यूपी: लखनऊ में मौत का तांडव और हत्यारे पतंगबाज़

लखनऊ के सर्द मौसम में सूर्योदय के साथ ही आसमान में पतंगों की सरसराहट और घरों की छतों व मैदानों में पतंगबाज़ों की चिल्ल-पों की आवाज़ आम बात है। आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है। लेकिन इस उत्साह के बीच खतरा भी छिपा था। बरेली से लेकर लखनऊ तक चीनी मांझे और लोहे के कटीले तारों से पतंग उड़ाने वाले कब किसी राहगीर या फिर घर के आंगन में बैठे व्यक्ति के लिए जानलेवा साबित हो जाएं, कोई नहीं जानता। जब पतंग कटती है तो यह मांझा सड़क या पुल से गुजर रहे दोपहिया वाहन चालक के गले में आकर इस तरह फंस जाता है कि उसे अपनी जान तक गंवानी पड़ जाती है। दरअसल, यह चीनी मांझा बाहर से चमकदार लगता है, लेकिन इसकी धार जानलेवा होती है।योगी सरकार अब इस चीनी मांझे के गले में फंसकर वाहन चालक की मौत को हत्या की श्रेणी में शामिल करने जा रही है, मगर सवाल वही है इन्हें रोका कैसे जाए?

शहर के एक कोने में रहने वाले युवक शोएब (28) की मौत इसी खतरे की गवाह बनी। लखनऊ के हैदरगंज इलाके में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव शोएब की चाइनीज मांझे से गला कटने से मौत हो गई। बीती 11 जनवरी को शाहजहांपुर में सिपाही शाहरुख की भी इसी तरह चाइनीज मांझे से घायल होने के बाद मौत किसी से छिपी नहीं है।शोएब अपने दोपहिया वाहन से पुल से गुजर रहा था, तभी चीनी मांझा उसकी गर्दन में आकर फंस गया। कुछ ही देर में गर्दन कटने से शोएब की मौत हो गई। यह पहली बार नहीं हुआ। लखनऊ में चीनी मांझा अक्सर किसी की मौत का तो किसी को घायल करने की वजह बनता रहा है। सबसे दुखद यह है कि यह पतंगबाज़ कोई छोटे बच्चे नहीं होते। अक्सर युवा और 40–45 साल के लोग भी चीनी मांझे से पतंगबाजी करते हैं, यह जानते हुए भी कि यह किसी के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसलिए ऐसे पतंगबाज़ों को हत्यारा कहना गलत नहीं होगा।

युवा शोएब की मौत पर डॉक्टरों ने बताया कि मांझा ग्लास के टुकड़ों से बना था, जो धमनियों को काट देता है और यही मौत का कारण बनता है। ऐसी घटनाएं यूपी के कई जिलों में हो रही हैं। बरेली के कारखानों में बड़े पैमाने पर यह मांझा बनता है। कच्चे माल में चीनी पाउडर और कांच मिलाया जाता है। लखनऊ के बाजारों में यह सस्ते दाम पर बिकता है। पतंगबाज़ शर्तों के चक्कर में इसे चुनते हैं। ऊंची छतों या खुले मैदानों से उड़ाते हैं।पुलिस को मुखबिरों की जरूरत है। वे बताएं कि कौन सा इलाका खतरे में है। पतंग उड़ते ही छापा मारें और मांझा जब्त करें। योगी सरकार की सख्ती से कई दुकानें बंद हुईं, लेकिन कारखाने अभी भी चल रहे हैं। सरकार को नियम बनाना चाहिए कि मांझे की चरखी पर मांझा बनाने वाली कंपनी का नाम और पता जरूर छपा हो। चूंकि 12 जुलाई 2017 को ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने चाइनीज मांझे की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया था। एनजीटी के जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बेंच ने पूरे देश में सभी तरह के सिंथेटिक और नायलॉन से बने मांझे पर पूरी तरह बैन लगाने का आदेश दिया था। यह आदेश अगस्त 2016 में पेटा द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के बाद आया था।

आदेश के पालन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी, लेकिन जिस तरह यह मांझा आज भी आसानी से उपलब्ध है, उससे स्पष्ट है कि आदेश का पालन कराने के लिए कोई निगरानी तंत्र विकसित नहीं किया गया। यहां यह बताना जरूरी है कि एनजीटी के आदेश अदालत के आदेश की तरह होते हैं, जो कानूनन बाध्यकारी हैं। आदेशों का पालन नहीं करने पर तीन वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। सवाल यह है कि चाइनीज मांझे की बिक्री रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? इस पर जिला प्रशासन का कहना है कि इसके लिए ट्रेड टैक्स विभाग जिम्मेदार है, जो प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री और उपयोग की निगरानी करता है। ट्रेड टैक्स विभाग को इस बारे में निर्देश हैं। पुलिस भी लगातार कार्रवाई कर रही है। चूंकि कई अवसरों पर लखनऊ में पतंगबाज़ी की परंपरा है, इसलिए लोगों से अपील भी की जाती है कि वे पूरे उत्साह से पर्व मनाएं, लेकिन चाइनीज मांझे का प्रयोग न करें।

लखनऊ के पुराने इलाकों में क्रिकेट मैच पर सट्टेबाजी की तरह ही पतंगबाजी में भी सट्टा लगाया जाता है। चौक, बाजार वाला, सहादतगंज, ठाकुरगंज और फैजुल्लागंज के आसपास खुले मैदानों और छतों पर टीम बनाकर पतंगबाजी होती है और पांच से 25 हजार रुपये तक की बोली लगती है। पतंगबाज़ी खत्म होने के बाद हार-जीत के अनुसार रकम का बंटवारा किया जाता है। पतंगबाज़ी की आड़ में लाखों रुपये का खेल चल रहा है, जो बेगुनाहों की मौत की वजह भी बन रहा है।मांझा इतना तेज होता है कि कई बार पतंगबाज़ों की उंगलियां भी कट जाती हैं। लखनऊ के कुण्डरी रकाबगंज क्षेत्र में रहने वाले पतंगबाज़ संदीप कश्यप का कहना है कि पतंगबाज़ों द्वारा मानवर, लच्छेदार, तौकिया, दो पन्नी चरखानिया, आड़ी, मझोली, सवातीन, पौना व गेंददार जैसी सदियों पुरानी पतंगों को चाइनीज मांझे से उड़ाकर परंपरा को बदनाम किया जा रहा है। पहले ऐसी घटनाएं नहीं होती थीं, लेकिन अब आए दिन हादसे हो रहे हैं।

चीनी मांझा ही नहीं, लखनऊ में लोहे के पतले तार से बंधी पतंगें भी कम खतरनाक नहीं हैं। ये तार बिजली के तारों से टकराते हैं तो करंट उतर आता है। एक बार नवाबगंज में ऐसा ही हुआ। युवक की पतंग तार में फंसी और करंट ने उसे झुलसा दिया। अस्पताल पहुंचने पर उसकी जान मुश्किल से बची। ये तार बाजारों में आसानी से मिल जाते हैं। पतंगबाज़ इन्हें मजबूत मानते हैं, लेकिन ये भी मौत बांटते हैं। सरकार को अब इच्छाशक्ति दिखानी होगी। पतंग उत्सव के दिनों में ड्रोन से निगरानी करनी होगी। मुखबिरों का जाल बिछाना होगा। स्कूलों में बच्चों को सुरक्षित मांझे के इस्तेमाल के बारे में बताना होगा और बाजारों पर सख्त नजर रखनी होगी।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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