अगर इन पांच प्रश्नों के उत्तर समझ गए…
रोग किस प्रकार होते हैं? इनको कैसे शांत किया जा सकता है? हर्ष का कारण क्या है? शोक का कारण क्या है? शारीरिक तथा मानसिक विकार एक बार शांत हो जाने पर पुनः किन किस रणनीति से नहीं आ सकते? ये पांच प्रश्न ऐसे हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं| आज से लगभग 5000 साल पहले ये पांच प्रश्न आचार्य अग्निवेश ने अपने महान गुरु आत्रेय पुनर्वसु से पूछा था (च.शा.2.39): रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च किं निमित्तम्| शरीरसत्त्वप्रभवा विकाराः कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः|| प्रश्न साधारण हैं पर आज भी महत्वपूर्ण हैं| सारी दुनिया आज भी इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने में लगी हुई है| स्वाभाविक है कि उस समय महर्षि आत्रेय पुनर्वसु द्वारा दिये गये उत्तर को आज के वैज्ञानिक परिप्रेक्ष में देखने पर एक नई दृष्टि मिल सकती है| आज की चर्चा इसी पर केंद्रित है|
प्रज्ञापराध रोग का पहला कारण है| इंद्रियों के अर्थों या विषयों का विषम योग रोगों का दूसरा कारण है| और रोगों का तीसरा कारण परिणाम काल है| सभी प्रकार के रोगों को तीन प्रकार शांत किया जा सकता है: समयोगयुक्त ज्ञान या प्रज्ञा का सदुपयोग, समयोगयुक्त अर्थ या इंद्रियों के विषयों का समयोगयुक्त होना, और समयोगयुक्त काल (च.शा.2.40): प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः| सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः|| यहाँ पहले प्रज्ञापराध को समझना आवश्यक है (च.शा. 1.102): धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेsशुभम्। प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्।। तात्पर्य यह कि धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन कुकर्मों को ‘प्रज्ञापराध’ कहा जाता है। आधुनिक अपराध-विज्ञान का निष्कर्ष भी यही है कि अपराध पहले माथे में होता है। यही सब रोगों की जड़ भी है: प्रज्ञापराधो हि मूलं रोगाणाम्। हालाँकि प्रज्ञापराध रोग-जनन का एकल कारक नहीं, बल्कि असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग तथा काल परिणाम भी रोग-कारक हैं। तथापि, प्रज्ञापराध को सर्वदोषप्रकोपक कहा गया है, क्योंकि रोगजनन के अन्य दो कारक बहुत हद तक प्रज्ञापराध पर निर्भर करते हैं।
प्रज्ञापराध में बहुत तरह के कुकृत्य शामिल हैं (देखें च.शा.1.103-108)| उदाहरण के लिये मल मूत्र आदि के स्वाभाविक वेग को जानबूझकर रोकना या प्रवृत्त करना, बहुत अधिक दुस्साहस करना, यथासमय नियत कर्तव्यों का पालन न करना, कार्यों की अनुचित शुरुआत करना, विनम्रता व सदाचार का पालन न करना, अपने से बड़ों का अनादर करना, जानकारी होते हुये भी इंद्रियों के नियत कार्यों को छोड़कर अहितकर विषयों का सेवन करना, उन्मादी होना, अनुचित काल एवं देश में घूमना-फिरना, क्रूर व गलत कार्य करने वाले लोगों से दोस्ती रखना, इंद्रियों के उचित व्यवहार व सदाचार को छोड़ देना, ईर्ष्या, अभिमान, भय, क्रोध, लोभ, मोह, घमंड और भ्रांति में फंसे रहना और इसके चलते अनुचित काम करना, दूषित कार्य करना आदि तमाम ऐसे अशुभ कार्य हैं जो प्रज्ञापराध की श्रेणी में आते हैं और तमाम रोगों के कारण बनते हैं| आगे भी कहा गया है (च.सू.11.39): मन, वाणी तथा शरीर के कार्यों अति करना अतियोग कहा जाता है| इनका बिल्कुल ही ना होना अयोग कहा जाता है| शरीर के स्वाभाविक मल मूत्र आदि की प्रवृत्ति ना होने पर भी जोर लगाकर इन वेगों को प्रवृत्त करना, स्वाभाविक वेगों को रोकना, टेढ़े-मेढ़े होकर शरीर का गिराना लुढ़काना, अंगों का टेढ़े-मेढ़े चलाना, अंगों को मोड़ना-तोड़ना, शरीर पर चोट करना, मोड़ना-मरोड़ना, सांस को अनावश्यक रोकना, शरीर को जानबूझकर बहुत कष्ट देना आदि शारीरिक कर्मों के मिथ्यायोग कहे जाते हैं| इसी प्रकार निंदा करना, झूठ बोलना, बिना मतलब बकवास करना, अनुचित समय पर बोलना, लड़ना, कटु, अप्रासंगिक, अशिष्ट और कठोर बात कहना आदि वाणी के मिथ्यायोग हैं| भय, शोक, गुस्सा, लालच, मोह, अभिमान या अहंकार, ईर्ष्या, मोह, भ्रांति में फंसना आदि मन के मिथ्ययोग हैं|
असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग को समझने के लिये पहले यह समझना जरूरी है कि हमारे लिये जो भी हितकारी होता है उसे सात्म्य कहा जाता है और जो अहितकारी होता है या सात्म्य नहीं होता उसे असात्म्य कहा जाता है| सभी इंद्रियों के अपने अपने विषय हैं| जैसे देखना, सुनना, छूना, सूंघना, स्वाद लेना आदि| इन्द्रियों से अपने विषयों के साथ संयोग को इन्द्रियार्थसंयोग कहा जाता है| यदि यह संयोग अहितकारी हो तो असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग कहा जाता है| इन्द्रियों का अपने विषयों से जब भी अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग होता है तो तमाम तरह के रोग होने लगते हैं| उदाहरण के लिये आँखे देखने के लिये बनी हैं और गर्दन सर को संभालने के लिये बनी है| परन्तु दिन भर टेलीविजन देखना, मोबाइल फ़ोन, फेसबुक और व्हाट्सएप पर गर्दन नीची या टेढ़ी करके दिन-रात चिपके रहना अतियोग कहलाता है| आचार्य सुश्रुत ने कहा है कि (–सु.चि.24.96): न ग्रीवां विषमं धारयेत्|| गर्दन टेढ़ी नहीं रखना चाहिये, परन्तु आज मोबाइल फ़ोन के दुरूपयोग के कारण कई स्कूली बच्चों के 1000 से 5000 घंटे तक सालाना बर्बाद जा रहे हैं| शोध के आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में गर्दन के दर्द का बोझ बढ़ता जा रहा है|
हर्ष या प्रसन्नता का कारण क्या है? इसका उत्तर है कि जिसका जो नियत विधिसम्मत कार्य या धर्म है उसी के अनुरूप कार्य, हितकारी आहार, विहार इत्यादि हर्ष या प्रसन्नता और आरोग्य का कारण होते हैं| उनके उलट अधर्म युक्त अर्थात विधि अनुसार निर्धारित सभी कार्यों के विपरीत कार्य करना और अहितकारी आहार-विहार आदि मनुष्य को शोकाकुल कर देते हैं (च.शा.2.41): धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति| शरीरसत्त्वप्रभवास्तु रोगास्तयोरवृत्त्या न भवन्ति भूयः|| अतः गलत कार्यों और अहितकर आहार-विहार से बचना जरूरी है| शारीरिक तथा मानसिक रोग यदि एक बार ठीक हो गये हों तो ऐसी क्या रणनीति है जिससे दुबारा बीमारी न आये? इसका उत्तर है कि शरीर और मन से उत्पन्न होने वाले रोग पुनः शरीर व मन की अवृत्ति या संबंध ना होने से पुनः नहीं होते। वैसे तो इसका अर्थ यह हुआ कि मोक्ष हो जाने पर शरीर और मन निवृत्त हो जाते हैं और परिणामस्वरूप सब प्रकार के रोगों से भी निवृत्ति हो जाती है|
तथापि जब तक हम जीवित हैं तब तक रोग के हेतुओं से मन और शरीर को दूर रखें तो भी प्रायः रोग नहीं होंगे| शरीर और मन के रहने पर रोगों से बचने के लिये पूर्व में ही सदैव तत्पर रहने वाले जितेन्द्रिय (जिसने अपनी इन्द्रियों पर काबू पा लिया है) व्यक्ति को रोग नहीं होते, जब तक कि तत्काल रोगकारी प्रबल दैव कारण ना हो (च.शा.2.43): सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम्| जितेन्द्रियं नानुपतन्ति रोगास्तत्कालयुक्तं यदि नास्ति दैवम्|| यहाँ यह समझना जरूरी है कि पूर्व में जो कर्म किया गया है वह दैव या भाग्य कहा जाता है| कुछ विद्वान इसे पूर्व जन्म के अर्थ में लेते हैं| जो कर्म वर्तमान में किया गया है वह पौरुष या पुरुषार्थ कहा जाता है| दैव व पौरुष का विषम होना रोगों की प्रवृत्ति का कारण होता है| दोनों का सम या अनुकूल होना रोगों के समाप्त होने या निवृत्ति का कारण होता है (च.शा.2.44): दैवं पुरा यत् कृतमुच्यते तत् तत् पौरुषं यत्त्विह कर्म दृष्टम्| प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुर्हि समः स एव|
ऋतुओं के सन्दर्भ में भी रोगों का होना या बचना देखना उपयोगी है (च.शा.2.45): हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले| घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु|| हेमंत ऋतु में संचित कफ दोष को वसंत ऋतु में, ग्रीष्म ऋतु में संचित वात दोष को वर्षा ऋतु में, तथा वर्षा ऋतु में संचित पित्त दोष को मेघों की समाप्ति पर अर्थात शरद ऋतु में भली प्रकार निकालने वाला व्यक्ति ऋतुओं के समय के अनुसार होने वाले तमाम रोगों को कभी प्राप्त नहीं करता|
सम्पूर्ण चर्चा के निचोड़ रूप में देखें तो (च.शा. 2.46-47): नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः| दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः|| मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः| ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुपतन्ति रोगाः|| हितकर भोजन व जीवन-शैली, समीक्षात्मक दृष्टिकोण, लोभ-लालच, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि विषय-विकारों से मुक्त, उदार और दानी, समत्व-युक्त, सत्यनिष्ठ, क्षमावान, और महान लोगों के प्रति सेवाभावी व्यक्ति निरोगी रहता है। इसी प्रकार सुखदायी मति, बातचीत और कार्य वाले, सच्चाई-युक्त-अनुशासित, विशाल या निर्मल बुद्धि-युक्त, ज्ञान, तप (शाश्वत मूल्यों की प्राप्ति हेतु आत्म-नियंत्रण) एवं योग (चित्त की वृत्तियों के निरोध द्वारा आत्मस्थ होने का अनुशासन) में तत्पर व्यक्ति भी रोगों में नहीं फंसता।
अन्य शब्दों में कहें तो हर परिस्थिति में समीक्षात्मक दृष्टिकोण रखते हुये कार्य संपादन एवं जीवनयापन करना; राग, द्वेष, लोभ, मोह, शोक आदि से दूर रहना; सदैव उदार रहते हुये लोगों की मदद, उपकार एवं दान करते रहना; सफलता-असफलता, सुख-दुख या लाभ-हानि की दशा में समत्व की स्थति में रहना; सत्यनिष्ठ रहते हुये परिवार एवं समाज के साथ व्यवहार करना उत्तम स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है। लोगों से परिस्थितिवश त्रुटियाँ संभाव्य हैं। ऐसी दशा में क्षमावान रहना और क्षमा करते रहना मन-मस्तिष्क के बोझ को दूर करता रहता है। ऐसे व्यक्तियों जिनके शब्द स्वयं ही प्रमाण हों, अर्थात् जिनका कहना सब लोग मानते हों या जो अपने से वरिष्ठ हों, उन सबके प्रति सद्भावी रहना स्वास्थ्य के लिये हितकर होता है। अपना मन, बातचीत और कार्य-व्यवहार सुखकारी रखना चाहिये। विशाल दृष्टिकोण रखना चाहिये। सीखने-समझने, आत्म-नियंत्रित रहने एवं योग में तत्पर रहना चाहिये।
आज की चर्चा में आये पांच प्रश्नों के उत्तर उन व्यक्तियों के लिये आयुर्वेद का निचोड़ कहे जा सकते हैं जो बीमारी को नहीं आने देना चाहते, या जो बीमारी से हाल में ही मुक्त होकर अब स्वस्थ हैं और सदैव स्वस्थ रहना चाहते हैं| भाषा अलग हो सकती है पर यहाँ दिये गए प्रत्येक सूत्र की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने या आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसने पर व्याख्या बिलकुल साफ़ हो जाती है| भाषा-शैली के अंतर के बावजूद आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आयुर्वेद में समानता है| सूत्र रूप में कही गयी बातों को जीवन में उतारने के लिये हमें समय-समय पर यहाँ विस्तृत चर्चा में आये आहार, विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, पंचकर्म, रसायन और औषधि जैसी सात रक्षा दीवारों को सम्हालना सदैव उपयोगी होता है।
डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
(रिटायर्ड हेड ऑफ़ फारेस्ट फ़ोर्स, राजस्थान)
(यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं|)





