कहानी कोहिनूर की

मुगल सम्राट बाबर ने एक बात लिखी थी, की कोहिनूर की कीमत इस ‘दुनिया के सभी लोगों के लिए एक दिन के भोजन के मूल्य के बराबर’ है। कोहिनूर काफी प्रतिष्ठित और मूल्यवान एक हीरा है। यह चमकदार सुंदर दुर्लभ रत्नों से बना है। कोहिनूर के असली मालिक के रुप में वारंगल के काकतिया लोगों को जाना जाता हैं। कोहिनूर के बारे में यह बात प्रसिद्ध है कि इसे कभी भी खरीदा या बेचा नहीं गया। यह प्रसिद्ध हीरा लंदन के टावर पर सजने से पहले खिलजी, मुगल, फार्सियों, अफ़गानो और ब्रिटिशों सहित कई राजवंशों के माध्यम से यात्रा करते हुए पहुंचा है।

कोहिनूर का इतिहास एक जटिल इतिहास है। एक रंगीन हीरा जिसका वजन 793 कैरेट का था वह भारत की गोलकुंडा खदानों में उत्पन्न हुआ था। उसे वक्त वह गोलकुंडा खदान काकतीय राजवंश के शासन के अधीन था। 14वी शताब्दी की शुरुआत में, दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश के शासन अलाउद्दीन खिलजी और उनकी सेना ने, दक्षिण भारत को लूटना शुरू किया था। वारंगल पर हमले के दौरान मलिक काफूर ने खिलजी वंश के लिए अमूल्य हीरा हासिल कर लिया और वह हीरा कोहिनूर था। 1526 में बाबर ने पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहिम लोदी को करारी हार दी तब बाबर को यह सूचना मिले की आगरा के किले में एक विशाल खजाना है जिसमें एक हीरा भी शामिल है जो सभी विवरणों को अस्वीकार करता है। रतन की प्राप्ति से प्रसन्न होकर बाबर ने इसे बाबर का हीरा कहा और यहां तक की अपने संस्मरण बाबरनामा में भी इसका उल्लेख किया।

बाबर के बाद उनके सभी वंशजों ने इस हीरे की खूब देख रेख की, लेकिन शाहजहां के बेटे औरंगजेब से इस हीरे की चमक बर्दाश नहीं हुई। औरंगजेब के शासनकाल में ही एक उद्यमी फ्रांसीसी यात्री और रत्न पारखी तैवरनियार ने पहली बार इस हीरे की एक स्केच बनाई और फिर क्या था इस तस्वीर ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया। औरंगजेब ने हीरे को काटने और निकलने का काम एक वेनिस के रतन कलाकार को दिया जो इतना अनाड़ी था कि पत्थर का वजन 793 काह से घटकर 186 कैरेट कर दिया। औरंगजेब ने गुस्से में आकर उसकी सारी संपत्ति जब्त कर ली।

1739 में औरंगजेब के पोते, मुहम्मद शाह के शासन के दौरान फारस के नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया था। इस आक्रमण के दौरान नादिर शाह की सेना ने मुग़ल शाही खज़ाने को लूट लिया जिसमे प्रसिद्ध मयूर सिंहासन और कोहिनूर की बहन दरिया ए नूर भी शामिल था। कोहिनूर कहीं नज़र नही आया, नादिर शाह को कोहिनूर कैसे मिला इसके पिछे भी दिलचस्प कहानी है।

मोहम्मद शाह बेशकीमती कोहिनूर हीरे को अपनी पगड़ी में छुपा कर घुमा करता था। मोहम्मद शाह का याह रहस्य कुछ लोगों को ही मालूम था सम्राट के हरम में रहने वाले एक हिजड़े को यह बात मालूम थी। जब नादिर शाह ने आक्रमण किया और मुगलों को जीत गया तब उसे हिजड़े ने नादिर शाह को इस रहस्य के बारे में बताया। नादिर शाह को लग रहा था कि उसने मुगलों के सारे खजाने लूट लिए लेकिन वह इस बात से अनजान था की मोहम्मद शाह अपनी पगड़ी में देश कीमती हीरे को छुपा कर घूमता है। नादिर शाह ने एक योजना बनाई और योजना के तहत मोहम्मद शाह को कहा कि वह उन्हें उनकी गद्दी पर पुनः स्थापित करेगा, और इसी खुशी में नादिर शाह ने एक बड़े ही भाव दावत का आदेश दिया। दावत के दौरान नादिर शाह ने शाश्वत मित्रता के संकेत में, पगड़ी के आदान-प्रदान का प्रस्ताव रखा और मोहम्मद शाह इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने में असमर्थ रहा। फिर क्या था मोहम्मद शाह को अपनी पगड़ी नादिर शाह को देनी पड़ी और ना दिशा ने उसे हीरे को देखते ही फारसी भाषा में कहा “कोह ए नूर”, जिसका अर्थ होता है प्रकाश का पर्वत। पारस लौटने के तुरंत बाद नादिर शाह की हत्या कर दी गई, और हीरा उसके सबसे योग्य जनरल में से एक अहमद शाह अब्दाली के हाथों में पड़ गया जो बाद में अफगानिस्तान का सबसे अमीर व्यक्ति बन गया था।

अहमद शाह अब्दाली की मृत्यु के बाद कोहिनूर सिख साम्राज्य के संस्थापक रणजीत सिंह के पास था। रणजीत सिंह ने इस हीरे की वसीयत आधुनिक उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर के लिए की थी लेकिन 1839 में उनके मृत्यु के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनकी वसीयत की शर्तों का पालन नहीं किया और उसे अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद लंदन के हाई पार्क में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा कोहिनूर को औपचारिक रूप से महारानी विक्टोरिया को सौंप दिया गया। इसकी मुगल शैली की कटाई से निराश होकर रानी ने राजकुमार अल्बर्ट और दरबार के अन्य लोगों के साथ मिलकर हीरे की चमक बढ़ाने के लिए उसे नया रूप देने का फैसला किया। कोहिनूर को दोबारा काटने में मात्र 38 दिन लगे और 8000 पाउंड की लागत आई। जिसके परिणाम स्वरुप एक अंडाकार प्रतिभा प्राप्त हुई जिसका वजन 108.93 कैरेट था। डच जोहरी श्री कैंटर के प्रयासों के बावजूद परिणाम से हीरा का वजन काफी कम हो गया। 

1853 में इसे रानी के लिए एक शानदार मुकुट पर लगाया गया था जिसमें 2000 से अधिक हीरे थे। इसके बाद महारानी विक्टोरिया इस हीरे को अक्सर पहनती रही और अपनी वसीयत में लिख दिया की कोहिनूर को केवल शाही परिवार की रानी ही पहनेगी। यह कोहिनूर से जुड़े एक प्राचीन अभिशाप की अफवाह के कारण था जिसमें कहा गया था की जिसके पास यह हीरा है वह दुनिया का मालिक होगा। लेकिन उसे इसके सभी दुर्भाग्य भी पता होंगे केवल भगवान या एक महिला ही इसे दंड से मुक्ति के साथ पहन सकती है।

अब इसे टावर ऑफ लंदन में अन्य ब्रिटिश मुकुट रतन के साथ प्रदर्शित किया जाता है। सबसे पहले पुराने मुक्त में जड़े हीरे की क्रिस्टल प्रतिकृति और साथ ही रानी विक्टोरिया को दिया गया मूल कंगन भी टावर के ज्वेल हाउस में देखा जा सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान क्राउन ज्वेलर्स को टावर ऑफ लंदन स्थित उनके घर से एक गुप्त स्थान पर ले जाया गया था। फ्रांसीसी सेवा के जनरल जिंदे तसिग्नी की जीवनी, मैं कहां गया है कि जॉर्ज सिक्स की कोहिनूर को विद आंसर कैसल के पास एक झील के ताल में छुपा दिया था। जहां यह युद्ध के बाद तक रहा। छुपाने की जगह के बारे में जानने वाले एकमात्र लोग राजा और उनके लाइब्रेरियन थे। जिन्होंने 1949 ईस्वी में इंग्लैंड की यात्रा पर जनरल और उनकी पत्नी को स्पष्ट रूप से रहस्य का खुलासा किया था।

कड़वी लड़ाई और अदालती साजिशों का विषय कोहिनूर आज उन लाखों पर्यटकों पर अपनी चमक बिखेर है जो अधिकांश भाग के लिए पुरुषों की नियति को आकार देने में इसके लंबे इतिहास से अनजान है। अब माजरा कुछ ऐसा है की कोहिनूर को लेकर भारत और इंग्लैंड में अक्सर बात छिड़ जाती है, इंग्लैंड अपने म्यूजियम में कोहिनूर को सजाकर रखता है जो भारत की धरोहर है, और यह बात इंग्लैंड मानने को तैयार नहीं। इंग्लैंड से रिश्ते भारत के अच्छे हैं, लेकिन फिर भी कुछ ऐसी घटनाएं दोनों देशों के बीच कोहिनूर का मुद्दा जाने अंजाने उठ ही जाता है।

जैसे अभी हाल ही में, भारत ने जब चंद्रयान 3 में सफलता हासिल की, उस वक्त इंग्लैंड के एक टीवी एंकर ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा की पहले वह इंग्लैंड के सारे पैसे वापस लौटा दे और फिर अपने स्पेस प्रोग्राम को बढ़ाएं l एंकर की इस बात पर नाराज होकर, भारत के कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इंग्लैंड को कहा कि पहले हमारे देश का कोहिनूर वापस करो। इस प्रकार दोनों देशों में किसी न किसी मुद्दे को लेकर कोहिनूर का मुद्दा उठ ही जाता है।

विशिखा मीडिया

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