
साल 2022 में दुनिया भर में कैंसर के अनुमानित दो करोड़ नए मामले सामने आए, और इस जानलेवा बीमारी से 97 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कैंसर के मामले इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? क्या इसके पीछे मोबाइल फोन का बढ़ता इस्तेमाल, वाई-फाई या 5G जैसी आधुनिक तकनीकें जिम्मेदार हैं?
अगर मौजूदा दौर की सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों की बात करें, तो कैंसर उनमें प्रमुख है। पिछले एक-दो दशकों में यह बीमारी तेजी से आम होती गई है। आज कैंसर केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि महिला-पुरुष, युवा और यहां तक कि 10 साल से कम उम्र के बच्चों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। जिस रफ्तार से कैंसर लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, उसने दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2022 में वैश्विक स्तर पर कैंसर के करीब दो करोड़ नए मामले दर्ज किए गए और 97 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक कैंसर मरीजों की संख्या बढ़कर 3.5 करोड़ से अधिक हो सकती है। कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने, इसकी रोकथाम, समय पर पहचान और बेहतर इलाज को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हर साल 4 फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे मनाया जाता है।
क्यों बढ़ रहा है कैंसर का खतरा?
कैंसर के बढ़ते मामलों को लेकर विशेषज्ञ शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, असंतुलित खानपान, खाद्य पदार्थों में मिलावट, पर्यावरण प्रदूषण और शराब-धूम्रपान जैसी आदतों को मुख्य कारण मानते हैं। तंबाकू और शराब का सेवन, फास्ट फूड, अत्यधिक तला-भुना और प्रोसेस्ड भोजन शरीर में कैंसरकारी तत्वों को बढ़ावा देता है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में वाई-फाई और 5G जैसी तकनीकों के तेजी से प्रसार ने लोगों के मन में यह शंका भी पैदा कर दी है कि कहीं इनसे निकलने वाला रेडिएशन कैंसर का कारण तो नहीं बन रहा।
क्या मोबाइल फोन से कैंसर का खतरा है?
अक्सर लोग मोबाइल फोन को लंबे समय तक कान से लगाकर रखते हैं या जेब में रखते हैं। इसी वजह से कुछ लोगों को यह चिंता सताती है कि मोबाइल से निकलने वाला रेडिएशन ब्रेन कैंसर या शरीर के अन्य हिस्सों में कैंसर का कारण बन सकता है।
कैंसर रिसर्च यूके सहित कई वैज्ञानिक संस्थानों के अनुसार, मोबाइल फोन और वाई-फाई से निकलने वाला रेडिएशन इतना शक्तिशाली नहीं होता कि वह डीएनए को नुकसान पहुंचाकर कैंसर पैदा कर सके। मोबाइल फोन और टावर से निकलने वाली रेडियो तरंगों में कैंसर उत्पन्न करने के लिए जरूरी ऊर्जा नहीं होती।
वाई-फाई और ब्लूटूथ को लेकर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों के मुताबिक, मोबाइल, वाई-फाई और ब्लूटूथ जैसी तकनीकें रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन का इस्तेमाल करती हैं। यह नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन होता है, जो रेडियो, टेलीविजन और माइक्रोवेव ओवन से निकलने वाली तरंगों के समान है।
• ये रेडियो तरंगें डीएनए को नुकसान पहुंचाने में सक्षम नहीं होतीं।
• इसलिए इनके जरिए कैंसर होने का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है।
• वाई-फाई और ब्लूटूथ जैसी वायरलेस तकनीकों से भी कैंसर होने के प्रमाण नहीं मिले हैं।
साल 2011 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को संभावित रूप से कैंसरकारी बताया था, लेकिन इस विषय पर किए गए अध्ययनों में विरोधाभासी नतीजे सामने आए हैं।
• 2017 की एक रिसर्च में वायरलेस डिवाइस से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड को ग्लियोमा जैसे ब्रेन ट्यूमर के खतरे से जोड़ा गया।
• वहीं 2018 की एक अन्य स्टडी में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड और ब्रेन ट्यूमर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया।

क्या 5G तकनीक से कैंसर का खतरा है?
डब्ल्यूएचओ ने साल 1996 में इंटरनेशनल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का अध्ययन करता है।
डब्ल्यूएचओ, कैंसर रिसर्च यूके और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर जैसी प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाओं के अनुसार, 5G तकनीक से कैंसर होने का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है। 5G में नॉन-आयोनाइजिंग रेडियो तरंगों का इस्तेमाल होता है, जिनमें डीएनए को सीधे नुकसान पहुंचाने की क्षमता नहीं होती। भले ही 5G में पिछली तकनीकों की तुलना में फ्रीक्वेंसी थोड़ी अधिक हो, लेकिन इसकी एनर्जी लेवल तय सुरक्षा मानकों के भीतर और सुरक्षित मानी जाती है। 5G, 4G या मोबाइल फोन के इस्तेमाल को कैंसर से जोड़ने वाला कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
अस्वीकरण: किसी भी बीमारी से जुड़ी सही जानकारी और सलाह के लिए अपने डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।






