कर्नाटक का एंटी-हेट बिल नफरत रोकने की मंशा या अभिव्यक्ति पर सियासी शिकंजा

कर्नाटक विधानसभा से 18 दिसंबर 2025 को पारित हुआ ‘कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025’ सिर्फ एक नया कानून नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी, राज्य की शक्ति और सामाजिक सद्भाव के बीच चल रही खींचतान का ताज़ा अध्याय बन गया है। कांग्रेस सरकार इसे समाज में बढ़ती नफरत और हिंसा के खिलाफ़ ज़रूरी औज़ार बता रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी और कई सिविल लिबर्टीज़ समूह इसे ‘काला कानून’ करार देकर लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए ख़तरा मान रहे हैं। यह पहली बार है जब किसी राज्य ने हेट स्पीच को परिभाषित करते हुए अलग से व्यापक कानून बनाया है, इसलिए इसकी गूंज कर्नाटक से बाहर पूरे देश में सुनाई दे रही है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा कानूनी ढांचा नाकाफ़ी साबित हुआ है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 196, 299 या आईटी एक्ट जैसे प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था पर केंद्रित हैं, न कि नफरत से प्रेरित भाषण और अपराध की जड़ों पर। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। 2020 में धारा 153A के तहत दर्ज मामलों में दोषसिद्धि दर महज़ 20.2 प्रतिशत रही, जबकि गिरफ्तारियां कहीं ज़्यादा हुईं। कांग्रेस का कहना है कि कम सज़ा दर का मतलब है कि नफरत फैलाने वाले अक्सर बच निकलते हैं और समाज में ज़हर घोलने का सिलसिला जारी रहता है। इसी कमी को दूर करने के लिए 1 से 7 साल और दोबारा अपराध पर 10 साल तक की सज़ा, गैर-जमानती प्रावधान और पीड़ित मुआवज़े जैसी धाराएं जोड़ी गई हैं।
लेकिन विपक्ष की आपत्ति यहीं से शुरू होती है। भाजपा नेताओं का कहना है कि बिल में हेट स्पीच की परिभाषा इतनी व्यापक और अस्पष्ट है कि सामान्य आलोचना, राजनीतिक भाषण, व्यंग्य या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी इसके दायरे में आ सकती है। नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने विधानसभा में कहा कि यह विधेयक पुलिस को ‘हिटलर’ बना देगा और सत्ता के हाथ में ऐसा हथियार देगा, जिससे असहमति को आसानी से कुचला जा सके। सी. टी. रवि ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बोलने की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और इसे किसी भी सूरत में कमजोर नहीं किया जा सकता। आलोचकों की सबसे बड़ी चिंता इसके दुरुपयोग की संभावना को लेकर है। गैर-जमानती अपराध होने के कारण पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है। चुनावी माहौल में यह आशंका जताई जा रही है कि सत्ताधारी दल विपक्षी नेताओं के भाषण या सोशल मीडिया पोस्ट को ‘नफरत फैलाने वाला’ बताकर एफआईआर दर्ज कर सकता है। अतीत में ऐसे उदाहरण सामने आ चुके हैं, जहां ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों पर भी मामले दर्ज हुए और बाद में अदालतों ने उन्हें रद्द किया। नए कानून के तहत ऐसी कार्रवाइयों का दायरा और बढ़ सकता है। सोशल मीडिया और पत्रकारिता भी इस बहस के केंद्र में हैं। बिल राज्य सरकार को इलेक्ट्रॉनिक सामग्री ब्लॉक या हटाने का अधिकार देता है, वह भी बिना किसी अदालती आदेश के। आलोचकों का कहना है कि इससे खोजी पत्रकारिता, सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग और सत्ता की आलोचना पर सेंसरशिप का खतरा पैदा होगा। आईटी एक्ट की धारा 66ए को 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह की अस्पष्टता के कारण रद्द किया था, लेकिन नए बिल में वही शक्तियां एक अलग रास्ते से लौटती दिख रही हैं।
समर्थकों की दलीलें भी कमज़ोर नहीं हैं। अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर ईसाई संगठनों ने चर्चों और धार्मिक स्थलों पर हमलों के संदर्भ में इस कानून का स्वागत किया है। उनका कहना है कि हेट स्पीच अक्सर वास्तविक हिंसा का रास्ता खोलती है और अगर शुरुआती स्तर पर सख़्त कार्रवाई हो, तो बड़े टकराव रोके जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में सक्रिय रहा है। 2022 में शीर्ष अदालत ने पुलिस को स्वतः संज्ञान लेकर हेट स्पीच के मामलों में कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे और चेतावनी दी थी कि ढिलाई को अवमानना माना जाएगा। हालांकि बाद में अदालत ने यह भी माना कि हर मामले की निगरानी संभव नहीं है और असली चुनौती कानून के क्रियान्वयन में है कर्नाटक का यह बिल विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट और 2022 के निजी सदस्य विधेयक की सिफारिशों की झलक भी दिखाता है, जहां ‘सेक्सुअल ओरिएंटेशन’ और ‘जेंडर’ जैसी श्रेणियों को शामिल कर संरक्षित समूहों का दायरा बढ़ाने की बात कही गई थी। साथ ही ‘सामूहिक दायित्व’ की अवधारणा लाकर संगठनों से जुड़े पदाधिकारियों को भी जवाबदेह बनाने का प्रावधान किया गया है। यह प्रावधान अपने आप में नया और विवादास्पद है, क्योंकि इससे संगठनात्मक गतिविधियों पर भी आपराधिक ज़िम्मेदारी तय हो सकती है। असल सवाल यही है कि क्या यह कानून नफरत रोकने में कारगर साबित होगा या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सियासी शिकंजा बनेगा। भारतीय अनुभव बताता है कि कानून से ज़्यादा महत्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और संतुलित इस्तेमाल है। अगर प्रवर्तन एजेंसियां राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करें और अदालतें सख़्ती से निगरानी रखें, तो यह कानून सामाजिक सद्भाव का औज़ार बन सकता है। लेकिन अगर इसे चुनिंदा तरीके से लागू किया गया, तो वही आशंका सच हो सकती है, जिसे आलोचक आज ‘काले कानून’ के रूप में देख रहे हैं। कर्नाटक ने एक नई मिसाल पेश की है; अब देश की निगाहें इस पर टिकी हैं कि यह मिसाल लोकतंत्र को मज़बूत करेगी या बहसों को और तीखा।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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