समाजवादी पार्टी में टूट..! असंभव कुछ भी नहीं

चार मई 2026 को पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे आने से पहले किसी ने सपने में भी किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि महीने-डेढ़ महीने में तृणमूल कांग्रेस का बुरी तरह से विभाजन हो जायेगा। पश्चिम बंगाल की तेज तर्रार नेत्री और तब की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की छवि उस समय तक एक ऐसी नेत्री की थी जिसे मोदी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन बंगाल की हार ने सब कुछ बदल दिया। अब वह नेता ही उनको आईना दिखा रहे हैं जो कल तक उनके नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने की बात कर रहे थे। इसी तरह से आम आदमी पार्टी के सात सांसद भी बिना किसी शोरगुल और सुगबुगाहट के बागी हो गये ओर भाजपा में चले गये। महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव गुट की भी कमोवेश यही स्थिति है। उसके छह सांसदों ने अलग राह पकड़ ली है। उद्धव के लिये शिंदे के बाद यह दूसरा बड़ा झटका है। कुछ वर्ष पूर्व महाराष्ट्र ने शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस में भी टूट देखी थी, जब उनके ही भतीजे अजीत पवार ने बगावत करके अलग न केवल अपनी पार्टी बना ली बल्कि महाराष्ट्र में बीजेपी गठबंधन सरकार का हिस्सा भी बन गये। यह और बात है कि अजीत पवार अब इस दुनिया में नहीं है और उनकी पत्नी पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद वहां की राजनीति में भी बड़ा देखने को मिल रहा है। डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन टूट गया है। बीजेपी की कट्टर विरोधी डीएमके अब मोदी के करीब नजर आ रहे हैं। इसी तरह से आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड भी मोदी सरकार का हिस्सा बनी हुई हैं। खास बात यह है कि जो भी पार्टियां टूटी हैं उसका अलग हुआ धड़ा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का हिस्सा बन कर या अलग रहते हुए भी मोदी के करीब आ गया।

अब ताजा चर्चा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में टूट को लेकर हो रही है। सपा टूटेगी इसकी उम्मीद न के बराबर है, लेकिन अन्य राजनैतिक दलों में जिस तरह से टूट देखने को मिली है उससे सपा में टूट की कुछ खबरों पर लोग विश्वास भी कर रहे हैं। इसकी सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया कि सपा में टूट होने वाली है। राजनीति के कुछ जानकारों का कहना है कि पार्टियों में बगावत कोई नई बात नहीं है। जब किसी पार्टी के नेताओं को लगता है कि उनका नेतृत्व जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है, प्रतिद्वंदियों के सामने कमजोर नजर आ रहा है तब अक्सर कई नेता अपनी सियासत बचाने के लिये पाला बदल लेते हैं। टूट की एक और वजह यह भी नजर आती है कि मुलायम कुनबे में आपसी विश्वास काफी कम हो रहा है। वैसे भी अखिलेश यादव के चचा शिवपाल यादव एक बार सपा से बगावत करके किनारा करने का कारनामा कर चुके हैं। वैसे अखिलेश यादव के खिलाफ गोमती रिवर फ्रंट और खनन घोटालों में भी जांच चल रही है।

बात उत्तर प्रदेश की राजनीति और खासकर समाजवादी पार्टी में बंटवारे के संदर्भ में है तो सवाल यह है कि क्या सपा भी इसी नियति से बच पाएगी? फिलहाल सपा टूटने की संभावनाओं पर अनेकों का विश्वास कम है, पर घटनाक्रमों ने यह बता दिया है कि किसी भी दल के भीतर आपसी विश्वास की कमी, परिवारवादी राजनीति और स्थानीय नेताओं की असंतुष्टि किसी भी समय दरारें पैदा कर सकती है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर के दावे ने इसी चर्चा को हवा दी कि सपा में भी वह दरार आ सकती है जो अन्य पार्टियों में देखी गई। राजनीति के जानकार कहते हैं कि बगावत नई बात नहीं; जब किसी पार्टी के नेता महसूस करते हैं कि उनका नेतृत्व जनता के कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा, या उनको वैकल्पिक रास्ता नजर आता है, तो वे अक्सर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी बचाने के लिये ही नए गठजोड़ बनाना चुन लेते हैं। यह मनोवृत्ति केवल व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं, बल्कि राजनीति की व्यावहारिकता का हिस्सा है।

उधर, मुलायम परिवार के भीतर आपसी भरोसा कम होने की खबरें भी पुराने समय से चली आ रही हैं। परिवारवादी राजनीति में छोटे से विवाद भी बड़े रूप ले सकता है, जैसे पहले शिवपाल यादव ने सपा से किनारा किया था। अखिलेश यादव पर गोमती रिवर फ्रंट माइनिंग घोटाले से जुड़े आरोपों ने भी उनकी छवि को चुनौती दी है। लखनऊ में अखिलेश की लोकप्रियता में पिछले दो वर्षों में गिरावट आई है, विशेषकर शहरी गरीबों और मध्यम वर्ग के बीच जलवायु और शहरी बुनियादी ढांचे की समस्याओं पर उनके नेतृत्व की ज्यादा प्रभावशीलता नहीं रही। स्थानीय नेताओं का मानना है कि जब जनता के मुद्दे जैसे जल निकासी, सड़क की स्थिति और विद्युत वितरण की समस्या सुलझती नहीं, तो नेताओं की नाराजगी बढ़ती है और वे अक्सर पाला बदलने की राह चुनते हैं।

गौरतलब हो, यूपी में सपा का सामाजिक आधार यादव, कुर्मी और कुछ अल्पसंख्यक समूहों पर टिका है, लेकिन पिछले चुनावों में इस आधार में कुछ गिरावट देखी गई है। सपा के वोटर्स का विश्वास कम हुआ है, जो सपा नेताओं के बीच असंतुष्टि को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में स्थानीय और क्षेत्रीय नेताओं की नाराजगी, प्रदेश स्तर पर लोकप्रियता में गिरावट और कानूनी-नैतिक सवाल मिलकर टूट की संभावनाओं को हवा दे सकते हैं। पर सवाल यह भी है कि क्या सपा जैसा संगठन जो व्यापक सामाजिक आधार और मजबूत क्षेत्रीय संगठनात्मक संरचना रखता है, टूट कर छोटे-छोटे धड़ों में बंट पायेगा? इतिहास बताता है कि बड़े संगठन अक्सर पुनर्गठित होकर ही टिकते हैं, पर वक्त-समय पर उनकी दिशा में बड़े बदलाव आ जाते हैं।

इसके साथ ही हकीकत यह भी है कि राजनीति में बगावत और दल परिवर्तन के पीछे आर्थिक और संस्थागत कारण भी काम करते हैं। केंद्र और राज्यों के बीच संसाधन वितरण, योजनाओं की निजी पहुंच और सत्ता में बने रहने के लाभ अनेक नेताओं को नई राह चुनने के लिये प्रेरित करते हैं। स्थानीय नेताओं के लिए व्यक्तिगत वोट बैंक और क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान अक्सर प्राथमिकता बन जाता है, और यदि मौजूदा नेतृत्व उन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तो विद्रोह का रास्ता खुल जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक स्थिरता अब एक अस्थिर अवधारणा बनती जा रही है। चुनावी हार, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और रणनीतिक समझौते मिलकर नए राजनीतिक नक्शे बनाते हैं। इन परिवर्तनों का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ता है। वोटरों के विश्वास को ठेस पहुंचती है जब दल जिन वादों के साथ बनते हैं, वे अचानक ही नजरियों से बदल जाते हैं। क्षेत्रीय मुद्दों और विकास के वादे अगर सत्ता के साथ जुड़कर दब जाते हैं तो स्थानीय जनहित प्रभावित होता है।

अंततः यह राजनीतिक परिदृश्य बताता है कि आज का भारतीय लोकतंत्र अधिक गतिशील और कम पूर्वानुमेय हो चला है। नेताओं की नीतिगत निष्ठा और गठबंधन की राजनीति में लचीलापन, दोनों मिलकर एक ऐसा वातावरण बना देते हैं जहाँ सत्ता और रणनीति का खेल निरंतर चलता रहता है। पश्चिम बंगाल की हार से ममता बनर्जी को जो आईना दिखा है, वह सिर्फ एक नेता की परीक्षा नहीं; वह उस बड़े राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है जो देश के कई हिस्सों में धीरे-धीरे आकार ले रहा है। उत्तर प्रदेश और लखनऊ के संदर्भ में, अखिलेश यादव और सपा के परिदृश्य को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि राजनीति में स्थिरता अब पुराना नियम नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नई रणनीतियाँ ही निर्णायक होंगी। सपा में टूट हो या न हो, इस लगातार बदलते चक्र ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि राजनीति में नेतृत्व की जनता की कसौटी पर खरा उतरना, स्थानीय मुद्दों पर प्रभावशीलता और आपसी विश्वास की मजबूती ही दल को टिकने और आगे बढ़ने का रास्ता खोल सकती है।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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