प्रसिद्ध अभिनेत्री ममता कुलकर्णी बनीं किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर

महामंडलेश्वर का चयन होने पर एक भव्य समारोह आयोजित किया जाता है, जिसे राज्याभिषेक कहा जाता है। इस अवसर पर नए महामंडलेश्वर को आशीर्वाद दिया जाता है और दंड, आसन तथा अंगवस्त्र प्रदान किए जाते हैं, जो उनकी नई पदवी का प्रतीक होते हैं।

प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज में महाकुंभ के पावन आयोजन के दौरान देश-विदेश से श्रद्धालु पवित्र स्नान और दिव्य उत्सव का हिस्सा बनने आ रहे हैं। फिल्मी दुनिया के बड़े कलाकार भी इसमें भाग ले रहे हैं। 90 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री ममता कुलकर्णी ने त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाकर किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर पदवी ग्रहण की। आइए जानते हैं, महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया और किन्नर अखाड़े का इतिहास।

महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया
महामंडलेश्वर बनने के लिए उम्मीदवार को अपने गुरु और अखाड़े के वरिष्ठ सदस्यों का समर्थन प्राप्त करना होता है। गुरु के मार्गदर्शन में उम्मीदवार की धार्मिक और आध्यात्मिक योग्यता का आकलन किया जाता है। इसके बाद, अखाड़े की परंपराओं के अनुसार त्रिवेणी संगम में स्नान और पिंडदान किया जाता है। इसके बाद भगवान वस्त्र धारण कराए जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है, जिसे उनकी पवित्रता और शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है। अखाड़े के वर्तमान महामंडलेश्वर उन्हें नया नाम देते हैं। उदाहरण के लिए, ममता कुलकर्णी का नया नाम श्री यमाई ममतानंद गिरी रखा गया।

किन्नर अखाड़े का इतिहास
किन्नर अखाड़े की स्थापना 2015 में हुई थी। यह मुख्यधारा के 13 प्रमुख अखाड़ों से अलग अपनी पहचान रखता है। किन्नर अखाड़े में साधकों को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह के जीवन जीने की स्वतंत्रता दी जाती है। इसका मुख्य आश्रम उज्जैन में स्थित है।

दायित्व और उत्तरदायित्व
महामंडलेश्वर बनने के बाद व्यक्ति को किन्नर अखाड़े के धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों का नेतृत्व करना होता है। धर्म का प्रचार-प्रसार करना, अखाड़े की परंपराओं को बढ़ावा देना और किन्नर समुदाय के अधिकारों के लिए कार्य करना उनकी जिम्मेदारियों में शामिल होता है।

समाज में भूमिका
महामंडलेश्वर का पद केवल उन्हें दिया जाता है जो धार्मिक रूप से सक्षम होने के साथ-साथ समाज में आदर्श नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। यह प्रक्रिया किन्नर समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है, जो इस समुदाय की विशिष्ट पहचान और उनके समाज व धर्म में योगदान को दर्शाती है।
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