पिता-पुत्र के मिलन का प्रतीक है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति हिंदुओं के लिए शुभ दिनों में से एक है, और यह देश के लगभग सभी हिस्सों में भक्ति, उत्साह और उल्लास के साथ मनायी जाती है। मकर संक्रांति का महत्त्व सूर्य के उत्तरायण हो जाने के कारण है। शीत काल जब समाप्त होने लगता है, तो सूर्य मकर रेखा को काटते हुए उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाता है, इसे ही उत्तरायण कहा जाता है। भारत में ये त्योहार हर साल 14  जनवरी को (या कभी-कभी 15 जनवरी को भी) मनाया जाता है।

इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इसीलिए यह पर्व पिता-पुत्र के अनोखे मिलन का भी प्रतीक है। ये भी माना जाता है, कि मकर संक्रांति के दिन ही भीष्म पितामह को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, और इसी दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। ऐसी ही पौराणिक और ऐतिहासिक महत्ताएं इस पर्व के साथ जुडी हैं।

मकर संक्रांति के पर्व पर कई जगह पतंग उड़ाने का प्रचलन है। बच्चों से लेकर बूढ़े तक, सब इस पतंग उड़ने के खेल में रम जाते हैं। आसमान रंग बिरंगे पतंगों से जगमगा उठता है। कहीं तिरंगे के रूप में पतंगें आसमान चीरकर ऊँची उड़ती हैं, तो कहीं कोई अपने मनपसंद हीरो की चित्र वाली पतंग से पेंच लड़ा रहा होता है। सिर्फ मौज मस्ती ही नहीं, पतंग उड़ाने के और भी ढेर सारे महत्त्व हैं।

पतंग को उमंग, उल्लास, आजादी और शुभ संदेश का प्रतीक माना जाता है। संक्रांति के दिन से घर में सारे शुभ काम शुरू हो जाते हैं, और उन कार्यों की सकुशल सफलता के लिए पतंग उड़ाने का रिवाज़ है। दूसरा कारण ये भी है, कि पतंग उड़ाने के लिए बेहद संतुलित मन और दो लोगों के बीच आपस में तालमेल की आवश्यकता होती है। पेंच लड़ाने और पतंग काटने के लिए पैतरे आजमाना, अपनी पतंग को कटने से बचाना, इन सब से व्यक्ति के सोचने की क्षमता बढ़ती है। और साथ ही साथ उसे एकता का महत्त्व भी  समझ आता है। 

लेकिन इन सबके अलावा, सबसे महत्त्वपूर्ण कारण ये है, कि आयुर्वेद के अनुसार जब सूर्य उत्तरायण में आता है, तो उसकी किरणें शरीर पर औषधीय प्रभाव डालती है। इसलिए, लंबे सर्दियों के महीनों के बाद, जब लोग पतंग उड़ाने के लिए खुले में बाहर निकलते हैं, तो उनका शरीर सूरज की किरणों के संपर्क में आ जाता है, और सर्दी, खांसी और शुष्क त्वचा के सभी संक्रमणों से मुक्त हो जाता है, जो सर्दी के मौसम में उन्हें प्रभावित करता है। 

इस दिन पतंगबाज़ी की देश भर में अनेक प्रतियोगिताएं होती हैं। इनमें गुजरात में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पतंग उत्सव बहुत प्रसिद्ध है। 1989 से गुजरात ने उत्तरायण के आधिकारिक उत्सव के एक भाग के तौर में अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव की मेजबानी की है। दुनिया के हर कोने से पतंगबाज़ अपनी कला का प्रदर्शन करने इस उत्सव में शामिल होते हैं। पूरा क्षितिज सुबह से शाम तक खूबसूरत पतंगों से सजा रहता है। गुजरात में, पतंगबाजी मौसम में बदलाव का एक प्रतीकात्मक संकेत है। इस दिन, स्थानीय लोग शायद ही सड़कों पर दिखाई देते हैं, क्योंकि हर कोई अपने-अपने घरों की छत पर पतंग उड़ाने और पड़ोसियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए जाता है।

राज्य बदलते ही बदल जाते हैं, त्यौहार मनाने के तरीके 

इस त्यौहार पर सबका उत्साह बेशक एक सा होता है, मगर ये  उत्साह ज़ाहिर करने का तरीका एक दूसरे से थोड़ा अलग होता है। 

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना 

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ये त्यौहार चार दिनों तक चलता है। हर दिन का अपना अलग ही महत्त्व होता है। पहला दिन “भोगी” के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग घर की पुरानी वस्तुएं बेच देते हैं, और उनकी जगह नयी वस्तुएं खरीदते हैं। 

भोर के वक़्त, वे पुरानी बेकार चीज़ों से अलाव जलाते हैं। अलाव की अग्नि को रूद्र के ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

दूसरे दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है।  लोग नए कपड़े पहनते हैं, भगवान से प्रार्थना करते हैं, और पूर्वजों को पारंपरिक भोजन का प्रसाद चढ़ाते हैं। वे अपने घरों के सामने जमीन पर “रंगोली” या “मग्गू” नामक सुंदर चित्र बनाते हैं।  

तीसरे दिन, कानुमा मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने मवेशियों की पूजा करते हैं, और उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। मवेशी को समृद्धि का प्रतीकात्मक संकेत माना जाता है।

चौथे दिन मुक्कनुमा मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताते हैं। इसके साथ साथ बैल दौड़, पतंगबाज़ी, मुर्गों की लड़ाई का आयोजन भी होता है।

उत्तर प्रदेश 

यह त्योहार उत्तर प्रदेश में खिचड़ी नाम से जाना जाता है। यहाँ धार्मिक स्नान का प्रचलन है। इस पवित्र स्नान के लिए दो लाख लोग उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद और वाराणसी और उत्तराखंड के हरिद्वार जैसे पवित्र स्थानों पर इकट्ठा होते हैं। यदि वे किसी नदी में नहीं जा सकते, तो वे घर पर ही उपवास करते हुए सुबह स्नान करते हैं। और फिर मिठाई जैसे कि तिल के लड्डू और गुड़ के लड्डू तथा खिचडी आदि का दान करते हैं।

राजस्थान

यूं तो पूरे राजस्थान मेंमकर संक्रांति बडे ही हर्षोल्लास से मनाई जाती है।  पर गुजरात की तरह ही राजस्थान के जयपुर शहर में भी इस दिन पतंगबाज़ी की अनेक प्रतियोगिताएं होती हैं। दुनिया के हर कोने से पतंगबाज़ अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिये इस उत्सव में शामिल होते हैं। पूरा आकाश सुबह से शाम तक खूबसूरत पतंगों से सजा रहता है। इस दिन, लोग शायद ही सड़कों पर दिखाई दें, क्योंकि सभी लोग अपने-अपने घरों की छत पर पतंग उड़ाते हैं। और पड़ोसियों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। राज्य का पर्यटन विभाग भी इस दिन जयपुर में पतंगबाज़ी की अनेक प्रतियोगिताएं आयोजित करता है।

पंजाब 

पंजाब में लोहड़ी को मकर संक्रांति का आगमन माना जाता है। मकर संक्रांति को माघी के रूप में मनाया जाता है। तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है। मानते हैं कि ये दीपक सभी पापों को दूर करता है। माघी के अवसर पर श्री मुक्तसर साहिब में एक प्रमुख मेले का आयोजन होता है। ये 1705 में मुक्तसर की लड़ाई के दौरान मारे गए चालीस सिख योद्धाओं की याद में आयोजित किया जाता है। सांस्कृतिक रूप से, लोग अपने प्रसिद्ध “भांगड़ा” पर नृत्य करते हैं। वे तब बैठकर सुपाच्य भोजन करते हैं, जो इस अवसर के लिए विशेष रूप से तैयार किया जाता है। दूध और गन्ने के रस में तैयार की गयी चावल की खीर खाने की परंपरा है। खिचड़ी और गुड़ का सेवन करना भी पारंपरिक है।

पश्चिम बंगाल 

यहाँ संक्रांति को पौष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। लज़ीज़ मिठाइयाँ और ताज़े कटे चावल की महक पश्चिम बंगाल के इस  उत्सव का प्रतीक है। खजूर गुड़ इस पर्व की प्रतिष्ठित वस्तु है। पश्चिम बंगाल अपने पारंपरिक गंगा सागर मेले के लिए भी प्रसिद्ध है। लाखों भक्त गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी के संगम पर भोर होने से पहले स्नान करने के लिए आते हैं, और भगवान शिव और देवी गंगा की पूजा करते हैं। मकर संक्रांति पर धर्मराज की भी पूजा की जाती है।

तमिलनाडु 

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की तरह ही तमिलनाडु में भी ये त्यौहार बहुत ही भव्य रूप में मनाया जाता है। यहाँ भी ये चार दिन का पर्व होता है। 

त्योहार का पहला दिन भोगी कहलाता है। पुरानी वस्तुओं की जगह नए वस्तुएं खरीदी जाती हैं। गांवों में “कप्पू कट्टू” नाम का एक समारोह होता है। घर को बुरी ताकतों से बचने के लिए दीवारों और छत के किनारे ‘नीम’ की पत्तियाँ रखी जाती हैं। 

दूसरे दिन थाई पोंगल मनाया जाता है। इस दिन लोग ताजे दूध और गुड़ के साथ, नए बर्तन में चावल पकाते हैं। जैसे ही चावल उबलता है और बर्तन से बाहर आने लगता है, वैसे ही लोग पोंगलो पोंगलो चिल्लाते हैं। इसी कारण इस त्यौहार का नाम पोंगल पड़ा। ये नए उबले चावल भगवान सूरज को चढाया जाता है।

त्यौहार के तीसरे दिन, मट्टू पोंगल और चौथे दिन को कन्नुम पोंगल कहते हैं, आंध्र प्रदेश के भांति ही इस दिन को किसान अपने मवेशियों की पूजा करता है, और लोग अपनों के साथ वक़्त बिताते हैं। 

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह विविधता में एकता को दर्शाता है। मकर संक्रांति का त्योहार नफरत को भूलकर शांति, प्रेम, सद्भाव, और एकता के साथ रहने के लिए प्रेरित करता है।

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