सन् 1962,भारत और चीन के बीच युद्ध में भारत की करारी शिकस्त हुई थी।चोट इतनी गहरी थी कि हर भारतीय अपमानित महसूस कर रहा था।इसी बीच पाकिस्तान को लगा कि भारत,चीन से युद्ध में बुरी तरह टूट गया है और यह सही समय है कश्मीर पर कब्जा जमाने का।कब्जा न भी हो पाए तो नेगोसिएशन कर कश्मीर में जनमतसंग्रह के लिए भारत को राजी किया जाए।आननफानन में एक आँपरेशन का खाका तैयार किया गया जिसका नाम “आँपरेशन जिब्राल्टर” रखा गया।
आँपरेशन जिब्राल्टर से पहले 09 अप्रैल 1965 की गर्मियों में कच्छ का रण संघर्ष,जहां भारतीय और पाकिस्तानी सेनाएं भिडी थी,इसमें पाकिस्तान के पक्ष में कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आए थे।कच्छ के रण को पाकिस्तान अपनी विजय बताता है यद्यपि भारत इससे इंकार करता रहा है।ये पाकिस्तान की वो हिमाकत थी जिससे उसे लगने लगा था कि कश्मीर पर कब्जा किया जा सकता है।एक दूसरी घटना दिसंबर 1963 में सामने आई,जिससे पाकिस्तान को लगा कि कश्मीर के स्थानीय लोगों को भडका कर वहां विद्रोह कराया जा सकता है।दरअसल श्रीनगर में हजरतबल दरगाह से एक पवित्र अवशेष के गायब होने से घाटी के लोगों में रोष फैल गया।पाकिस्तान के हुक्मरानों को लगा कि इस तरह के मुद्दों को हवा देकर अपने मकसद में कामयाब हुआ जा सकता है।
पाकिस्तान के रहनुमाओं ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए “आँपरेशन जिब्राल्टर” तैयार किया।इस आँपरेशन को बहुत जल्दी में तैयार किया गया जो आँपरेशन के पतन का मुख्य कारण बना।पाकिस्तान के तीस हजार से चालीस हजार सैनिकों के कश्मीर में घुसने की योजना थी।इनका लक्ष्य कश्मीर के चार ऊंचाई वाले इलाकों गुलमर्ग,पीरपंजाल,उरी और बारमूला पर कब्जा करना था ताकि यदि भारी लड़ाई छिड़े तो पाकिस्तान की सेना ऊँचाई पर बैठकर भारत की सेना के दांत खट्टे कर सके और अंत में कश्मीर पर कब्जा किया जा सके।
आँपरेशन जिब्राल्टर में कश्मीरी बोलने वाले सैनिक एक भी नहीं थे।उनके पास जब रसद खत्म होने लगे तो वो स्थानीय बाजारों से सामान खरीदने लगे थे।उनकी भाषा कश्मीरियों से बिल्कुल अलहदा थी।घाटी के किसानों और दुकानदारों ने भारतीय फौज से बता दिया कि कुछ संदिग्ध यहां घूम रहें हैं और जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं।भारतीय फौज ने किसानों और दुकानदारों की निशानदेही पर कुछ पाकिस्तानी सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया।कडाई से पूछताछ की गई तब थके पाकिस्तानी सैनिकों ने आँपरेशन जिब्राल्टर के बारे में सब कुछ बता दिया।
08 अगस्त 1965 को आकाशवाणी ने जिब्राल्टर फोर्स के चार अफसरों के इंटरव्यू प्रकाशित किए जिन्हें पकड़ लिया गया था।उन्होंने पूरी योजना की विस्तृत जानकारी लोगों को दी।जब ये बात पाकिस्तान के मिलेट्री इंटेलिजेंस के निदेशक ब्रिगेडियर इरशाद को बताई गई तो उनके मुंह से निकला,”ओ माय गाँड,द बास्टर्डस हैव रिपल्ट द बींस”।सीक्रेट मिशन के हर राज का पर्दाफाश हो चुका था।आँपरेशन जिब्राल्टर समय और तैयारी की कमी,खराब क्रियान्वयन और अनाडी प्रयास के कारण बिल्कुल नाकाम हो गया था।पाकिस्तानी हुक्मरानों को उम्मीद थी कि आम कश्मीरी उनका साथ देंगे मगर वे तो पाकिस्तानी सैनिकों को पकडवाने में लगे थे।जगह-जगह से पाकिस्तानी सैनिकों को पकडा जा रहा था।थके और बेजार सैनिकों ने बहुत से जगह बिना प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया था।
जब पाकिस्तानियों को करारी हार सन्निकट दिखनी लगी तब उन्होंने अपने आका अमेरिका से युद्धाविराम कराने की गुहार लगवाई।अमेरिका का पिछलग्गू संयुक्त राष्ट्र की पहल पर आज के हीं दिन यानी 23 सितंबर 1965 को दोनों तरफ से युद्धाविराम की घोषणा की गई।11 फरवरी 1966 को ताशकंद में एक शांति समझौता हुआ जिसमें अमेरिका के दबाव में भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान को जीता हुआ हाजीपीर और ठिथवाल जैसा महत्वपूर्ण सैन्य इलाका वापस कर दिया था जिसका भारत में कडा विरोध हुआ था।
अजय श्रीवास्तव





