
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने प्रयागराज में चल रहे माघ मेले से दुखी मन से विदा लेने की घोषणा कर दी है। उन्होंने कहा कि माघ मेला में आने से पहले उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि परिस्थितियां इस तरह बनेंगी और उन्हें बिना संगम स्नान किए लौटना पड़ेगा। यहां उनकी पहचान और सम्मान पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने का प्रयास किया गया।
बुधवार सुबह आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में शंकराचार्य ने कहा कि वह पूर्ण आस्था और श्रद्धा के साथ माघ मेला में आए थे, लेकिन हालात ऐसे बने कि उन्हें यह कठिन निर्णय लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि प्रयागराज हमेशा से शांति, विश्वास और सनातन परंपराओं की पवित्र भूमि रहा है और यहां से इस प्रकार लौटना उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक है। शंकराचार्य ने बताया कि माघ मेले के दौरान घटी एक घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। संगम में स्नान उनके लिए केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि गहरी आस्था का विषय है, बावजूद इसके मौजूदा परिस्थितियों में उन्होंने मेला छोड़ने का फैसला किया। उनके इस निर्णय के बाद संत समाज और श्रद्धालुओं के बीच चर्चाएं तेज हो गई हैं।
“घटना ने आत्मा को झकझोर दिया”
शंकराचार्य ने कहा कि उन्होंने अन्याय को स्वीकार करने के बजाय न्याय की प्रतीक्षा का मार्ग चुना है। शब्द आज साथ नहीं दे रहे और स्वर बोझिल हैं। प्रयागराज की धरती पर जो कुछ घटित हुआ, उसने उनकी आत्मा को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने कहा कि वह संगम में स्नान किए बिना जा रहे हैं, लेकिन अपने पीछे सत्य की गूंज छोड़कर जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रशासन की ओर से प्रस्ताव मिला था कि जब चाहें, ससम्मान स्नान कराया जाएगा और अधिकारी पुष्पवर्षा करेंगे, लेकिन उस दिन की घटना के लिए क्षमा याचना नहीं की गई। ऐसे में उन्हें लगा कि यदि वह स्नान कर लेते, तो मूल मुद्दा अधूरा रह जाता।
प्रशासन के आग्रह को किया अस्वीकार
ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने कहा कि जिस मुद्दे को लेकर वे करीब दस दिनों तक धरने पर बैठे रहे, उस पर लंबे समय तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। जब उन्होंने जाने का निर्णय लिया, तभी प्रशासन का प्रस्ताव आया। इसलिए उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि ऐसा करने से वे अपने भक्तों के साथ न्याय नहीं कर पाते। उन्होंने आरोप लगाया कि माघ मेले में संतों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया, जो सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। शंकराचार्य ने दो मिनट का मौन रखकर संतों के अपमान के दोषियों को दंड देने की प्रार्थना भगवान से की।
“सनातन विरोधियों को सत्ता में रहने का अधिकार नहीं”
पत्रकारों से बातचीत में शंकराचार्य ने कहा कि प्रयागराज की पवित्र भूमि पर वे आध्यात्मिक शांति की कामना लेकर आए थे, लेकिन आज यहां से भारी मन और गहरी पीड़ा के साथ लौट रहे हैं। यहां घटित घटनाओं ने न केवल उनकी आत्मा को आहत किया है, बल्कि न्याय और मानवता के प्रति सामूहिक विश्वास पर भी प्रश्न खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि संगम स्नान अंतरात्मा की शांति का मार्ग है, लेकिन जब मन में क्षोभ और ग्लानि हो, तो जल की शीतलता भी अर्थहीन हो जाती है। शंकराचार्य ने कहा कि न्याय की प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं होती। आज वे यहां से जा रहे हैं, लेकिन अपने पीछे सत्य की गूंज और कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़कर जा रहे हैं। साथ ही, उन्होंने उनके साथ खड़े रहने वाले सभी लोगों का आभार व्यक्त किया।





