
10 से 12 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें
विधानसभा चुनावों के समापन के साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईंधन के दामों में 10 से 12 रुपये प्रति लीटर तक इजाफा हो सकता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते सरकारी तेल कंपनियों को हर महीने लगभग 27,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव का अंतिम चरण पूरा होने के बाद कीमतों में वृद्धि की संभावना तेज हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में 94-96 रुपये प्रति लीटर बिक रहा पेट्रोल बढ़कर 120 रुपये प्रति लीटर के पार जा सकता है, जो अब तक का रिकॉर्ड स्तर होगा। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है। इस स्थिति में तेल कंपनियों के लिए रिफाइनिंग के बाद कम कीमत पर ईंधन बेचना मुश्किल हो गया है। कोटक की रिपोर्ट के अनुसार, इस वजह से कंपनियों को हर महीने भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती और विंडफॉल एक्सपोर्ट टैक्स जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन ये राहत पर्याप्त साबित नहीं हो रही। कच्चे तेल और खुदरा कीमतों के बीच का अंतर अभी भी बना हुआ है।
मिडिल ईस्ट तनाव और सप्लाई संकट
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ा है। होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हुई है, जिससे कीमतों में उछाल बना हुआ है। हालिया संघर्ष विराम के दौरान कुछ राहत मिली थी, लेकिन दोबारा तनाव बढ़ने से बाजार में अस्थिरता कायम है। रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल के वायदा और वास्तविक दामों के बीच बढ़ता अंतर भी सप्लाई पर दबाव का संकेत दे रहा है। भारत में इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। मार्च-अप्रैल के दौरान तेल आयात में 13-15 फीसदी की कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद दैनिक आयात बिल 190 से 210 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यानी कम मात्रा में आयात के बावजूद खर्च बढ़ गया है।
आम जनता पर असर
पेट्रोल-डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होगा। सब्जियां, फल और अन्य आवश्यक सामान महंगे हो सकते हैं, साथ ही डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स खर्च भी बढ़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों में बढ़ोतरी एक साथ नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से हो सकती है, ताकि महंगाई पर अचानक दबाव न पड़े। हालांकि, अंततः इसका असर आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।






