भारत में धूम्रपान न करने वाली महिलाओं में पाए गये लंग कैंसर के मामले; डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

भारत में महिलाओं के बीच नॉन-स्मोकिंग लंग कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि वायु प्रदूषण और आनुवंशिक (जेनेटिक) कारण इस बढ़ते खतरे की प्रमुख वजह बन रहे हैं। हाल ही में सामने आई विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) की रिपोर्ट ने यह चिंताजनक सच उजागर किया है कि भारतीय महिलाओं में कैंसर होने का आजीवन जोखिम पुरुषों की तुलना में अधिक है, और वे कम उम्र में ही इसकी वजह से जान गंवा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि फेफड़ों का कैंसर अब उन महिलाओं में भी तेजी से फैल रहा है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया।

प्रदूषण बना मुख्य खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं में कैंसर की क्रूड इंसीडेंस दर 104.5 प्रति लाख है, जबकि पुरुषों में यह 91.5 प्रति लाख पाई गई। मौतों के मामलों में भी महिलाएं आगे हैं, 64.2 प्रति लाख, जबकि पुरुषों में यह 62.2 प्रति लाख है। 2022 में देश में दर्ज 14,13,316 कैंसर मामलों में से 7,12,138 महिलाएं और 6,91,178 पुरुष थे। केवल फेफड़ों के कैंसर के ही 81,748 नए केस सामने आए, जिनमें से 75,031 मौतें हुईं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनडोर और आउटडोर एयर पॉल्यूशन इस संकट के प्रमुख कारण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खाना बनाते समय बायोफ्यूल के धुएं के संपर्क में आती हैं, जबकि शहरी महिलाओं को लगातार खराब होती एयर क्वालिटी (AQI) का सामना करना पड़ता है, जिससे फेफड़ों पर गंभीर असर पड़ता है।

बिना धूम्रपान के भी लंग कैंसर
कई वर्षों तक यह माना जाता रहा कि लंग कैंसर सिर्फ स्मोकिंग करने वालों की बीमारी है, लेकिन हालिया अध्ययन इसे गलत साबित करते हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अनुसार, अब महिलाओं में लंग कैंसर के मामले पुरुषों के बराबर या उससे भी अधिक हो रहे हैं।
डॉ. रवि मेहरोत्रा, पूर्व निदेशक, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च, बताते हैं कि भारतीय महिलाओं में जेनेटिक म्यूटेशन ज्यादा पाए जाते हैं, जो बिना स्मोकिंग के भी कैंसर को जन्म दे सकते हैं। साथ ही, एस्ट्रोजन हार्मोन इन म्यूटेशनों को प्रभावित करता है, जिससे बीमारी का खतरा और बढ़ जाता है।

कौन-सा लंग कैंसर ज्यादा आम
महिलाओं में अधिकतर मामलों में एडेनोकार्सिनोमा पाया जाता है, जो नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर का प्रकार है। यह फेफड़ों की अंदरूनी परत की कोशिकाओं में विकसित होता है और तेजी से फैलता है। इसका उपचार चुनौतीपूर्ण होता है और सफलता दर सीमित रहती है।
एम्स के कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार, अगले दस वर्षों में भारत में नॉन-स्मोकिंग लंग कैंसर के मामलों में भारी इजाफा देखने को मिलेगा, खासकर युवा महिलाओं में। प्रदूषण, आनुवंशिक प्रवृत्ति और बदलती जीवनशैली मिलकर एक ‘साइलेंट एपिडेमिक’ का रूप ले रही हैं, जो भारत की महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकती है।

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