राहुल गांधी- देश विरोधी राजनीति का एक बड़ा चेहरा

अजय कुमार
वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ

राहुल गांधी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और नेहरू-गांधी परिवार के वारिस, भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं, जिनका हर कदम और बयान विवादों को जन्म देता है। राहुल के पिता राजीव गांधी, दादी इंदिरा गांधी और परदादा जवाहरलाल नेहरू, सभी देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। इस विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि के बावजूद, राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा को उनके आलोचक देश के हितों के खिलाफ मानते हैं, जिसमें उनके बयान और कार्य भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले माने जाते हैं। वह प्रधानमंत्री से लेकर संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावर रहते हैं। आजकल राहुल गांधी चुनाव आयोग पर आरोपों की झड़ी लगाये हुए हैं। इतना ही नहीं जब भी देश में कोई परेशानी नजर आती है तो राहुल गांधी उस समय निगेटिव पॉलटिक्स करते नजर आते हैं।
राहुल गांधी पर सबसे गंभीर आरोप यह है कि वह विदेशी मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करते हैं। 2023 में लंदन में एक कार्यक्रम में, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को आतंकी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से जोड़ा और दावा किया कि भारत के संस्थान, जैसे प्रेस, न्यायपालिका और चुनाव आयोग, पर कब्जा कर लिया गया है। इस बयान को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भारत को बदनाम करने की कोशिश बताया। 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद, राहुल ने सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि कोई भी देश भारत का समर्थन नहीं कर रहा। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने इसे ‘‘पाकिस्तान का समर्थन’’ करने वाला बयान करार दिया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र और कई देश भारत के साथ खड़े थे। ऐसे बयानों को आलोचक देश की एकता और सम्मान के खिलाफ मानते हैं।
राहुल गांधी के बयान अक्सर तथ्यों से परे और गैर-जिम्मेदाराना माने जाते हैं। 2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में, उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाया। चुनाव आयोग ने इन दावों को खारिज करते हुए उन्हें ‘‘बेबुनियाद’’ बताया। इसी तरह, 2024 में अमेरिका में दिए एक बयान में, राहुल ने कहा कि अगर भारत निष्पक्ष समाज बन जाए, तो कांग्रेस आरक्षण खत्म करने पर विचार कर सकती है। इस बयान को बीजेपी और अन्य दलों ने आरक्षण-विरोधी करार दिया, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ा। हालांकि राहुल ने बाद में स्पष्टीकरण दिया, लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि उनके बयान हमेशा संवेदनशील मुद्दों को भड़काने वाले होते हैं।
2016 में नोटबंदी के दौरान, राहुल ने इसे साजिश बताकर देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। उनके इस बयान को बीजेपी ने भारत की आर्थिक प्रगति को बदनाम करने की कोशिश माना। इसी तरह, 2007 में बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर उनके बयान ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा किया। आलोचकों का कहना है कि राहुल गांधी की राजनीति ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है और वह जानबूझकर भारत की छवि को कमजोर करने वाले बयान देते हैं।
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और जाति जनगणना जैसे प्रयासों को उनके समर्थक सामाजिक न्याय की दिशा में कदम मानते हैं, लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि यह सब वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। उनकी विदेश यात्राओं में भारत की आलोचना और सरकार को ‘‘तानाशाही’’ या ‘‘आपदा’’ जैसे शब्दों से नवाजना देश के हितों के खिलाफ माना जाता है। बीजेपी और उनके विरोधी उन्हें पप्पू जैसे तंज के साथ एक अपरिपक्व नेता के रूप में चित्रित करते हैं, जो बार-बार तथ्यहीन और गैर-जिम्मेदाराना बयानों से देश को नुकसान पहुंचाते हैं।
राहुल गांधी की राजनीति को उनके आलोचक भारत की प्रगति और एकता के लिए खतरा मानते हैं। उनकी विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि, जो उन्हें सत्ता के करीब ले आई, उनके बयानों और कार्यों के सामने बौनी नजर आती है। विदेशी मंचों पर भारत की आलोचना, संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां और संस्थानों पर हमले, राहुल गांधी को उनके विरोधियों की नजर में देश-विरोधी नेता बनाते हैं। उनकी राजनीति, चाहे वह रणनीति हो या अनजाने में की गई गलती, भारत के लिए नुकसानदायक मानी जाती है।

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