बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के अवसर पर कांशीराम ने कहा था कि उनकी पार्टी पहला चुनाव हारने के लिए लड़ेगी, दूसरा चुनाव ध्यान आकर्षित करने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लडेगी। उन्होंने अपनी बात का अक्षरतः पालन किया। कांशीराम 1988 में इलाहाबाद सीट से तथाकथित बोफोर्स तोप घोटाले को उजागर कर हीरो बने और प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ चुनाव लडे। इस महत्वपूर्ण चुनाव में वे अपने मकसद में कामयाब रहे। दलितों ने एकजुट होकर उन्हें वोट किया था। उनकी हार केवल 70,000 वोटों से हुई थी। दलितों को साधने के बाद कांशीराम की नजर पिछडे मतदाताओं पर थी। वे अच्छी तरह समझ गए थे कि उनकी छवि दलित नेता की बन गई है और वे अकेले पिछडों को अपने साथ नहीं कर सकते हैं।
बेबाक राय रखने वाले कांशीराम ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि मुलायम सिंह से वे हाथ मिला लें तो उ.प्र से सभी दलों का सुपड़ा साफ हो जाएगा। दूरदृष्टा कांशीराम जानते थे कि उनका मिशन पिछडों के बिना पूरा नहीं हो सकता। मुलायम सिंह ने जब इंटरव्यू पढा तो वो कांशीराम से मिलने दिल्ली स्थित उनके आवास पर गए। दोनों में घंटों बातें हुई और भविष्य की रूपरेखा तय हो गई। कांशीराम ने ही मुलायम सिंह यादव को अपनी पार्टी बनाने की सलाह दी थी। बसपा सुप्रीमो की सलाह मानते हुए मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया।
1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद विधानसभा चुनाव आ गया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने आपसी समझौते के तहत चुनाव लडा। सपा ने 256 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे तो बसपा ने 164 सीटों पर। समझौते में ये भी तय हुआ था कि लोकसभा चुनाव में बसपा 60% सीटों पर चुनाव लडेगी। ये वो दौर था जब कल्याण सिंह बाबरी विध्वंस में सरकार गवां कर हीरो बने हुए थे। जय श्रीराम का नारा अन्य नारों पर भारी पड़ रहा था। चुनाव के परिणाम ने सभी को चकित करते हुए गठबंधन की सरकार बना दी। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। शपथग्रहण के समय बहुजन कार्यकर्ताओं का ये नारा “मिले मुलायम-कांशीराम,हवा हो गए जय श्रीराम” बहुत चर्चित हुआ था।
कांशीराम ने ही सोशल इंजीनियरिंग का ये फार्मूला तैयार किया था। उनकी नजर हमेशा दिल्ली के सिंहासन पर थी। बताते हैं कि एक बार पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी ने कांशीराम को सलाह दी थी कि वे राष्ट्रपति का चुनाव लडें। भाजपा और उनकी सहयोगी दल उनका समर्थन करेंगे और वे आसानी से राष्ट्रपति बन जाएंगे मगर कांशीराम ने ससम्मान बाजपेयी जी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। कांशीराम ने कहा था कि वे रबर स्टैंप नहीं बनना चाहते। वे प्रधानमंत्री बन दलितों के लिए कुछ करना चाहते हैं।
आज कांशीराम की जयंती है वे अगर होते तो 88 साल के होते। कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 में पंजाब के रूपनगर जिले में हुआ था। वो रामदासिया समुदाय से आते हैं जिसे अछूत माना जाता था। उनके पिता का नाम हरि सिंह था। वे छह भाई-बहनों में सबसे बडे थे। आपकी माताजी का नाम बिशन कौर था। कांशीराम के दादा ढेलो राम आर्मी में थे। गांव में अच्छी खेतबारी होने के कारण कांशीराम के पिता ने सेना में नौकरी नहीं की जबकि कांशीराम के सभी चाचा फौज में मुलाजिम थे।
कांशीराम की स्कूली शिक्षा स्थानीय स्कूलों से ही हुई। वे पढ़ने में बेहद तेज थे। इंटर अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने के बाद कांशीराम ने सन् 1956 में रूपनगर गवर्नमेंट कालेज से बीएससी की डिग्री हासिल की। जो उस जमाने में उनकी बिरादरी में बहुत बडी उपलब्धि थी। कालेज की पढाई पूरी करते ही वे पुणे चले गए जहां उन्होंने “एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी” में काम करना शुरू किया। यह नौकरी उन्हें आरक्षण के तहत मिली थी। नौकरी के दौरान उन्हें काफी भेदभाव का सामना करना पडा। उनके दलित होने के कारण पुणे में उन्हें रहने के लिए किराया पर कमरा नहीं मिल रहा था।
कांशीराम की तरह डीआरडीओ में दलित डी.के.खपारडे भी काम करते थे। वे कांशीराम को बहुत मानते थे और उन्होंने ही कांशीराम को भीमराव अंबेडकर की लिखी किताब “एनाहिलेशन आफ कास्ट” पढ़ने के लिए दी। इस किताब ने कांशीराम की जिंदगी ही बदल दी। वे पूरी रात जगकर उस किताब को तीन बार पढ़े। ये किताब ही उनकी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट था जिसका जिक्र उन्होंने कई बार किया था। कांशीराम बाबासाहेब के मुरीद हो गए थे और उन्होंने धीरे धीरे अंबेडकर के सभी किताबों को पढ़ लिया।
उनका मन नौकरी से उचटने लगा था और वे दलितों शोषितों के लिए कुछ करना चाहते थे मगर सरकारी नौकरी आडे आ रही थी। नौकरी से त्यागपत्र देकर वे सन् 1964 में एक्टिविस्ट बन गए और दलितों के उत्थान के लिए काम करने लग गए थे। अपने शुरूआती दिनों में उन्होंने “रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया” को सपोर्ट किया। ये पार्टी इंडिया कांग्रेस को सपोर्ट किया करती थी। थोडे ही दिनों में उनका मोहभंग रिपब्लिकन पार्टी आँफ इंडिया से हो गया।
कांशीराम का राजनीतिक करियर 1971 में “आँल इंड़िया एससी, एसटी, ओबीसी और माइनारिटी एम्पलाई एसोसिएशन के गठन से शुरू हुआ। 1978 में यह संगठन बामसेफ नाम से जाना जाने लगा। इस संगठन का उद्देश्य था पढ़े लिखे एससी, एसटी, ओबीसी और माइनारिटी समुदाय के लोगों को अंबेडकर के सिद्धांतों का समर्थन करने के लिए राजी करना। 1981 में कांशीराम ने एक अन्य सामाजिक संगठन का गठन किया जिसका नाम था “दलित शोषित समाज संघर्ष समिति। डीएस-4 का मतलब है दलित शोषित समाज संघर्ष समिति। इसका मुख्य नारा था- ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब है डीएस-4। यह एक राजनीतिक मंच नहीं था लेकिन इसके जरिए कांशीराम न सिर्फ दलितों को बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच भी एक तरह की गोलबंदी करना चाह रहे थे। उन्होंने डीएस-4 को मजबूत बनाने के लिए सात राज्यों में तकरीबन 3000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा की।
इस ऐतिहासिक साइकिल यात्रा ने कांशीराम को राष्ट्रीय पहचान दी और वे दलितों के नायक के रूप में स्थापित हो गए। इसी सामाजिक पूंजी से उत्साहित होकर कांशीराम ने 14 अप्रैल,1984 को एक राजनीतिक संगठन “बहुजन समाज पार्टी” की स्थापना की। जब बसपा ने चुनाव लड़ना शुरू कर दिया तो उन्होंने “एक नोट, एक वोट” नारा देकर नोट और वोट खींचे। कांशीराम सत्ता में दलितों की भागीदारी चाहते थे और वे अपने मकसद में कामयाब भी रहे।
कांशीराम ने अपनी किताब “चमचा युग” में महात्मा गांधी और कांग्रेस की खुब खिंचाई की है। उन्होंने लिखा है कि अंबेडकर की दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग को गांधी जी के दबाव की राजनीति से पूरा नहीं होने दिया और पूना पैक्ट के फलस्वरूप आगे चलकर संयुक्त निर्वाचक मंडलों में उनके चमचे खडे हो गए। कांशीराम लिखते हैं कि जब जब कोई दलित राजनीति में उभरने की कोशिश करता है तब तब ब्राह्मण वर्चस्व वाली पार्टियां अपने रबर स्टैंप दलित नेता को आगे कर उसके आंदोलन को कमजोर कर देती है या कुचल देती है। उन्होंने कांग्रेस के बडे दलित नेता जगजीवन राम, आरपीआई के रामदास अठावले एंव रामविलास पासवान के दलित मिशन पर करारी चोट की है और उन्हें ब्राह्मण व्यवस्था का पिछलग्गू तक कहा है।
कांशीराम के दलित अभियान की तुलना महाराष्ट्र के ज्योतिबाफुले के दलित मिशन से की जाती है। उ.प्र के दलितों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता कांशीराम के मिशन से ही मिली। कांशीराम को डाइबिटीज़ की बीमारी थी जिससे वे बेहद कमजोर हो गए थे। उन्हें 1994 में दिल का दौरा भी पडा था। 2003 में उन्हें पैरालिसिस स्ट्रोक भी हुआ जिसके बाद वो कभी स्वस्थ्य न हो सके। 2003 से वे बिस्तर पर ही थे। 09 अक्टूबर 2006 को 72 साल की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी इच्छानुसार बौद्ध रीति रिवाज से अंतेष्टि की गई। उनकी चिता को अग्नि दिया उनके उत्तराधिकारी मायावती ने। कांशीराम के निधन से मानो एक दलित युग का अवसान हो गया।
आज मान्यवर कांशीराम की 91 वीं जयंती है। वे जहाँ भी होंगे अपने समाज की चिंता कर रहे होंगे। उन्हें सादर नमन।
अजय श्रीवास्तव






