आपूर्ति में 80 फीसदी तक की कटौती कर दी। इसका नतीजा यह हुआ कि यूपी, बिहार, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोच्चि जैसे बड़े शहरों में हजारों रेस्तरां और होटल या तो बंद हो गए या उन्हें लकड़ी और कोयले पर वापस लौटना पड़ा।

नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) के अध्यक्ष सागर दरयानी ने कहा कि यह एक संकट की स्थिति है, जो अगले कुछ दिनों में कई रेस्तरां बंद करा देगी। उन्होंने बताया कि भारत के 90 फीसदी रेस्तरां अपनी रसोई चलाने के लिए एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर हैं। उद्योग पहले से ही कम मांग और उच्च लागत से जूझ रहा था, लेकिन अगर एलपीजी आपूर्ति की समस्या बनी रहती है, तो इससे “कारोबार बंद होंगे और नौकरियां जाएंगी। रेस्तरां उद्योग के जानकार और कई ब्रांड के संस्थापक ज़ोरावर कालरा ने इस संकट की तुलना मार्च 2020 के कोविड लॉकडाउन के शुरुआती दिनों से की। उन्होंने कहा कि रेस्तरां क्षेत्र कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला उद्योग है, जो सीधे तौर पर करीब 80 लाख लोगों को रोजगार देता है और इतने ही लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से। यह ₹6.6 लाख करोड़ का पारिस्थितिकी तंत्र है, जो हर दिन जीडीपी में करीब ₹1,800 करोड़ का योगदान देता है। कालरा ने अनुमान जताया कि अगर एलपीजी आधारित संचालन बंद हो जाए, तो दैनिक नुकसान ₹1,200 से ₹1,300 करोड़ के बीच हो सकता है। सबसे बुरी मार छोटे ढाबेदारों और रेहड़ी-पटरी वालों पर पड़ रही है, जिनकी पूरी आजीविका एक-दो सिलेंडर पर टिकी है। उत्तर प्रदेश में कुछ होटल मालिकों का कहना है कि उनके पास केवल एक या दो दिन का गैस भंडार बचा है और सिलेंडर की उपलब्धता 40 से 50 फीसदी तक घट गई है।

लखनऊ के रकाबगंज इलाके में रहने वाली चंदनी, जो प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की लाभार्थी हैं, डेढ़ साल तक बिना रुकावट गैस पाती रहीं। लेकिन जब उनका रिफिल नहीं आया, तो वो फिर से लकड़ी की ओर लौट गईं। उन्होंने कहा कि दिल्ली में लकड़ी की कीमत ₹10 से बढ़कर ₹20 प्रति किलो हो गई है।संकट का असर खाने-पीने के कारोबार तक ही सीमित नहीं है। व्यवसाय ये बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं पर डाल रहे हैं, जिससे खाने की कीमतें और महंगाई बढ़ रही है। यह संकट दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में सबसे गंभीर है, जबकि पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) के बुनियादी ढांचे वाले शहर अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं। इस संकट ने लॉन्ड्री और कांच-सिरेमिक जैसे कारखानों को भी प्रभावित किया है। पुणे में एक गैस चालित शवदाह गृह तक बंद करना पड़ गया। संसद के बाहर विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की। सरकार के कदमों की बात करें तो 8 मार्च 2026 को सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के आदेश दिए। घरेलू उत्पादन में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी की गई। इसके अलावा लगभग 48,000 किलोलीटर केरोसीन वैकल्पिक ईंधन के रूप में जारी किया गया और शहरी इलाकों में सिलेंडर बुकिंग के बीच का न्यूनतम अंतराल 21 से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया। 12,000 से अधिक छापे मारे गए और जमाखोरी एवं कालाबाजारी रोकने के लिए 15,000 से ज्यादा सिलेंडर जब्त किए गए। पेट्रोलियम मंत्रालय ने रेस्तरां, होटल और अन्य व्यावसायिक उद्योगों को एलपीजी आपूर्ति के लिए प्रतिनिधित्व की समीक्षा हेतु एक समिति बनाने की भी घोषणा की। हालांकि, कालरा ने बताया कि रेस्तरां केवल 19 किलो के व्यावसायिक सिलेंडर का उपयोग कर सकते हैं और घरेलू सिलेंडर पर नहीं जा सकते। करीब 75 फीसदी रेस्तरां एलपीजी पर निर्भर हैं, जबकि केवल 25 फीसदी के पास पाइप्ड गैस का विकल्प है। यह संकट कब तक चलेगा, यह सवाल सबसे बड़ा है। ईरान के राजदूत ने कहा कि उनका देश कुछ ईंधन जहाजों को भारत के लिए होर्मुज से गुजरने की अनुमति के लिए 22 जहाज अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। जब तक होर्मुज की राह नहीं खुलती और कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता, भारत के लाखों खाने-पीने के कारोबारियों की थाली खाली और चूल्हा ठंडा ही रहेगा।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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