प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर में 272 किलोमीटर लंबे उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से, चिनाब रेलवे ब्रिज का उद्घाटन किया। 1315 मीटर लंबा यह पुल न केवल इस प्रोजेक्ट का सबसे चुनौतीपूर्ण भाग रहा, बल्कि इसे बनने में 22 साल लगे।

चिनाब ब्रिज का सफर: एक लंबा इंतजार: इस ब्रिज को बनाने का निर्णय लेने से लेकर इसके उद्घाटन तक दो दशक से ज्यादा का समय लगा। आखिर क्यों?
रेलवे और जम्मू-कश्मीर: एक लंबा इतिहास
• 1897: जम्मू से सियालकोट तक लगभग 40-45 किमी की पहली रेल लाइन बनी।
• 1947: बंटवारे के बाद सियालकोट पाकिस्तान में चला गया, और अगले 28 साल जम्मू सड़क मार्ग से ही देश से जुड़ा रहा।
• 1975: पठानकोट-जम्मू रेल लाइन शुरू हुई।
• 1983: जम्मू-उधमपुर के बीच रेल लाइन का काम शुरू हुआ, अनुमानित लागत थी ₹50 करोड़।
• 1994-95: प्रोजेक्ट को श्रीनगर और बारामूला तक बढ़ाने की योजना बनी और मंजूरी मिली।
• 2004: जम्मू-उधमपुर रेल लाइन तय समय से 16 साल बाद पूरी हुई, लागत 10 गुना बढ़कर ₹515 करोड़ हो गई।
• 2005: उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। आज तक इसका खर्च ₹35,000 करोड़ से अधिक हो चुका है, जिसमें अकेले चिनाब ब्रिज की लागत ₹1,500 करोड़ रही।
आख़िर क्यों जरूरी था चिनाब ब्रिज
कश्मीर घाटी तक सीधी रेल पहुंच नहीं थी। ट्रेनें सिर्फ जम्मू तवी तक ही चलती थीं। श्रीनगर जाने के लिए सड़क मार्ग पर निर्भर रहना पड़ता था, जो बर्फबारी में बंद हो जाता है। चिनाब नदी पर पुल का निर्माण इसलिए अहम था, क्योंकि नदी एक गहरी घाटी में बहती है, जहां पुल बनाना बेहद कठिन कार्य था।

चिनाब ब्रिज की खासियत
• यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल है, एफिल टावर से भी ऊंचा।
• यह पुल कन्याकुमारी से कश्मीर घाटी तक सीधी ट्रेन सेवा की राह खोलेगा।
• धनुषाकार (आर्क) डिजाइन पर बना है, जो बेहद मजबूत और टिकाऊ है।
• पुल को 17 स्टील खंभों और एक विशाल आर्क पर टिकाया गया है, जो दो पहाड़ियों को जोड़ता है।
• निर्माण के लिए 3000 फीट ऊंचाई तक काम करने वाली केबल क्रेनों का इस्तेमाल किया गया।
तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
• डिजाइन कनाडा की WSP कंपनी ने किया।
• निर्माण में कोंकण रेलवे, AFCONS, Ultra Construction, दक्षिण कोरिया की इंजीनियरिंग कंपनी, और VSL इंडिया शामिल रहीं।
• स्टील की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए इसे भिलाई स्थित SAIL प्लांट से मंगवाया गया।
• सुरक्षा के लिहाज से 63 मिमी मोटी ब्लास्ट-प्रूफ स्टील का उपयोग किया गया, ताकि आतंकी धमाकों में भी पुल सुरक्षित रहे।
• पुल इतना मजबूत है कि 266 किमी/घंटे की रफ्तार से आने वाले तूफान और रिक्टर स्केल पर 8 तक के भूकंप को भी सह सके।
रणनीतिक दृष्टिकोण से इसकी अहमियत
• कश्मीर घाटी को पूरे देश से जोड़ने वाली यह कड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है।
• सैन्य तैनाती और रसद की सुविधा में बड़ा बदलाव आएगा।
• यह पुल भारत की इंजीनियरिंग क्षमता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है।






