राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल करने के लिए सरकार को नीति बनाने के निर्देश दिए
राजस्थान की करोड़ों जनता के लंबे इंतजार और निरंतर संघर्ष के बाद देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राजस्थानी भाषा को नई पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने राजस्थान सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल करने के लिए ठोस और व्यापक नीति तैयार की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई सितंबर 2026 में निर्धारित की है। तब तक राज्य सरकार को अदालत के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें यह बताया जाएगा कि राजस्थानी भाषा को स्कूलों में लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और तैयारियां किस स्तर तक पहुंची हैं।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “हम मूक दर्शक नहीं बन सकते”
यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के अब तक के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब विश्वविद्यालय स्तर पर राजस्थानी भाषा की पढ़ाई पहले से हो रही है, तो स्कूली शिक्षा में इसे लागू करने में देरी क्यों हो रही है। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के हनन पर “मूक दर्शक” बनकर नहीं बैठ सकती। साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल सिद्धांत है, जिसे लागू करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

चरणबद्ध तरीके से लागू होगा नया नियम
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को लागू करने के लिए एक चरणबद्ध योजना अपनाने के निर्देश दिए हैं।
- प्रारंभिक स्तर पर शुरुआत: सबसे पहले फाउंडेशनल और प्रिपरेटरी कक्षाओं में राजस्थानी भाषा को माध्यम या विषय के रूप में शामिल किया जाएगा।
- उच्च कक्षाओं तक विस्तार: इसके बाद धीरे-धीरे इस विषय को उच्च कक्षाओं में भी अनिवार्य रूप से लागू किया जाएगा।
- सरकारी और निजी स्कूल दोनों शामिल: यह आदेश केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य के सभी निजी स्कूलों पर भी समान रूप से लागू होगा।

रीट और शिक्षक भर्ती पर पड़ेगा प्रभाव
इस फैसले का असर केवल स्कूली शिक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षक भर्ती प्रक्रियाओं पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। याचिकाकर्ताओं ने रीट के पाठ्यक्रम में भी राजस्थानी भाषा को शामिल करने की मांग की थी। ऐसे में अब यह संभावना मजबूत हो गई है कि भविष्य में राजस्थान में शिक्षक बनने के लिए राजस्थानी भाषा का ज्ञान आवश्यक हो सकता है। इससे राज्य के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

8वीं अनुसूची का तर्क खारिज
2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान में लगभग 4.36 करोड़ लोग राजस्थानी भाषा बोलते हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार अब तक यह तर्क देती रही कि राजस्थानी भाषा संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल नहीं है, इसलिए इसे स्कूली पाठ्यक्रम में लागू करना संभव नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि शैक्षणिक मान्यता के लिए 8वीं अनुसूची में शामिल होना अनिवार्य शर्त नहीं है। अदालत ने इस सोच को पुराना और तर्कहीन बताते हुए स्पष्ट किया कि भाषा के संरक्षण और विकास के लिए शिक्षा प्रणाली में उसका समावेश जरूरी है।
राजस्थानी अस्मिता की बड़ी जीत
इससे पहले राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले को नीतिगत विषय मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा मानते हुए पलट दिया। इस फैसले के बाद अब राजस्थान के बच्चों को अपनी ‘मायड़ भाषा’ में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। साथ ही वे अपने समृद्ध इतिहास, लोक साहित्य, कविताओं और सांस्कृतिक धरोहर को अपनी मातृभाषा में बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। यह निर्णय न केवल शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाएगा, बल्कि राजस्थानी भाषा और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा।






