बेहद कारगर हो सकता है ई-वोटिंग का विकल्प

अब पैसे का लेनदेन डिजिटल हो गया है। हमारे कीमती दस्तावेज डिजिटल हो गए हैं। काम-धंधा डिजिटल हो गया है। यहां तक कि संसद डिजिटल हो चुकी है, तो चुनाव डिजिटल क्यों नहीं हो सकते? जब तमाम प्रयासों के बावजूद मत प्रतिशत बढ़ाना बड़ी चुनौती साबित हो रहा हो, तो ये आइडिया बदलाव ला सकता है। ऑफलाइन के साथ ही ऑनलाईन मोड का विकल्प कारगर हो सकता है। इससे लोकतंत्र के पर्व में ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी हो सकती है। इस सिस्टम में क्या नया है, कहां-कहां ये आजमाए गए, कैसे इसको फूलप्रूफ बनाया जा सकता है, चुनौतियां क्या हैं, समाधान क्या हैं, इन सब सवालों के जवाब देती एक खास रिपोर्ट…
ई वोटिंग की बात करना अब जरूरी हो गया है क्योंकि चुनाव आयोग से लेकर राजनीतिक दलों तक के मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी मत प्रतिशत 65 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ पा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तो ये जैसे-तैसे 60 फीसदी भी नहीं पहुंच पाता। एक दौर वो भी था, जब 30-35 फीसदी मतदान में ही सरकारें बन जाती थीं। 20-25 फीसदी वोट पाने वाला दल सत्ता पर काबिज हो जाता था। साफ है कि कम वोटिंग नतीजों का सही विश्लेषण नहीं हो सकती।
क्या ऑनलाइन वोटिंग का आइडिया नया है?
नहीं। इस आइडिया पर एक्सपर्ट अपने-अपने तरीके से काम कर रहे हैं। मल्टी लेयर सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और कोडिंग-डीकोडिंग तकनीक के जरिये ऑनलाईन वोटिंग का प्रयोग किया जा सकता है। शुरुआत छोटे स्तर से ही सही, करनी तो होगी। कुछ समय पहले आई फिल्म ‘यंगिस्तान’ में पहली बार ई वोटिंग से बदलाव की पटकथा लिखी गई।
अगर देश में यह प्रयोग शुरू हो तो क्या नया होगा?
नहीं। कई छोटे देशों में ऑफलाइन के साथ ही ऑनलाईन वोटिंग की व्यवस्था है। ये देश भले ही भारत के सामने बहुत छोटे हों, लेकिन मतदान बढ़ाने में वहां उठाए गए कदमों पर गौर जरूर किया जा सकता है। बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, अर्जेंटीना आदि में अनिवार्य मतदान का प्रावधान है। यूरोप के खूबसूरत देश एस्टोनिया में ऑनलाईन वोटिंग का आगाज वर्ष 2005 में किया गया। वर्ष 2007 के आम चुनाव में इसका इस्तेमाल किया गया।
ऑस्ट्रेलिया भी ऑनलाईन वोटिंग का इस्तेमाल कर चुका है। वहां इस सिस्टम को नाम दिया गया था-आईवोट। शुरुआत में न्यू साउथ वेल्स के लोगों को ऑनलाईन वोटिंग की सुविधा दी गई।
कम मतदान की वजहें जिनका व्यावहारिक हल निकालना होगा
मौसम का असर
बुजुर्गों की संख्या
बीमार व दिव्यांग
पढ़ाई व नौकरी करने शहर से बाहर गए युवा
पारिवारिक स्थितियों के कारण महिलाओं का वोट न डाल पाना
ऑनलाइन वोटिंग के इस प्रारूप पर भारत में हो रहा अध्ययन
तकनीकी संस्थान और एक्सपर्ट भारत में ऑनलाईन वोटिंग के प्रारूपों पर लगातार अध्ययन कर रहे हैं, जो इस तरह सामने आया है।
ऑनलाईन वोटिंग के लिए सबसे पहले मतदाता को चुनाव आयोग के पोर्टल पर लाग-इन करना होगा।
यूनीक यूजर आईडी के तौर पर आधार नंबर को इस्तेमाल किया जा सकता है।
मतदाता ऑथेंटिकेशन के लिए अति महत्वपूर्ण पासवर्ड का उपयोग किया जाएगा।
यही ऑथेंटिकेशन सत्यापित करेगा कि वास्तविक यूजर ही अपने अकाउंट को लाग-इन कर रहा है।
जब हम केवल पासवर्ड पर निर्भर रहते हैं, तो इसे सिंगल फैक्टर ऑथेंटिकेशन कहा जाता है, लेकिन मतदान के लिए ये पर्याप्त सुरक्षित नहीं है। हैकर आपका पासवर्ड तोड़ सकता है और आपके अकाउंट से वोट डाल सकता है।
इसे रोकने के लिए सिंगल फैक्टर की जगह मल्टी फैक्टर ऑथेंटिकेशन का प्रयोग किया जाएगा।
मल्टी फैक्टर ऑथेंटिकेशन : तीन चरणों में इस तरह पहचान को कर सकते हैं पुख्ता
ऐसा कुछ जो वोटर के पास है : यानी उसकी पहचान बताने के लिए एटीएम कार्ड, आरएफआईडी कार्ड, डिजिटल ड्राइविंग लाइसेंस, स्मार्ट टोकन आदि का इस्तेमाल।
ऐसा कुछ जो केवल वोटर खुद जानता हो : यानी पासवर्ड, ओटीपी, पिन नंबर, अनलॉक पैटर्न, सुरक्षा संबंधी प्रश्न आदि।
बायोमीट्रिक की व्यवस्था : यानी शारीरिक पहचान, अंगूठे का निशान, रेटिना डिटेक्शन, फेस आइडेंटिफिकेशन आदि।

कुछ इस तरह से ऑनलाइन वोटिंग को सुरक्षित बनाया जा सकता है
ऑथेंटिकेशन-1 : यूजर आईडी यानी आधार नंबर से लॉग इन
ऑथेंटिकेशन-2 : मजबूत दस अंकों का पासवर्ड
ऑथेंटिकेशन-3 : रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर ओटीपी
ऑथेंटिकेशन-4 : यूजर को सही पैटर्न बनाना होगा। तीन मौके मिलेंगे।
ऑथेंटिकेशन-5 : सुरक्षा प्रश्न का उत्तर
ऑथेंटिकेशन सफल होने के बाद आनलाईन वोट डालने की अनुमति।
 चुनौतियां तो हैं… पर सबका समाधान संभव है
चुनौती-1 : भारत में आज भी हर जगह इंटरनेट नहीं और बड़ी संख्या में लोग तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हैं।
समाधान : जब भी हम किसी नई तकनीक को अपनाते हैं तो ‘बैकवर्ड कम्पैटिबिलिटी’ के सिद्धांत को अपनाते हैं। आसान शब्दों में कहें तो नई तकनीक को विकल्प के तौर पर आजमाते हैं। ऑनलाईन वोटिंग एक विकल्प के रूप में दिया जाए। खासकर उन लोगों के लिए जो घर से दूर हैं। बुजुर्ग, बीमार या फिर दिव्यांग हैं।
चुनौती-2 मतदाता किसी लालच में लाॅग-इन करने के बाद किसी दूसरे से वोट डलवा सकता है। ऐसे में निष्पक्ष मतदान प्रभावित हो सकता है।
समाधान : इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और जेस्चर रिकग्निशन टेक्नोलाॅजी बेहद कारगर होगी। वोटिंग के दौरान यूजर को अपना वेबकैम ऑन करना होगा। एआई उसके चेहरे को स्वत: सरकारी डाटाबेस से मैैच करेगा। जेस्चर रिकग्निशन तकनीक की वजह से किसी और की उपस्थिति में मतदान संभव ही नहीं होगा।
चुनौती-3 : किस पार्टी को वोट दिया, ये साक्ष्य दिखाकर मतदाता पैसा वसूल सकता है।
समाधान : ऑनलाईन वोटिंग में वोट डालते ही डिसएबल यानी अदृश्य हो जाएगा। उसका न तो प्रिंट स्क्रीन लिया जा सकेगा और न ही स्क्रीनशाॅट। चूंकि अदृश्य है, तो मोबाइल से फोटो लेने पर भी स्क्रीन खाली दिखेगी।ऑनलाइन वोटिंग के फायदे : महज 10 से 12 हजार करोड़ में हो जाएगा चुनाव
मतदान बढ़ने से लोकतंत्र वास्तविक तौर पर परिभाषित होगा।
आपदा या विषम हालात में ऑनलाईन वोटिंग प्रभावशाली साबित होगी।
चुनावी खर्च बचेगा। इस बार लोकसभा चुनाव पर करीब 60 हजार करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। एक्सपर्ट के अनुसार यह खर्च घटकर 10 से 12 हजार करोड़ रह जाएगा।
देशभर में मतदान प्रक्रिया तीन दिन में पूरी हो जाएगी।
राजनीति को लेकर उदासीन युवा पीढ़ी सक्रिय भागीदारी बढ़ाएगी।
ऑनलाइन वोटिंग असंभव नहीं है
ऑनलाइन वोटिंग असंभव नहीं है। इसे सही तकनीक और योजना के जरिये लागू किया जा सकता है। साइबर हमलों से बचाने के लिए सिस्टम विकसित करना होगा। ये संभव है क्योंकि आरबीआई, इनकम टैक्स, जीएसटी, बैंक जैसे अति संवेदनशील सेक्टर पूरी तरह डिजिटल हो चुके हैं। जब हमारी सारी सूचनाएं पूरी तरह सुरक्षित रह सकती हैं, तो ऑनलाईन वोटिंग भी सुरक्षा मामलों में अभेद्य हो सकती है।

विशिखा मीडिया

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