वाराणसी की जिला अदालत ने ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी मामले को सुनवाई योग्य मानकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।देश के तमाम कानूनविदों और हिंदू पक्षकारों का मानना है कि ये फैसला सभी साक्षों के मद्देनजर लिया गया एक बेहतरीन और न्यायसंगत फैसला है। हिंदुओं की दलील है कि ज्ञानवापी मस्जिद की एक एक दीवार अपने अंदर दफन हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों की कराह को चीख चीखकर बयां कर रही है कि ये मस्जिद हिंदू मंदिर को तोड़कर उसके अवशेषों पर बना है।मस्जिद परिसर के अंदर खंडित मूर्तियों का अंबार लगा है जो ये इशारा करता है कि वहां एक ऐतिहासिक मंदिर था जिसे मुस्लिम आताताइयों ने विध्वंस कर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाया था।किसी भी धर्म में किसी भी पूजागाह के अवशेष के ऊपर कोई भी धार्मिक निर्माण गैरवाजिब है और धर्म इसकी इजाजत नहीं देता।
काशी विश्वनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर बहुत सी बातें कही जाती है।ये भी कहा जाता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण 2050 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था।मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल ने 1585 में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।18 अप्रैल 1669 में मुगल अक्रान्ता औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था।इसके बाद मंदिर गिराकर इसकी जगह मस्जिद बना दी गई थी।मस्जिद के निर्माण में मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल किया गया था।इसके बाद मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सन् 1780 में मौजूदा काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण शुरू कराया था।कहा जाता है काशी विश्वनाथ का मूल मंदिर वहीं है जहां ज्ञानवापी मस्जिद है।इसमें कितनी सच्चाई है ये शोध का विषय है।
गौरतलब है कि ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर पहली बार मुकदमा सन् 1991 में वाराणसी की अदालत में दाखिल किया गया था।याचिका में ज्ञानवापी में पूजा करने की अनुमति मांगी गई थी।प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर की ओर से सोमनाथ व्यास,रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय इस मामले में याचिकाकर्ता थे।केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने सन् 1991 में “प्लेसेस आँफ वर्शिप एक्ट” बनाया।इस कानून में कहा गया था कि आजादी के बाद ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों को उनकी यथास्थिति मे बरकरार रखा जाए।मस्जिद की देखभाल करने वाली “अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद समिति” ने इसी कानून का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में सोमनाथ व्यास,रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय की याचिका को चुनौती दी।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सन् 1993 में विवादित स्थल को लेकर स्टे लगा दिया था और यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया था।
सुप्रीमकोर्ट के एक आदेश के बाद स्टे की वैधता को लेकर सन् 2019 को वाराणसी कोर्ट में फिर से सुनवाई हुई।18 अगस्त 2021 को राखी सिंह,लक्ष्मी देवी,सीता साहू,मंजू व्यास और रेखा पाठक ने ज्ञानवापी परिसर में श्रृंगार गौरी की पूजा-दर्शन की मांग करते हुए अदालत में याचिका दायर की।याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत गारंटी के अनुसार अपने धर्म को मानने का अधिकार भंग हो गया है।कई तारीखों के बाद आखिरकार इस साल ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण की मंजूरी वाराणसी अदालत ने दी।श्रृंगार गौरी और अन्य विग्रहों के बारे में पता लगाने के लिए 08 अप्रैल 2022 को अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर को नियुक्त किया।26 अप्रैल को वाराणसी के सिविल जज सिनियर डिवीजन रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने पूराने आदेश को बरकरार रखते हुए ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण का आदेश दिया था।
अब ये देखना महत्वपूर्ण है कि कोर्ट महिलाओं को ज्ञानवापी में पूजा की इजाजत देगा या नहीं।आगे चलकर ये मामला कौन सा रूप अख्तियार करता है।मुस्लिम पक्ष ने अदालत के फैसले पर निराशा जताया है।औवैसी ने वाराणसी कोर्ट के आदेश पर चिंता जताते हुए कहा कि ज्ञानवापी मस्जिद का केस बाबरी मस्जिद के रास्ते पर जाता दिख रहा है और ऐसे तो देश 80-90 के दशक में वापस चला जाएगा।इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील होनी चाहिए।ओवैसी ने 1942 के गजट में इसे मस्जिद और वक्फबोर्ड की संपत्ति बताते हुए कह दिया कि इस तरह के अदालती फैसलों से देश अस्थिर होगा।
आपको बता दें कि आजादी से पहले भी इस मामले में कई विवाद हुए थे।एक विवाद मस्जिद परिसर के बाहर मंदिर के क्षेत्र को लेकर सांप्रदायिक दंगा भड़क गया था।सन् 1991 के बाद ज्ञानवापी मस्जिद के चारों तरफ लोहे की बाड बना दी गई थी।बताते हैं कि इस दंगे में दोनों तरफ के कई लोग मारे गए थे।
ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने,
लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई।
हमें इतिहास की गलतियों से सबक लेते हुए आपसी भाईचारा बनाए रखना है।हम अगर अपने पूर्वजों की गलती को सुधार लेते हैं तो इससे बेहतर और कुछ नहीं होगा।वो दौर तलवारों का था और बहुत से फैसले ताकत की बलपर हुए थे मगर आज के सभ्य समाज में इस प्रकार के फैसले नहीं होते।किसी भी विवाद का निपटारा अदालत में होता है और उसका फैसला सभी को मान्य होता है।दोनों पक्षों को संयम बरतना चाहिए और दम साधकर आदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए।गंगा-जमुनी तहजीब तो हमें यही सिखाती है।
अजय श्रीवास्तव





