सुप्रीम कोर्ट ने पिता द्वारा नाबालिग बेटी के साथ किए गए यौन उत्पीड़न को पारिवारिक विश्वास की घोर अवहेलना बताया है और दोषी को सख्त सजा व पीड़िता को मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की पीड़िता को 10.50 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि घर एक सुरक्षित स्थान होना चाहिए, लेकिन जब परिवार का ही कोई सदस्य इस पवित्रता को भंग करता है, तो उसे कठोरतम दंड मिलना चाहिए। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की नींव को झकझोर देने वाला है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध को अत्यंत गंभीर बताया और कहा कि जब माता-पिता जैसे संरक्षक ही अपराधी बन जाएं, तो विश्वास पूरी तरह से टूट जाता है। इस कारण ऐसे मामलों में सख्त सजा और पर्याप्त मुआवजा देना आवश्यक है, ताकि पीड़िता को न्याय मिल सके।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि-
• घर की सुरक्षा तभी मायने रखती है जब उसमें रहने वाले हर व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक संरक्षण मिले।
• अगर परिवार का ही सदस्य बच्चे को नुकसान पहुंचाए, तो वह अपराध और भी भयावह बन जाता है।
• ऐसे अपराधों में किसी भी प्रकार की रियायत न्याय के साथ अन्याय होगी और इससे कमजोर बच्चों के अधिकारों का हनन होगा।
•कोर्ट ने आरोपी पिता की जमानत याचिका को भी खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि दोषी को बिना किसी नरमी के दंड मिलना चाहिए।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा, “जहां नारी का सम्मान होता है, वहीं देवता वास करते हैं।” कोर्ट ने इसे केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्य भी बताया।
अंत में कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों पर सख्त कार्यवाही कर समाज में यह स्पष्ट संदेश देना जरूरी है कि महिलाओं और बच्चों की गरिमा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।





