एक जंग कैंसर के ख़िलाफ़

कहा जाता है ज्ञान गहरे कुएँ के समान होता है, और किसी भी विषय का अधूरा ज्ञान कितना हानिकारक हो सकता है। स्वास्थ्य और रोगों के बारे में अधूरी जानकारी और ग़लत धारणायें अंत में बहुत परेशानियां खड़ी कर देती हैं। कैंसर की बीमारी के प्रति भी अनेक अफ़वाहें ऐसी हैं जिस पर आज भी अधिकतर लोग आँख मूंदकर विश्वास करते हैं। 

‘कैंसर एक लाइलाज बीमारी है’, लोगों के बीच ऐसी ग़लत धारणायें सिर्फ़ भय को पैदा करती हैं। इस कारण लोग रोग की जाँच करवाने से कतराते हैं, जिसकी वजह से अक्सर उपचार और देखभाल में काफ़ी देरी हो जाती है, और बदतर परिणाम सामने आते हैं। 

हृदय रोग के बाद दुनिया भर में मौत का दूसरा प्रमुख कारण कैंसर है। कैंसर की वजह से प्रति वर्ष लगभग 1 करोड़ जानें जाती हैं। इस रोग की सही जानकारी, सेहत के प्रति सावधानी और सरकार के सहयोग और सही रणनीतियों से प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख जानें बचाई जा सकती हैं। 

विश्व कैंसर दिवस की शुरुआत पेरिस के न्यू मिलेनियम में 4 फरवरी 2000 में कैंसर विश्व सम्मेलन में हुई थी। तभी से हर साल 4 फरवरी को, विश्व कैंसर दिवस  हम सभी को समर्थन देने और अपनी तरफ़ से पूरी मदद देने के लिए प्रेरित करता है। बस इतना ही नहीं, ये हमारी सरकार का भी ध्यान कैंसर की तरफ़ खींचता है, और बेहतर क़दम उठाने के लिए ज़ोर भी डालता है।

विशेषज्ञों का मानना है, कि अगर अभी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक प्रति वर्ष कैंसर से मरने वालो की संख्या 1 करोड़ 30 लाख तक पहुंच जायेगी।  इसलिए सबसे पहले ये जरुरी है, कि इस रोग के प्रति जागरूकता बढे और किसी भी मिथक को बढ़ावा न दिया जाए। पेश हैं, अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के पेज से कुछ अंश जो कैंसर से जुड़े मिथ्यों की हक़ीक़त बयां करते हैं। 

क्या चीनी के सेवन से कैंसर और बढ़ता है

नहीं, हालांकि शोध से पता चला है कि कैंसर कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं की तुलना में अधिक चीनी (ग्लूकोज) का सेवन करती हैं, लेकिन किसी भी अध्ययन ने यह नहीं दिखाया है, कि चीनी खाने से आपका कैंसर और बढ़ेगा या यदि आप चीनी खाना बंद कर देते हैं, तो आपका कैंसर सिकुड़ जाएगा या गायब हो जाएगा। हालांकि अधिक चीनी का आहार अतिरिक्त वजन को बढ़ाने में योगदान कर सकता है, और मोटापा कई प्रकार के कैंसर के विकास के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है।

क्या कैंसर संक्रामक है ?

सामान्य तौर पर, नहीं। कैंसर कोई छूत की बीमारी नहीं है, जो आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल जाती है। एकमात्र अंग प्रत्यारोपण के मामले में कैंसर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। एक व्यक्ति जो ऐसे किसी व्यक्ति से अंग प्राप्त करता है, जिसे अतीत में कैंसर था, उसके भविष्य में प्रत्यारोपण-संबंधी कैंसर विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। हालाँकि  यह जोखिम बेहद कम है। डॉक्टर उन दाताओं के अंगों या ऊतक के उपयोग से बचते हैं जिन्हें कैंसर कि बीमारी रही है।

क्या मोबाइल फ़ोन कैंसर का कारण होते हैं ?

नहीं, अब तक  किए गए सर्वश्रेष्ठ अध्ययनों के अनुसार नहीं। कैंसर आनुवंशिक उत्परिवर्तन (जीन म्युटेशन) के कारण होता है, और मोबाइल फोन एक प्रकार की कम आवृत्ति वाली ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं, जो जीन को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

क्या डिओडोरेंट्स के कारण स्तन कैंसर हो सकता है

नहीं। अब तक के अध्ययनों में स्तन-ऊतक में बदलाव के साथ आमतौर पर एंटीपर्सपिरेंट्स और डिओडोरेंट्स में पाए जाने वाले रसायनों को जोड़ने के कोई सबूत नहीं मिले हैं। 

क्या हेयर डाई के इस्तेमाल से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है ?

इस बात के कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, कि व्यक्तिगत हेयर डाई के इस्तेमाल से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। हालाँकि, कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि नाई नियमित रूप से बड़ी मात्रा में हेयर डाई और अन्य रासायनिक उत्पादों के संपर्क में आते हैं, जिससे मूत्राशय के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। 

क्या ऐसे हर्बल उत्पाद हैं जो कैंसर का इलाज कर सकते हैं ?

नहीं। हालांकि कुछ अध्ययनों से पता चलता है, कि कुछ जड़ी-बूटियों सहित वैकल्पिक या पूरक उपचारों से रोगियों को कैंसर के उपचार के दुष्प्रभावों से निपटने में मदद मिल सकती है, लेकिन कोई भी हर्बल उत्पाद कैंसर के उपचार के लिए प्रभावी नहीं पाया गया है। वास्तव में, कुछ हर्बल उत्पाद कीमोथेरेपी या विकिरण चिकित्सा के दौरान लेने पर हानिकारक हो सकते हैं, क्योंकि वे इन उपचारों के साथ हस्तक्षेप करते हैं। 

तंबाकू, मोटापा, संक्रमण, शराब और प्रदूषण से उचित दूरी बनाकर एक तिहाई से अधिक तरह के कैंसर रोग से बचाव संभव है। समय पर इलाज कराने से कैंसर पीड़ित व्यक्ति को बचाया जा सकता है। इसके लिए कैंसर के लक्षणों की सही जानकारी होना बेहद आवश्यक है। असामान्य गांठ या सूजन, खांसी, सांस फूलना या निगलने में कठिनाई, अप्रत्याशित रक्तस्राव, अस्पष्टीकृत वजन घटना, थकान और पेशाब में असामान्यता जैसे लक्षण दिखाई पड़े, तो चिकित्सक से तुरंत जांच करवानी चाहिए।

उम्मीद की किरण 

भारतीय कैंसर सोसाइटी

इंडियन कैंसर सोसायटी की स्थापना 1951 में डॉ डी.जे. जुसावाला और श्री नवल टाटा ने की थी। ये पहला राष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है, जो भारत में कैंसर रोगियों पता लगाने, उनका इलाज और उपचार प्रदान करने के लिए, और आम लोगो  को इस रोग के बारे में जागरूक करने के लिए काम कर रहा है, ये उन हज़ारों कैंसर पीड़ितों की उम्मीद है जो कैंसर का इलाज करवाने में असमर्थ है।

कैंसर फाउंडेशन ऑफ इंडिया 

कोलकाता स्थित कैंसर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (सी एफ आई), भारत में कैंसर की रोकथाम और नियंत्रण के लिए समर्पित एक स्वैच्छिक संगठन है। सीएफआई में 2002 से अत्यधिक प्रेरित पेशेवरों की एक टीम सक्रिय रूप से कैंसर नियंत्रण गतिविधियों में लगी हुई है।

हेल्पएज इंडिया 

हेल्पएज इंडिया कई विश्वसनीय और सक्षम कैंसर अस्पतालों और संगठनों के साथ साझेदारी में कैंसर के अंतिम चरण के रोगियों को देखभाल प्रदान करता है। ये साथी कैंसर संगठन जागरूकता और कैंसर का पता लगाने वाले शिविरों का भी संचालन करते हैं। 1998 से हेल्पएज इंडिया द्वारा 99,000 से अधिक उपचारों का समर्थन किया गया है।

यू वी कैन- एक नयी उम्मीद 

ऐसी कई हस्तियां हैं, जिन्होंने कैंसर के खिलाफ घुटने नहीं टेके, और कैंसर को पराजित कर दूसरे कैंसर पीड़ितों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गए, मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह का भी नाम इसी सूची में शामिल है।

2011 क्रिकेट विश्व कप के बाद, युवराज सिंह को कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी दिक्कतें हुई। चेकअप के बाद पता चला कि वह फेफड़े के कैंसर से पीड़ित थे।  वह इलाज के लिए अमेरिका गए, और फिर लम्बे समय की चिकित्सा के बाद उन्होंने कैंसर को पराजित किया। बस यही नहीं, उन्होंने राष्ट्रीय टीम में वापसी भी की। उन्होंने जुलाई 2012 में युवराज सिंह फाउंडेशन की पहल ‘यू वी कैन’ की शुरुआत की घोषणा की। यू वी कैन के माध्यम से युवराज बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाकर कैंसर का मुकाबला करने का लक्ष्य रखते हैं।

हर इंसान में अपने लिए, अपनों के लिए और समाज के लिए बदलाव लाने की क्षमता है। कैंसर के प्रति ये लड़ाई सफल जरूर होगी यदि समाज में डॉक्टर, सरकार और आम नागरिक एक जुट होकर इसके खिलाफ लड़ें। जरुरत है लोगो को जागरूक करने की, कैंसर पीड़ितों का हौसला बाँधने की और आवाज़ उठाने की। विश्व कैंसर दिवस इसी आवाज़ को और बुलंद करने का एक जरिया है।

विशिखा मीडिया

विशिखा ने जनवरी 2019 से राजस्थान की राजधानी जयपुर से हिंदी मासिक पत्रिका के रूप में अपनी नींव रखी। राजस्थान में सफलता का परचम फहराने के बाद विशिखा प्रबंधन ने अप्रैल 2021 से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मासिक पत्रिका के रूप में अपना प्रकाशन आरम्भ करने का निर्णय लिया। इसी बीच लोगों की प्रतिक्रियाएं आईं कि विशिखा का प्रकाशन दैनिक समाचार पत्र के रूप में भी होना चाहिये। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए विशिखा प्रबंधन ने 1 जनवरी 2022 से जयपुर से दैनिक समाचार पत्र के रूप में भी अपना प्रकाशन आरम्भ किया। विशिखा में प्रमुख रूप से राजनैतिक गतिविधियों सहित, कला, समाज, पर्यटन, एवं अन्य विषयों से संबंधित विस्तृत आलेख प्रकाशित होते हैं। विशिखा पत्रिका ने अपने विस्तृत आलेखों और दैनिक न्यूज़ विश्लेषण के माध्यम से अपने पाठकों को जानकारी और ज्ञान की दुनिया में ले जाने का महत्वपूर्ण काम किया है। अपनी सटीक खबरों, विस्तृत रिपोर्टों और विशेष विषयों पर आधारित लेखों के साथ, विशिखा ने लगातार अपनी विश्वसनीयता बनायी हुई है। विशिखा मासिक पत्रिका की खबरों की गुणवत्ता, नवीनता और सटीकता को ध्यान में रखते हुए इस पत्रिका ने अपने पाठकों का दिल जीता है। यह पत्रिका न केवल जानकारी उपलब्ध कराती है, बल्कि लोगों के बीच अपने विचारों के आदान प्रदान के लिए एक मंच भी उपलब्ध करती है। इसके लेखक, संपादक और टीम का प्रयास निरंतर यह होता है कि पाठकों को एक अच्छा अनुभव देने के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दों के साथ-साथ समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करें। विशिखा का लक्ष्य आपको विभिन्न विषयों पर अद्भुत लेखों से परिचित कराना है। पत्रिका के माध्यम से हम लेखकों, संगठनों, एवं समाज के प्रतिष्ठित और सामान्य लोगों को उनकी रचनात्मक योग्यताओं के आधार पर साझा करने का प्रयास करना है। पत्रिका टीम का मूल मंत्र है- रचनात्मकता, नैतिकता और उच्चतम गुणवत्ता। विशिखा हिंदी मासिक पत्रिका है जो 2019 में शुरू हुई थी। वर्तमान में यह राजस्थान और उत्तराखंड से प्रकाशित की जाती है। इसमें विभिन्न विषयों पर लेख शामिल होते हैं जैसे कि करंट अफेयर्स, साहित्य, महिलाएं, यात्रा और अधिक। हमारी पत्रिका उन लोगों के लिए है जो ज्ञान और सूचना की तलाश में होते हैं और उन्हें उन विषयों से रुबरु कराने का एक मंच प्रदान करती हैं।

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