जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई देश के नये मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बन गये। वे देश के दूसरे दलित सीजेआई होंगे। उनके पिता रामकृष्ण सूर्यभान गवई एक प्रसिद्ध अंबेडकरवादी नेता थे और उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (गवई) की स्थापना की थी। वर्तमान मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना मंगलवार को अपना छह माह का कार्यकाल पूरा कर सेवानिवृत्त हो गए हैं। उनके स्थान पर जस्टिस गवई बुधवार को देश के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।
बचपन से ही समाज सेवा के वातावरण में पले-बढ़े
24 नवंबर 1960 को जन्मे जस्टिस गवई तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। उनका बचपन अमरावती के फ्रीज़रपुरा झुग्गी क्षेत्र में बीता। वे कक्षा 7 तक नगरपालिका मराठी स्कूल में पढ़े। घर की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, लेकिन सामाजिक कार्यों का माहौल शुरू से था। उनकी मां कमलताई ने बच्चों को मेहनत, अनुशासन और सेवा की भावना सिखाई—भोजन बनाना, बर्तन साफ़ करना, खेतों में काम करना और बोरवेल से देर रात पानी भरना जैसी जिम्मेदारियाँ उन्होंने बचपन में ही संभालीं। 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय उनके घर में सैनिकों को भोजन कराया जाता था, और भूषण अपनी मां की मदद करते थे।
वकालत और न्यायपालिका में करियर
उन्होंने अमरावती विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की और 1985 में वकालत शुरू की। नागपुर में बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ में उन्होंने सरकारी वकील और अपर लोक अभियोजक के तौर पर काम किया। वे एक स्वतंत्र विचारधारा के वकील थे और अपने सहायक वकीलों का चयन खुद करते थे। उनकी टीम के कई सदस्य आगे चलकर हाईकोर्ट के जज बने। उनका मानना था कि मुवक्किल आदेश नहीं देता, सुझाव देता है। एक बार जब मुख्य सचिव ने उनके सहायक वकील को हटाने की बात की, तो उन्होंने दो टूक कहा कि यदि किसी को हटाना है तो पहले मुझे हटाइए।
न्यायाधीश बनने की यात्रा
2001 में उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट में न्यायाधीश बनने का प्रस्ताव मिला, लेकिन प्रक्रिया में देरी के चलते उन्होंने यह पद स्वीकार करने पर विचार टाल दिया। उनके पिता ने उन्हें समझाया और 2003 में वे अतिरिक्त न्यायाधीश बने। 2005 में उन्हें स्थायी नियुक्ति मिली। 2015 में अपने बीमार पिता की देखभाल के लिए उन्होंने नागपुर पीठ में स्थानांतरण लिया। उसी वर्ष उनके पिता का निधन हो गया।
ज़मीनी जुड़ाव और विनम्रता
अमरावती और नागपुर के वकील बताते हैं कि वे हमेशा आम जनता के करीब रहे। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने घर खरीदने के लिए अपनी कार बेच दी और एक साल तक दोपहिया वाहन से अदालत जाते रहे। वे अपने कानूनी काम का 50–60% हिस्सा बिना किसी फीस के (प्रो बोनो) करते थे।
चुनौतीपूर्ण कार्यकाल
सीजेआई के रूप में उनका कार्यकाल छह माह का होगा, लेकिन इसमें उन्हें कई गंभीर चुनौतियों से जूझना पड़ेगा। न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, और कुछ हाईकोर्ट न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया की संभावना भी है। उनके कार्यकाल की शुरुआत में ही वक्फ अधिनियम में हुए विवादास्पद संशोधनों से जुड़ा एक संवेदनशील मामला भी उनके सामने आने वाला है, जिसकी सुनवाई 15 मई को होगी।





