कांग्रेस को पराजित कर केंद्र में वी.पी.सिंह की सरकार बनी थी,सरकार को एक तरफ दक्षिणपंथी पार्टी भारतीय जनता पार्टी और दूसरी तरफ उनकी धुर विरोधी वामपंथी दल समर्थन कर रहे थे।वी.पी.सिंह को दोनों की सुननी पड़ रही थी।उन दिनों जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर पहुंच चुका था।दरअसल इसकी शुरुआत तो बहुत पहले हो चुकी थी मगर परवान 1987 के विधानसभा चुनाव के बाद चढ़ा।इस चुनाव में उनकी बुरी तरह हार हुई थी जो पाकिस्तानपरस्त थे।उन्होंने ये आरोप लगाया कि चुनाव में धांधली हुई है।चुनाव परिणाम से अलगाववादी नेताओं के अलावा पाकिस्तान भी चितिंत था क्योंकि उसे डर सता रहा था कि अगर कश्मीरी अवाम ने शांतिपूर्ण ढंग से सोचना शुरू कर दिया तो उसका आतंकवाद का एजेंडा धरा का धरा रह जाएगा।पाकिस्तान के सहयोग से अलगाववादियों ने एक चरमपंथी संगठन “जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट”(जेकेएलएफ) का गठन किया, जिसका उद्देश्य हथियार के दम पर कश्मीर को भारत से आजाद करना था।
जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं के खिलाफ नफरत की बीज 1986 में ही पड़ चुकी थी जब फारूक अब्दुल्ला के साले गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने बहनोई को बेदखल कर सत्ता छीन ली थी। उनको जानने वाले कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ कश्मीरी मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया था। गुलाम मोहम्मद शाह अच्छी तरह समझ गए थे कि उन्हें ज्यादा दिन सत्ता में नही रहने दिया जाएगा। उन्हें लगा कि कुछ विवादित मुद्दों को उठाकर वे कश्मीरी मुसलमानों के हीरो बन सकते हैं। उनके एक विवादित निर्णय से दोनों समुदाय के लोगों के बीच खाई और चौडी हो गई। शाह सरकार ने एक विवादित निर्णय ये लिया कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर भव्य शाह मस्जिद बनवाई जाएगी। चूंकि वो पुराना मंदिर था, और लोग वहां पूजा-पाठ के लिए जाते थे, इसको तोड़ने के सरकार के निर्णय का विरोध होना शुरू हो गया। रोज प्रर्दशन होते और गिरफ्तारियां आम बात हो गई थीं।
गौरतलब है कि इंदिरा गांधी के ही कहने पर तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन ने फारूक अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त कर गुलाम मोहम्मद शाह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई थी। फारूक अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त करने के लिए ही संजय गांधी के बेहद निकटवर्ती जगमोहन को राज्यपाल बनाया गया था, दरअसल इंदिरा गांधी के रिश्ते के भाई बीजू नेहरू उन दिनों जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हुआ करते थे और वे अब्दुल्ला परिवार के बेहद निकट थे। उन्होंने फारूक अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त करने से मना कर दिया था तब बीजू नेहरू को हटाकर कडक जगमोहन को राज्यपाल बनाया गया।
मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के इस निर्णय के कारण हिंदू समाज आंदोलित था। गुलाम मोहम्मद शाह ने ये कहकर दोनों धर्मावलंबियों के बीच और वैमनस्य फैला दिया कि हिंदुओं के कारण इस्लाम खतरे में है। ये बात वहाँ के आम जनमानस के दिलोदिमाग में बैठ गई और साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गए। साउथ कश्मीर और सोपोर में तो हालत बद से बदतर हो जा रहे थे, सरकार दंगा रोकने में नाकाम थी या साजिशन रोकना नही चाहती थी। राज्यपाल जगमोहन ने दंगा रोकने में विफलता का आरोप मढ़कर 12 मार्च 1986 को शाह सरकार को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया।
गुलाम मोहम्मद शाह ने जो जहर बोया था उसका परिणाम 14 सितंबर 1989 को पहली बार तब देखने को मिला जब भाजपा नेता पंड़ित टीकालाल टपलू को सबके सामने गोलियों से भून दिया गया। हत्यारे स्थानीय लड़के थे जो नए नए जेकेएलएफ में शामिल हुऐ थे, कोई भी गवाही देने सामने नही आया। उसके बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या हो गई। जज नीलकंठ गंजू ने जेकेएलएफ के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। गंजू की पत्नी का अपहरण कर लिया गया जो फिर कभी नही मिली। वकील प्रेमनाथ भट्ट की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या हो गई। ये बडे लोग थे छोटे लोगों की तो कोई गिनती ही नही थी।
19 जनवरी 1990 को घाटी के सभी मस्जिदों से ये एलान किया गया कि “असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअर त बटनेव सान” (हमें पाकिस्तान चाहिए, पंड़ितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ)। इस ऐलान के बाद तो कश्मीरी पंडितों की हत्या और उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार का जो सिलसिला घाटी में शुरू हुआ वो कई सालों तक चला।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन अपनी किताब “दहकते अंगारे” में लिखते हैं कि “वह रात मेरे जीवन की सबसे अजीब रात थी। मैं सोने वाला ही था कि मेरे बिस्तर के दोनों तरफ रखे टेलीफोन एक साथ बजने लगे। टेलीफोन के दूसरी तरफ से आतंक से कांपती आवाजें आ रही थीं आज की रात हमारी आखिरी रात है। सुबह तक हम कश्मीरी पंडितों को मार दिया जाएगा।”
जगमोहन ने उसी रात सेना को जम्मू-कश्मीर में तैनात कर दिया। सुबह होते होते सैकड़ों कश्मीरी पंडितों को मार दिया गया, उनके घरों को जलाया गया और उनकी बहू बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार कर मानवता को शर्मसार किया था अलगाववादियों ने। राज्यपाल जगमोहन अगर सेना न बुलाते तो लाखों कश्मीरी पंडितों को मार दिया जाता। जगमोहन के कारण ही कश्मीरी पंडितों को सुरक्षित घाटी से निकालकर राहत कैंपों में पहुँचाया गया था। राज्यपाल उन्हें मरने के लिए उनके घरों में कैसे छोड़ सकते थे जब उन्माद अपने चरम पे था।
सैफुद्दीन सोज ने अपनी किताब में लिखा है कि घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए जगमोहन जिम्मेदार थे। मेरे ख्याल से उनका ये आरोप बिल्कुल गलत है, अगर जगमोहन उन्हें सुरक्षित कैंपों में न रखते तो बहुत बडा कत्लेआम हो सकता था। उन दिनों कश्मीर पुलिस का साम्प्रदायिकरण हो गया था, वे आंतकियों को पकड़ने की कोशिश भी नही करते थे। अस्पतालों में हिंदुओं के साथ भेदभाव होता था। राज्यपाल के रूप में मैं जगमोहन की भूमिका की सराहना करता हूँ, उन्होंने कश्मीरी पंडितों को सुरक्षित कैंपों में पहुँचाकर मानवता का भला ही किया था।
अजय श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार






