अलविदा…. मशहूर तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन साहब

देश के मशहूर तबला वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसैन साहब का निधन हो गया है। पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित ज़ाकिर हुसैन ने सोमवार सुबह अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में अंतिम सांस ली। 73 वर्षीय उस्ताद ज़ाकिर हुसैन को रक्तचाप की समस्या के चलते अमेरिका के एक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। लगभग 62 साल तक तबले के साथ अपनी जुगलबंदी से दुनिया को मंत्रमुग्ध करने वाले ज़ाकिर हुसैन से जुड़े कुछ अनसुने किस्से…
बचपन में ज़ाकिर हुसैन को क्रिकेट का बहुत शौक था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन उनके पिता उस्ताद अल्ला रक्खा साहब चाहते थे कि वह तबला वादक बनें। हालांकि, उन्होंने ज़ाकिर को क्रिकेट खेलने से कभी रोका नहीं। लेकिन एक बार क्रिकेट खेलते हुए ज़ाकिर की उंगली टूट गई, जिसके बाद उनके पिता ने सख्ती से उन्हें क्रिकेट खेलने से मना कर दिया।
ज़ाकिर हुसैन ने एक इंटरव्यू में फिल्म मुगल-ए-आजम से जुड़ा एक किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता और मशहूर निर्देशक के. आसिफ अच्छे दोस्त थे। बचपन में उनके पिता के मित्र शौकत उन्हें मुगल-ए-आजम के सेट पर ले गए। मोहन स्टूडियो में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गाने की शूटिंग चल रही थी। वहीं शौकत ने उनकी मुलाकात दिलीप कुमार से करवाई, जिन्होंने उनके सिर पर हाथ रखकर युवा सलीम के किरदार के लिए मंजूरी दी। लेकिन जब के. आसिफ ने उनके पिता से बात की तो अब्बा नाराज़ हो गए। उन्होंने कहा कि ज़ाकिर को तबला बजाना है, अभिनेता नहीं बनाना। इस तरह ज़ाकिर का अभिनय करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया। हालांकि, बाद में ज़ाकिर हुसैन ने हीट एंड डस्ट, द परफेक्ट मर्डर, साज, मंटो और मंकी मैन जैसी फिल्मों में काम किया और साज, इन कस्टडी, लिटिल बुद्धा और मिस्टर एंड मिसेज अय्यर जैसी फिल्मों में संगीत भी दिया।
अपनी पहली परफॉर्मेंस का किस्सा बताते हुए ज़ाकिर हुसैन ने कहा कि वह 12 साल की उम्र में अपने पिता के साथ उस्ताद अली अकबर खान के कार्यक्रम में गए थे। वहां उनके पिता ने उन्हें स्टेज पर बिठा दिया, और उन्होंने 20 मिनट तक तबला बजाया। इसके लिए उन्हें 100 रुपये मिले, जो आज भी उनके पास हैं। यह उनके लिए करोड़ों रुपये के बराबर थे। खास बात यह थी कि उन्होंने पहली बार 7 साल की उम्र में उस्ताद अली अकबर खान के साथ संगत की थी।
ज़ाकिर हुसैन ने एक मजेदार किस्सा साझा करते हुए कहा कि वह एक बार सैन फ्रांसिस्को में इमिग्रेशन के दौरान फंस गए। अधिकारी ने उनसे पूछा कि क्या वह पंडित रवि शंकर को जानते हैं। जब उन्होंने हां कहा तो अधिकारी ने पूछा, “उनके बाद भारत के दूसरे सबसे बड़े संगीतकार कौन हैं?” उनकी पत्नी ने तुरंत जवाब दिया, “वह यहीं खड़े हैं। आप चाहें तो गूगल कर लीजिए।”
ज़ाकिर हुसैन को कभी यह पसंद नहीं था कि लोग उन्हें “उस्ताद” कहें। वह अक्सर कहते थे, “मैं सिर्फ ज़ाकिर हूं, उस्ताद नहीं।” उन्होंने बताया कि कुछ आयोजकों ने अपने कार्यक्रम की टिकट बेचने के लिए उनके नाम के आगे “उस्ताद” लगाना शुरू कर दिया था, लेकिन उन्हें यह उपाधि खुद के लिए सही नहीं लगती थी।
उन्होंने यह भी बताया कि वह कभी स्टेज पर परफॉर्मेंस की योजना नहीं बनाते थे। जो कुछ भी बजाना होता था, वह वहां के माहौल और दर्शकों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता था।

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