100 से कम सीट आने पर किया था राजनीति छोड़ने का एलान, अब बनेंगे मुख्यमंत्री

केरल की राजनीति में लंबे इंतजार के बाद आखिरकार तस्वीर साफ हो गई है। कांग्रेस ने चुनाव नतीजों के करीब 10 दिन बाद वरिष्ठ नेता वीडी सतीशन को विधायक दल का नेता चुनते हुए उन्हें राज्य का नया मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के भीतर गहन मंथन और खींचतान जारी थी। चुनाव प्रचार के दौरान सतीशन ने बड़ा दांव खेलते हुए सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन 140 में से 100 सीटें हासिल नहीं कर पाता, तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। उनका यह दांव सफल रहा और गठबंधन ने 102 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसके साथ ही सतीशन स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरे।
जमीनी राजनीति से शिखर तक का सफर
31 मई 1964 को कोच्चि के नेट्टूर में जन्मे वीडी सतीशन का पूरा नाम वदस्सेरी दामोदरन सतीशन है। छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे सतीशन ने केरल स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) और बाद में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के जरिए अपनी पहचान बनाई। 1986-87 में वे महात्मा गांधी विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए। शैक्षणिक रूप से मजबूत सतीशन ने सोशल वर्क में मास्टर्स और कानून की पढ़ाई (एलएलबी व एलएलएम) पूरी की। राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद उन्होंने करीब एक दशक तक केरल हाईकोर्ट में वकालत भी की, जिससे उनकी छवि एक पढ़े-लिखे और विश्लेषणात्मक नेता की बनी।
चुनावी राजनीति में संघर्ष और सफलता
सतीशन ने 1996 में पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और क्षेत्र में सक्रिय बने रहे। 2001 में परवूर सीट से पहली जीत हासिल करने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। परवूर उनकी राजनीति का गढ़ बन गया, जहां से वे लगातार छह बार (2001, 2006, 2011, 2016, 2021 और 2026) विधायक चुने गए। अपने क्षेत्र में पेयजल जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं के जरिए उन्होंने विकास और विश्वसनीयता दोनों स्थापित की। 2011 से 2016 के बीच जब यूडीएफ सत्ता में थी, तब भी सतीशन पार्टी के भीतर एक मुखर और स्वतंत्र राय रखने वाले नेता के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने हरित राजनीति, पारदर्शिता और योग्यता आधारित टिकट वितरण का समर्थन किया। वामपंथी सरकार के कार्यकाल में सतीशन ने विधानसभा के भीतर और बाहर लगातार आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनरई विजयन की नीतियों और विकास के दावों पर तीखे सवाल उठाए, जिससे वे विपक्ष की सबसे प्रभावशाली आवाज बनकर उभरे।

2021 में मिला बड़ा अवसर
2021 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने बड़ा फैसला लेते हुए रमेश चेन्निथला की जगह सतीशन को विपक्ष का नेता नियुक्त किया। उस समय उनके पास मंत्री पद का अनुभव नहीं था, लेकिन अगले पांच वर्षों में उन्होंने खुद को एक मजबूत और आक्रामक नेता के रूप में स्थापित कर लिया। इतनी बड़ी जीत के बावजूद मुख्यमंत्री के नाम पर निर्णय लेने में कांग्रेस को 10 दिन लग गए। इसके पीछे कई कारण रहे—
- त्रिकोणीय मुकाबला: सतीशन के अलावा केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला भी इस दौड़ में शामिल थे, जिससे फैसला आसान नहीं था।
- केंद्रीय बनाम राज्य नेतृत्व की दुविधा: एक ओर सतीशन के पास जमीनी समर्थन था, वहीं वेणुगोपाल केंद्रीय नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं। इस संतुलन को साधना चुनौतीपूर्ण रहा।
- प्रशासनिक अनुभव पर सवाल: आलोचकों ने तर्क दिया कि सतीशन ने कभी मंत्री पद नहीं संभाला, जिससे उनके प्रशासनिक अनुभव पर प्रश्न उठे।
- सर्वसम्मति बनाने की कोशिश: कांग्रेस नेतृत्व ने किसी भी तरह की आंतरिक असंतोष या बगावत से बचने के लिए सभी पक्षों से विचार-विमर्श कर सहमति बनाने में समय लिया।
- नई भूमिका, नई चुनौती: अब जब वीडी सतीशन मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनावी वादों को जमीन पर उतारने, गठबंधन को संतुलित रखने और प्रशासनिक अनुभव की कमी को अपनी कार्यशैली से दूर करने की होगी।
जमीनी पकड़, आक्रामक नेतृत्व और साफ छवि के दम पर सतीशन ने सत्ता तक का सफर तय किया है—अब निगाहें इस बात पर होंगी कि वे शासन में कितना सफल साबित होते हैं।






