अफगानिस्तानः कल, आज और कल

कायर सेना के लज्जापूर्ण समर्पण और अफगानिस्तान के बुजदिल राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश से भागने के बाद पूरे देश पर तालिबान का कब्जा हो गया है। बिना संघर्ष और खूनखराबा किये तालिबान को वो सब कुछ मिल गया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।,अमेरिका को हर हाल में अफगानिस्तान छोडना था, ये तो साल 2018 में तालिबान से वार्ता के दौरान ही स्पष्ट हो गया था। अमेरिका की बेताबी देख तालिबान ने अपनी शर्तों पर समझौता किया। फरवरी 2020 में दोहा में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जहाँ अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रतिबद्धता जताई और तालिबान ने ये लिखकर दिया कि वो अमेरिकी सैनिकों पर हमला नहीं करेगा, मगर तालिबान ने नाटो फोर्सेस पर हमला जारी रखा। समझौते में ये भी कहा गया कि तालिबान अपने नियंत्रण वाले इलाके में अलकायदा और दूसरे चरमपंथी संगठनों के प्रवेश पर पाबंदी लगाएगा। इस वायदे पर तालिबान कितना खरा उतरेगा ये देखने वाली बात होगी।
आज अफगानिस्तान फिर वही पाषाण युग में पहुंच गया है, जहाँ औरतों को हिजाब से बाहर निकलने की सजा कोडों से दी जाती थी। दस वर्ष से अधिक उम्र की लड़कियों का स्कूल मे पढना हराम माना जाता था। शरिया कानून के उल्लंघन करने पर मौत की सजा दी जाती थी। संगीत सुनने पर पाबंदी थी, अफगानिस्तान के सिनेमाघरों में ताला लटका रहता था। कोई भी अफगानी बगैर दाढी नहीं रह सकता था। पश्चिमी परिधान पहनने की सख्त मनाही थी। लडकियाँ या औरतें नौकरी नहीं कर सकती थीं। वे अकेले बाहर नहीं जा सकतीं थी, उन्हें घर के मर्द के साथ ही बाहर निकलना पड़ता था। तालिबानी लडाकों का जिस लडकी पर दिल आ जाए उसे वे आसानी से अपने हवस का शिकार बनाते थे।
हमेशा से अफगानिस्तान में ऐसा नहीं था। एक समय अफगानी महिलाओं की गिनती एशिया की सबसे आधुनिक और पढी लिखी महिलाओं में होती थी। अफगानिस्तान की तरक्की में वहाँ के शासक जाहिर शाह (1933-1973) की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इनके शासनकाल में अफगानिस्तान ने काफी तरक्की की, मगर एक षड्यंत्र के तहत उनके बहनोई ने ही तख्तापलट कर दिया। वे भी शासन सत्ता अधिक दिनों तक संभाल नहीं सके। उनको पदच्युत कर कम्यूनिस्टों ने सत्ता संभाली मगर वे सभी को एकजुट करने में नाकाम रहे। मुजाहिद्दीन लगातार कम्युनिस्ट सरकार को अस्थिर कर रहे थे, तब साल 1979 में सोवियत संघ ने अपनी फौज कम्युनिस्टों के समर्थन में वहाँ भेज दी। उसके बाद 1980 से 1988 तक सोवियत संघ की फौज अफगानिस्तान में रही। इस भयानक युद्ध में सोवियत संघ के पंद्रह हजार सैनिकों समेत दस लाख लोग मारे गए थे।
उस दौर में दो महाशक्तियों के बीच “शीत युद्ध” को और बढावा मिला। अमेरिका ने पाकिस्तान को अपने पाले में कर अफगान सरकार के खिलाफ लड रहे मुजाहिद्दीनों का समर्थन करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान इस्लामिक देशों में यह प्रचारित करने में सफल रहा कि अफगानिस्तान में इस्लाम खतरे में है, और इस्लाम की रक्षा के लिए सभी देशों को मुजाहिद्दीनों का खुलकर समर्थन करना होगा। अधिकांश मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान के मार्फत अफगानिस्तान में गोला-बारूद भेजना शुरू कर दिया। चीन और पाकिस्तान की फौज ने मुजाहिद्दीनों को मिलेट्री ट्रेनिंग देना शुरू कर दी थी। मुजाहिदीन दिन-प्रतिदिन मजबूत होते चले गए और कहा जाता है कि गोरिल्ला युद्ध में उसका कोई सानी नहीं था।
युद्ध के कुछ सालों बाद ही सोवियत संघ के हुक्मरानों को ये आभास हो गया कि उनका अफगानिस्तान युद्ध में शामिल होना एक गलत निर्णय था। इसी बीच साल 1985 में मिखाइल गोर्वाचोव सोवियत संघ के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए, जो सुधार के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपनी नई विदेश नीति के तहत ये फैसला किया कि सोवियत सेना अफगानिस्तान से वापस लौटेंगी। गोर्वाचोव ने ये समझ लिया था कि सोवियत सेना का अफगानिस्तान में रहना घाटे का सौदा ही साबित हो रहा है। साल 1988 में गोर्वाचोव ने अफगानिस्तान से अपनी फौज को वापस बुलाने का निर्णय किया। फरवरी 1989 में सोवियत संघ की फौज अफगानिस्तान से वापस चली गई। आज भी अफगानिस्तान के बहुत से इलाकों में सोवियत सेना द्वारा छोडे गए टैंक और मिलेट्री गाडियों के अवशेष देखने को मिल जाते हैं।
सोवियत सेना के अफगानिस्तान छोडते ही अफगान राष्ट्रपति नजीबुल्लाह की ताकत बेहद कम हो गई थी मगर फिर भी तीन चार साल कम्युनिस्ट सरकार मुजाहिद्दीनों से लडती रही, मगर साल 1992 में नजीबुल्लाह की सरकार गिर गई।
मुजाहिद्दीनों की तरफ से बुरहानुद्दीन रब्बानी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बने मगर उन्हें सभी का समर्थन नहीं था। हर कबीले के अलग नेता थे, उनकी महत्वाकांक्षाएं अलग थीं।
रब्बानी सरकार में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार अपने चरम पर जा पहुँचा था। आम जनता रब्बानी सरकार से बेहद नाराज थी। इसी बीच तालिबान का उदय हुआ और वो जनता को ये समझाने में सफल रहा कि तालिबान अफगान जनता की सच्चा हितैषी है। भ्रष्टाचार से ऊबे लोगों ने तालिबान का समर्थन करना शुरू कर दिया और उसने साल 1996 में बुरहानुद्दीन रब्बानी सरकार का तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली।
तालिबानी नेता मुल्ला उमर जो देश का सर्वोच्च धार्मिक नेता था, उसने खुद को हेड ऑफ सुप्रीम काउंसिल घोषित कर लिया। तालिबान को सिर्फ पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ही मान्यता दी थी। तालिबानी कितने क्रूर थे ये इस बात से समझा जा सकता है कि उसने अपने पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह की हत्या संयुक्त राष्ट्र के कमपाउंड से खींचकर कर दी थी। पूर्व राष्ट्रपति के शव को जीप के पीछे बांधकर काबुल की सडकों पर घुमाया गया और फिर शव को  लैंपपोस्ट पर टांग दिया गया। ऐसा करने का केवल इतना ही मकसद था कि लोग उनसे डरें, और बगावत के बारे में सोचे भी नहीं।
तालिबान ने अपने शासनकाल में तरह तरह के अत्याचार किये। शरिया कानून की आड में अफगानी महिलाओं की जिंदगी को बद से बदतर कर दिया। महिलाओं के अकेले बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। अफगानी महिलाओं को नौकरी करने की आजादी नहीं थी। पुरूष डाक्टर महिलाओं का इलाज नहीं कर सकते थे। तालिबान के किसी भी आदेश का उल्लंघन करने पर उन्हें बुरी तरह पीटा जाता था। तालिबानी लडाके किसी के घर में घुसकर महिलाओं-बच्चियों के साथ मनमानी करते थे। विरोध करने का मतलब मौत था।
तालिबानी शासन में पुरूषों का भी यही हाल था। अफगानी लडकों का यौन शोषण होने लगा था।
तालिबानी शासन में अफगानिस्तान आतंकियों का खुला पनाहगार बन गया था। यहीं से आतंकी ओसामा बिन लादेन ने न्यूयॉर्क और वाँर्शिगटन पर 2001 में 9/11 के हमलों की साजिश रची थी। जाँच में इस बात का खुलासा हुआ कि ओसामा बिन लादेन ही मुख्य साजिशकर्ता है, और वह अफगानिस्तान में छूपा बैठा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की सेना ने नाटो के अपने सहयोगियों के साथ अफगानिस्तान में तालिबान के शासन को उखाड़ फेंका। तालिबानी नेता मुल्ला उमर और उसके शीर्ष कमांडरों ने भागकर तोराबोरा की पहाड़ियों की गुफाओं में शरण ली। तीन साल वे सुप्तावस्था में रहे लेकिन फिर पाकिस्तान के अप्रत्यक्ष सहयोग से वे अपनी ताकत इकठ्ठा करने लगे। बराक ओबामा ने साल 2009 में डेढ लाख अतिरिक्त सुरक्षा बल अफगानिस्तान भेजे थे, मगर तब तक तालिबान अपनी ताकत बहुत बढा चुका था।
डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की अफगान नीति में काफी बदलाव किया, वे चाहते थे कि अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से समयबद्ध तरीके से हटे। इस बाबत् साल 2018 में तालिबान से बात शुरू की गई और साल 2020 में दोहा में एक समझौता मुक्कमल हुआ। एक सरकारी आँकडों के मुताबिक इस युद्ध में अमेरिका के करीब 978 अरब डॉलर और 2300 से अधिक लोगों की जान बेकार चली गई। इतना ही नहीं 45,000 हजार से अधिक अफगानी सैनिक इस ऑपरेशन के दौरान मारे गए। अफगानिस्तान में सोवियत संघ और अमेरिका दोनों ने जान-माल के अलावा अपनी साख भी खूब गंवाई।
गौरतलब है कि तालिबान-2 के शासन में तालिबानियों के साथ पाकिस्तान, रूस और चीन मजबूती से खडा है, जो भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है। चीन और पाकिस्तान की शह पर प्रशिक्षित तालिबानी लडाके कश्मीर में हस्तक्षेप कर सकते हैं। भारत पिछले कई वर्षों में अफगानिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और संस्थानों के पुनर्निर्माण में तीन अरब डॉलर का निवेश कर चुका है, और बहुत सी परियोजनाओं का खाका लगभग तैयार है। पाकिस्तान और चीन के कहने पर तालिबान इन परियोजनाओं से भारत को बाहर कर सकता है। भारत सरकार के अनुसार अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में भारत की 400 से अधिक परियोजनाएं चल रही हैं। अभी एक चौंकाने वाली खबर ये आई है, कि तालिबान ने सरकार बनने तक भारत से सारे आयात-निर्यात को रोक दिया है। तालिबान के रूख को देखकर भारत को अपनी अफगान पालिसी फिर से तय करनी पडेगी। यद्यपि तालिबानियों ने अफगानिस्तान में भारत के कामों को काफी सराहा है, मगर उनका आका पाकिस्तान, भारत को अपना कट्टर विरोधी समझता है, और वह कभी भी नहीं चाहेगा कि अफगानिस्तान से भारत के मधुर संबंध बनें।
आपको याद होगा, चंद दिनों पहले तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था कि हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ उलझना नहीं चाहते हैं। हमें हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काम करने का अधिकार है। दूसरे देशों के अलग-अलग दृष्टिकोण, नियम और कानून हैं। हमारे मूल्यों के अनुसार, अफगानों को अपने नियम और कानून तय करने का अधिकार है। अफगानी महिलाओं को शरिया कानून के तहत हक मिलेंगे।
तालिबान अफगानिस्तान में क्या करता है ये कुछ दिनों बाद स्पष्ट हो जाएगा तब तक अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को दम साधे इंतजार ही करना होगा, क्योंकि अब उनके पास बहुत सीमित विकल्प बचे हैं।


अजय श्रीवास्तव

(वरिष्ठ पत्रकार)

विशिखा मीडिया

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