लोकसभा स्पीकर के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव दांव

विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कुछ माह पूर्व तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीश धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की असफल कोशिश के बाद अब वही दल लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को निशाना बना रहे हैं। संसद के निचले सदन में चल रहे गतिरोध के बीच यह नया विवाद तेज हो गया है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का पूरा समय न मिलने और उनकी टिप्पणियों पर सख्ती के कारण विपक्ष नाराज है। सूत्र बताते हैं कि ओम बिरला नियमों का सख्ती से पालन कर रहे हैं, जिससे कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल असंतुष्ट हैं। कई दल इस प्रस्ताव पर सहमति जता चुके हैं, हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। सदन सोमवार को भी दोपहर तक स्थगित रहा।

लोकसभा में वर्तमान संख्या बल स्पष्ट रूप से सत्ता पक्ष के पक्ष में है। भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास कुल 293 सांसद हैं। इसमें भाजपा के 240, जनता दल यूनाइटेड के 12, तेलुगु देशम पार्टी के 16, राष्ट्रीय लोक दल के 2 और अन्य छोटे सहयोगी दलों के सांसद शामिल हैं। विपक्ष के पास इंडिया गठबंधन के अंतर्गत कुल 234 सांसद हैं। इसमें कांग्रेस के 99, समाजवादी पार्टी के 37, तृणमूल कांग्रेस के 29, द्रमुक के 22, अन्य विधायक दल के 47 शामिल हैं। अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन पारित होने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत यानी 543 में से 272 अधिक की जरूरत पड़ती है। राजग को 21 सांसदों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त है, जिससे प्रस्ताव पास होना मुश्किल दिखता है। ऐसे प्रस्ताव सदन की कार्यवाही को लंबे समय तक ठप कर सकते हैं। विपक्ष का मकसद सदन अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर राजनीतिक लाभ कमाना है। ओम बिरला ने राष्ट्रपति अभिभाषण पर बहस में विपक्ष को पर्याप्त समय दिया था, लेकिन राहुल गांधी के भाषण में नियमों से बाहर जाने पर उन्हें रोका। विपक्ष इसे पक्षपात मान रहा है। राज्यसभा में जगदीश धनखड़ के खिलाफ प्रयास विफल हो चुका था, अब लोकसभा में नया दांव खेला जा रहा है। कई विपक्षी नेता इसे संसदीय परंपराओं के खिलाफ बता रहे हैं।

इतिहास में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के कुछ दुर्लभ उदाहरण हैं। पहला ऐसा प्रयास 1954 में हुआ जब लोकसभा के प्रथम सभापति गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ बिहार के सोशलिस्ट नेता विग्नेश्वर मिसिर ने प्रस्ताव पेश किया। दो घंटे की बहस के बाद यह खारिज हो गया। जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में यह घटना हुई, जब सभापति पर सदन में पक्षपात के आरोप लगे थे। इसके बाद 1966 में सोशलिस्ट नेता मधु लिमये ने तत्कालीन सभापति सरदार हुकम सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया। हुकम सिंह 1962 से 1967 तक सभापति रहे। प्रस्ताव पर चर्चा हुई, लेकिन यह भी असफल रहा। विपक्ष ने सभापति के निर्णयों को चुनौती दी थी।

तीसरा प्रमुख उदाहरण 1985 का है। उस समय बलराम जाखड़ लोकसभा सभापति थे, जो 1980 से 1989 तक पद पर रहे। विपक्ष ने उनके खिलाफ प्रस्ताव लाया, लेकिन बहुमत के अभाव में यह पारित नहीं हो सका। इन तीनों मामलों में प्रस्ताव असफल रहे क्योंकि सत्ता पक्ष को बहुमत था। भारतीय संसदीय इतिहास में कुल 27 अविश्वास प्रस्ताव सरकार के खिलाफ आ चुके हैं, लेकिन स्पीकर के खिलाफ केवल ये तीन बार प्रयास हुए। सभी विफल रहे। लोकसभा नियमावली के अनुसार स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से महासचिव को दिया जाता है। सभापति स्वयं प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का अधिकार रखते हैं। विपक्षी दलों को एकजुट रहना होगा, लेकिन आंतरिक मतभेद इसे कमजोर कर सकते हैं।

वर्तमान संदर्भ में ओम बिरला 2019 से लोकसभा सभापति हैं। वे दूसरी बार 2024 में चुने गए। भाजपा उन्हें निष्पक्ष मानती है, जबकि विपक्ष सदन में विपक्षी आवाज दबाने का आरोप लगाता है। राहुल गांधी को राष्ट्रपति अभिभाषण बहस में बोलने का समय मिला था, लेकिन उनकी टिप्पणियां नियमों के विरुद्ध पाई गईं। बिरला ने सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए कार्रवाई की। विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और अन्य दल समर्थन की बात कर रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह प्रस्ताव सदन की कार्यवाही को पटरी से उतारने का हथकंडा है। लोकसभा में राजग का मजबूत बहुमत प्रस्ताव को हराने में सक्षम है। विपक्ष को संसदीय मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। इतिहास गवाह है कि ऐसे प्रयास विपक्ष के लिए राजनीतिक नुकसान ही साबित हुए हैं। सत्ता पक्ष इसे लोकतंत्र विरोधी कदम बता रहा है। संसद सत्र के दौरान यह मुद्दा गरमाता रहेगा। विपक्षी एकता की परीक्षा होगी। लोकसभा स्पीकर का पद सर्वाेच्च सम्मान का होता है, इसे कमजोर करने की कोशिशें उचित नहीं। राजनीतिक लाभ के चक्कर में संसदीय परंपराओं का उल्लंघन न हो।

भाजपा नेता इसे विपक्ष का हताशापूर्ण कदम बता रहे हैं। वे कहते हैं कि स्पीकर ने सदन को सुचारू रूप से चलाने का प्रयास किया। विपक्ष को बहस के बजाय हंगामा पसंद है। ओम बिरला ने विपक्ष को पर्याप्त अवसर दिए। अब प्रस्ताव लाकर वे अपनी हार स्वीकार कर रहे हैं। विपक्षी नेता असदुद्दीन ओवैसी, महुआ मोइत्रा जैसे नाम इस मुद्दे पर मुखर हैं। लेकिन बहुमत के आगे यह प्रयास व्यर्थ जाएगा। संसद को रचनात्मक बहस की जरूरत है। अविश्वास प्रस्ताव से मुद्दे हल नहीं होंगे। लोकतंत्र की मजबूती के लिए सहमति आवश्यक है। यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में नया अध्याय जोड़ रहा है। विपक्ष की रणनीति असफल साबित हो रही है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला मजबूती से अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। सदन की कार्यवाही सुचारू रखना उनकी प्राथमिकता है। विपक्ष को आत्ममंथन करना चाहिए। इतिहास दोहराने की बजाय नई दिशा दें। संसदीय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हों।

संजय सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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