टकराव के बाद योगी की आजम पर मेहरबानी

समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और रामपुर से कई बार विधायक व सांसद रह चुके आज़म खान का नाम बीते चार-पांच साल से अधिकतर विवादों और कानूनी मामलों में ही सुर्खियों में रहा है। योगी आदित्यनाथ के दूसरे कार्यकाल के दौरान आज़म खान पर जमीन कब्जे से लेकर फर्जी दस्तावेज़, भैंस चोरी और सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे जैसे कई आरोप लगे, जिनमें वे एक-एक कर जेल भी गए। उनके ऊपर सैकड़ों मुकदमे दर्ज हुए और उनकी राजनीतिक हैसियत को झटका देने की पूरी कोशिश की गई। लेकिन अब हालात अचानक बदले हैं। पहले अदालत से उन्हें जमानत मिलती है, फिर योगी सरकार उनकी वाई श्रेणी की सुरक्षा बहाल कर देती है। सत्ता के गलियारों से लेकर विश्लेषकों के बीच सवाल यही है कि यह बदलाव सरकार के रवैये में अचानक क्यों आया और इसके पीछे छिपा संदेश क्या है।
राजनीतिक जानकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि योगी सरकार का यह रुख सिर्फ कानून के अनुपालन का मामला नहीं है, बल्कि यह कहीं न कहीं आने वाले चुनावी समीकरण का हिस्सा हो सकता है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा प्रतिशत है और सपा लंबे समय से इस वोट बैंक की राजनीति का केंद्र रही है। आज़म खान, भले ही तमाम मामलों के चलते कमजोर पड़े हों, लेकिन रामपुर और आसपास के इलाकों में मुस्लिम समुदाय में उनकी पकड़ अब भी है। ऐसे में यह मानना गलत नहीं होगा कि आज़म खान को राहत देकर सरकार एक तरह से यह संकेत दे रही है कि वह टकराव की राजनीति से हटकर संवाद और सहमति के रास्ते पर भी चल सकती है। यह रणनीति विशेषकर तब अहम हो जाती है जब सत्तारूढ़ पार्टी किसी खास वर्ग में अपनी साख सुधारने की कोशिश में हो।
दूसरी तरफ, यह कदम सपा के अंदर भी हलचल का कारण बना है। अखिलेश यादव और आज़म खान के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में खटास की खबरें आती रही हैं। आज़म को लगता रहा कि उन्हें पार्टी ने उनके बुरे वक्त में पूरी ताकत से बचाने की कोशिश नहीं की, जबकि अखिलेश यह समझते रहे कि उनके खिलाफ लगे गंभीर आरोप पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में आज़म खान के प्रति योगी सरकार का यह “सौम्य” रवैया सपा के भीतर एक तरह की बेचैनी पैदा कर सकता है और विपक्षी खेमों में अविश्वास की दरार बढ़ा सकता है। यह भी संभव है कि भाजपा को पता हो कि कमजोर पड़े आज़म खान को सीधे-सीधे सत्ता के खिलाफ खड़ा करना अब कठिन है, लेकिन उनके साथ संबंधों को सहज रखकर समाजवादी पार्टी के भीतर दरार को और गहरा किया जा सकता है, जिससे विपक्षी एकजुटता कमजोर पड़े। कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यह कदम किसी अदालती दबाव या सुरक्षा एजेंसियों की सिफारिश पर भी हो सकता है। आज़म खान के ऊपर लगातार खतरे की आशंका जताई जाती रही है, खासकर रामपुर में उनकी राजनीतिक हैसियत और विवादित बयानों को देखते हुए। ऐसे में वाई श्रेणी की सुरक्षा बहाली एक प्रशासनिक निर्णय भी हो सकता है। लेकिन राजनीति में संयोगों पर कम और संदेशों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, इसलिए इसे केवल “सुरक्षा की जरूरत” के चश्मे से देखना अधूरा होगा।
प्रदेश की मुस्लिम राजनीति में आज़म खान की स्थिति खास है। भाजपा के लिए यह समुदाय पारंपरिक रूप से चुनौतीपूर्ण मतदाता रहा है। भाजपा नेतृत्व को यह भलीभांति पता है कि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा एक झटके में नहीं जीता जा सकता, लेकिन एक वर्ग में सकारात्मक संदेश देकर और विपक्ष के भीतर असंतोष पैदा कर उसे बांटा जा सकता है। आज़म खान को मिली इस राहत को भी उसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। भाजपा के भीतर इस समय दो पैरेलल रणनीतियाँ दिख रही हैं एक तरफ हिंदुत्व के आक्रामक एजेंडे को बनाए रखना, दूसरी तरफ खास परिस्थितियों में कुछ मुस्लिम चेहरों के प्रति संवेदनशील रुख दिखाकर मुस्लिमों के प्रति सरकार के नम्र रवैये के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा की छवि को थोड़ी संतुलित दिखाने में मदद करता है।
आज़म खान और योगी आदित्यनाथ के बीच किसी भी तरह की सीधी नज़दीकी की संभावना को अभी दूर की कौड़ी माना जा सकता है, लेकिन राजनीति में हित और परिस्थिति अक्सर पुराने संघर्षों को भी पिघला देते हैं। यह भी विचारणीय है कि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव या 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए पहले से ही सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाने में जुट गई है। ऐसे में छोटे-छोटे संकेत, जैसे किसी विरोधी धड़े के प्रभावशाली नेता को राहत देना, आगे चलकर बड़े बदलावों के आधार बन सकते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो भाजपा और आज़म खान की राजनीति हमेशा परस्पर विरोधी रही है। रामपुर का उपचुनाव इसका ताज़ा उदाहरण था, जहां आज़म खान के प्रभाव वाले इलाके में भाजपा ने जीत दर्ज की और यह नतीजा उनकी राजनीति पर चोट के रूप में देखा गया। मगर अब वही सरकार सुरक्षा वापस देती है तो संदेश यह जाता है कि सियासत में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता। यह भी ध्यान रखने लायक है कि कई बार सत्ता पक्ष विपक्ष के किसी पुराने मजबूत नेता को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे सॉफ्ट कॉर्नर देकर सीमित असर वाले खेमे में बदलने की कोशिश करता है, जिससे वह दीर्घकाल में सत्ता के लिए खतरा न बने और विरोधी की एकजुटता भी टूटे।
कुल मिलाकर, यह कहना गलत नहीं होगा कि आज़म खान को जमानत और सुरक्षा बहाली देने के पीछे कई परतों वाली रणनीति है। एक तरफ सरकार अपने कानून के शासन की इमेज को मजबूत कर सकती है कि जो भी खतरे में है, उसे सुरक्षा मिलेगी, दूसरी तरफ वह विपक्षी राजनीति के भीतर दरार और टकराव को बढ़ा सकती है। चुनावी लाभ, मुस्लिम समुदाय में नियंत्रित पहुंच, और विपक्ष के प्रभावशाली नेताओं को राजनीतिक तौर पर तटस्थ करने की नीति ये तीनों पहलू इस कदम की पृष्ठभूमि में नजर आते हैं। इसलिए इस घटनाक्रम को केवल एक प्रशासनिक निर्णय या अदालती प्रक्रिया का नतीजा मानना राजनीति की बारीकियों को नज़रअंदाज़ करना होगा। तमाम राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह एक संकेत है कि चुनावी सालों से पहले सत्ता पक्ष रणनीतिक चालें चलकर विपक्षी खेमे को असंतुलित करने में लगा है।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ

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