राम रहीम को 15वीं बार पैरोल पर उठते सवाल

हरियाणा के रोहतक स्थित सुनारिया जेल में बलात्कार और हत्या के गंभीर आरोपों में 20 साल की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को 15वीं बार पैरोल मंजूर कर दी गई है। इसके तहत वह करीब 40 दिनों के लिए जेल से बाहर सिरसा डेरा में रहेंगे। 2017 में सजा मिलने के बाद अब तक यह सबसे निरंतर और लंबा पैरोल सिलसिला है, जिसने न केवल न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि पीड़ित परिवारों और समाज में नाराजगी भी पैदा की है।गुरमीत राम रहीम ने सोमवार को जेल से बाहर आते ही अपने समर्थकों के स्वागत में पहुंची बड़ी संख्या में गाड़ियों के काफिले के बीच सिरसा डेरा सच्चा सौदा के लिए प्रस्थान किया। पैरोल अवधि के दौरान वह वहीं रहेंगे। रिकॉर्ड्स के अनुसार, 2017 से अब तक वह कुल 405 दिन से अधिक समय जेल से बाहर रह चुके हैं। यानी सिर्फ 8 साल और 4 महीने की सज़ा में उन्होंने लगभग एक पूरा साल जेल की सुरक्षा से बाहर गुज़ारा है।पहली बार उन्हें 24 अक्टूबर 2021 को बीमार मां से मिलने के लिए सिर्फ एक दिन की पैरोल दी गई थी। इसके बाद 21 मई 2021 को भी मां की बीमारी के कारण एक दिन की पैरोल मिली। लेकिन तीसरी बार, 7 फरवरी 2022, उन्हें 21 दिन के लिए जेल से बाहर आने की अनुमति मिली, उस समय पंजाब में विधानसभा चुनाव चल रहे थे। चौथी बार 17 जून 2022, उन्हें 30 दिन के लिए पैरोल मिली, हरियाणा में निकाय चुनाव के दौरान। पांचवीं बार 15 अक्टूबर 2022 को उन्हें 40 दिन के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति मिली, उसी दौरान आदमपुर उपचुनाव था।
इसके बाद भी सिलसिला लगातार चलता रहा। छठी बार 21 जनवरी 2023 को शाह सतनाम जयंती के मौके पर 40 दिन, सातवीं बार 20 जुलाई 2023 को जन्मदिन के समय 30 दिन, आठवीं बार 21 नवंबर 2023 को राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान 21 दिन, नौवीं बार 19 जनवरी 2024 को लोकसभा चुनाव के समय 50 दिन, दसवीं बार 13 अगस्त 2024 को जन्मदिन के आसपास 21 दिन, ग्यारहवीं बार 1 अक्टूबर 2024 हरियाणा चुनाव में 21 दिन, बारहवीं बार 28 जनवरी 2025 दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय 30 दिन, तेरहवीं बार 9 अप्रैल 2025 डेरा सच्चा सौदा स्थापना दिवस के मौके पर 41 दिन, चौदहवीं बार 5 अगस्त 2025 जन्मदिन के आसपास 40 दिन और अब पंद्रहवीं बार 3 जनवरी 2026 को 40 दिन के लिए पैरोल मिली।इस लगातार पैरोल सिलसिले को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराध में सज़ायाफ्ता के प्रति प्रशासन और सरकार की नरमी का कारण राजनीतिक दबाव या सामाजिक स्थिति है। पैरोल नियमों के अनुसार कैदी को केवल परिवार में मौत, गंभीर बीमारी, करीबी की शादी या किसी अन्य अत्यावश्यक मानवीय कारण से ही अस्थायी रूप से जेल से बाहर आने की अनुमति मिल सकती है। लेकिन गुरमीत राम रहीम को जन्मदिन, चुनाव या धार्मिक आयोजन जैसे अवसरों पर बार-बार जेल से बाहर भेजा जाना नियमों की सीमाओं के परे है।
सामाजिक संगठनों और पीड़ित परिवारों ने इस बार-बार की पैरोल की अनुमति को न्यायिक मर्यादाओं के विरुद्ध बताया है। ज्ञानी राम सिंह खासला ने इसे जख्मों पर नमक छिड़कने के समान बताया। उनका कहना है कि सरकार लंबे समय से जेलों में बंद सिख कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर चुप है, लेकिन बलात्कारी गुरमीत राम रहीम को लगातार पैरोल मिल रही है, जिससे समाज और समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंच रही है।इस सिलसिले में आँकड़े भी हैरान कर देने वाले हैं। आठ साल और चार महीने की सज़ा में गुरमीत राम रहीम कुल 387 दिन जेल से बाहर रह चुके हैं। यानी वह इस सज़ा का एक वर्ष से अधिक समय जेल की दीवारों से दूर गुज़ार चुके हैं। वहीं, आसाराम बापू को जेल से बाहर आने में एक दशक से अधिक समय लग गया और उन्हें हाल ही में मेडिकल ग्राउंड पर छह महीने की अंतरिम जमानत मिली। कुलदीप सेंगर को बलात्कार के लिए उम्रकैद मिली थी, जिसे हाईकोर्ट ने सस्पेंड किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पलट दिया। इस तुलना से यह स्पष्ट होता है कि गुरमीत राम रहीम को दी जाने वाली रियायत असाधारण और विवादास्पद है।सामाजिक और राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि पैरोल का बार-बार मिलना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक और सामाजिक कारणों का असर भी देखा जा सकता है। चुनाव के समय, जन्मदिन या धार्मिक आयोजन के मौके पर पैरोल देना न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता और समानता पर सवाल खड़ा करता है।
पारिवारिक और मानवीय कारणों से पैरोल दी जाती है, लेकिन राजनीतिक अवसरों और व्यक्तिगत उत्सवों के लिए बार-बार पैरोल देना न्याय और समाज के लिए गंभीर चुनौती है। इससे पीड़ित परिवारों की पीड़ा और बढ़ती है, और यह संदेश जाता है कि समाज में कुछ लोग कानून से अलग विशेषाधिकार पा सकते हैं।गुरमीत राम रहीम के बार-बार जेल से बाहर आने के सिलसिले ने यह भी उजागर किया कि सज़ा का वास्तविक अर्थ और जेल का उद्देश्य क्या है, इसे आम जनता और पीड़ित परिवार सही ढंग से नहीं समझ पा रहे हैं। अदालत और प्रशासन के निर्णयों में समानता और पारदर्शिता होनी चाहिए, ताकि न्याय व्यवस्था में विश्वास बनाए रखा जा सके। सामाजिक दृष्टि से यह भी देखा गया है कि ऐसे अपराधियों के बार-बार जेल से बाहर आने से समुदायों की भावनाएं आहत होती हैं और समानता का संदेश कमजोर होता है। कई लोग कहते हैं कि अगर पैरोल केवल कानूनी औचित्य के आधार पर दी जाए, तो न्याय की मर्यादा और समाज में विश्वास दोनों बनाए रखा जा सकता है।इस बार-बार पैरोल मिलने के सिलसिले ने यह साबित कर दिया है कि पैरोल केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय बहस का विषय भी बन गई है। न्यायपालिका और प्रशासन को इसे और अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायसंगत बनाना चाहिए, ताकि किसी भी अपराधी को विशेषाधिकार प्राप्त न हो और सभी पीड़ितों को न्याय मिले।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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