ट्रंप के बेहद करीबी केविन वार्श बने फेडरल रिजर्व के नए अध्यक्ष

वॉल स्ट्रीट के ‘गोल्डन बॉय’ कहे जाने वाले केविन वार्श के पास है 900 करोड़ की दौलत और सत्ता का रसूख

केविन वार्श की नियुक्ति महज एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी मौद्रिक नीति के भविष्य पर खेला गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। क्या वे राष्ट्रपति ट्रंप की उम्मीदों के ‘सारथी’ बनेंगे या केंद्रीय बैंक की ऐतिहासिक स्वायत्तता की रक्षा करेंगे? पूरी दुनिया की निगाहें अब वार्श के उस पहले फैसले पर टिकी हैं, जो वैश्विक बाजारों की दिशा तय करेगा। अमेरिका की ‘तिजोरी की चाबी’ अब एक ऐसे शख्स के पास है जिसके पास न केवल राजनीतिक रसूख है, बल्कि बेहिसाब निजी संपत्ति भी। अमेरिकी सीनेट की मुहर के बाद, 56 वर्षीय केविन वार्श दुनिया के सबसे शक्तिशाली केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व के नए अध्यक्ष बन गए हैं। वॉल स्ट्रीट के ‘गोल्डन बॉय’ कहे जाने वाले वार्श का प्रभाव सत्ता के गलियारों से लेकर अरबों डॉलर के बिजनेस साम्राज्यों तक फैला है। महज 35 साल की उम्र में फेड के सबसे युवा गवर्नर बनने का रिकॉर्ड बनाने वाले वार्श एक कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं।

विवादों के केंद्र में वार्श: तीन मुख्य पहलू

  • निजी निवेश और हितों का टकराव: वार्श की निजी संपत्ति 100 मिलियन डॉलर (लगभग 900 करोड़ रुपये) से अधिक है। उनके निवेश एलन मस्क की SpaceX, प्रेडिक्शन मार्केट पॉलीमार्केट और कई उभरते AI स्टार्टअप्स में हैं। विपक्ष का सवाल है कि इतने बड़े पोर्टफोलियो वाला व्यक्ति निष्पक्ष निर्णय कैसे लेगा? हालांकि, उन्होंने पद संभालने के 90 दिनों के भीतर अपनी हिस्सेदारी बेचने का वादा किया है।
  • अरबपति पत्नी और पारिवारिक रसूख: उनकी पत्नी जेन लॉडर, कॉस्मेटिक्स दिग्गज ‘एस्टी लॉडर’ (Estée Lauder) की वारिस हैं, जिनकी संपत्ति 18,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। जेन के पिता रोनाल्ड लॉडर और डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी दोस्ती जगजाहिर है, जिसके चलते इस नियुक्ति को ‘योग्यता बनाम रसूख’ की बहस में घसीटा जा रहा है।
  • स्वतंत्रता पर सवाल: ‘कठपुतली’ या ‘कैप्टन’? सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन जैसी विरोधियों ने उन्हें ट्रंप का ‘सॉक पपेट’ (कठपुतली) करार दिया है। आरोप है कि ट्रंप ने उन्हें इसलिए चुना है ताकि व्हाइट हाउस के इशारे पर ब्याज दरों में कटौती की जा सके।

    ट्रंप ने वार्श को ही क्यों चुना: निवर्तमान फेड प्रमुख जेरोम पॉवेल और ट्रंप के बीच के कड़वे रिश्तों के बाद वार्श की एंट्री एक स्पष्ट संदेश है। ट्रंप एक ऐसा चेहरा चाहते थे जो:

    • ब्याज दरों में कटौती: ट्रंप का मानना है कि शेयर बाजार की तेजी के लिए दरों का कम होना जरूरी है।
    • वफादारी: विपक्ष को डर है कि वार्श आर्थिक सिद्धांतों से ज्यादा ट्रंप की राजनीतिक प्राथमिकताओं को तवज्जो देंगे, हालांकि वार्श ने खुद को ‘स्वतंत्र’ बनाए रखने का संकल्प लिया है।

    वार्श के सामने दो चुनौतियां

    • महंगाई का दानव और युद्ध की मार: अमेरिका में महंगाई का लक्ष्य 2% है, लेकिन वर्तमान में यह 3.8% पर है। ईरान युद्ध के कारण गैस की कीमतें 50% तक बढ़ चुकी हैं। वार्श के सामने धर्मसंकट होगा—दरें घटाकर राष्ट्रपति को खुश करें या दरें बढ़ाकर महंगाई पर लगाम लगाएं?
    • फेड के भीतर ‘शक्ति के दो केंद्र’: एक दुर्लभ स्थिति में, पूर्व अध्यक्ष जेरोम पॉवेल ने पद छोड़ने के बाद भी फेड बोर्ड में बने रहने का फैसला किया है। 1948 के बाद यह पहली बार है जब कोई पूर्व प्रमुख अपने उत्तराधिकारी के साथ बोर्ड में होगा। यह स्थिति फेड के भीतर ‘पावर स्ट्रगल’ या टकराव को जन्म दे सकती है।

      केविन वार्श का कार्यकाल यह तय करेगा कि फेडरल रिजर्व अपनी साख बचा पाता है या वह अमेरिकी राजनीति का एक और अखाड़ा बनकर रह जाता है। क्या ‘गोल्डन बॉय’ वैश्विक अर्थव्यवस्था को संकट से उबार पाएंगे? जवाब भविष्य के गर्भ में है।

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