स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ यौन शोषण के आरोप में एफआईआर दर्ज

प्रयागराज के झूंसी थाने में ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, उनके शिष्य प्रत्यक्त चैतन्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी तथा 2–3 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध बाल यौन शोषण के आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह कार्रवाई इलाहाबाद जिला न्यायालय की पॉक्सो विशेष अदालत के निर्देश पर की गई, जिसमें न्यायाधीश विनोद कुमार चौरसिया ने पुलिस को संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर निष्पक्ष जांच के आदेश दिए। यह मामला तब सामने आया जब आशुतोष ब्रह्मचारी ने बालकों के संरक्षक के रूप में अदालत में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि माघ मेले के दौरान गुरु सेवा के नाम पर दो नाबालिगों का शोषण किया गया। अदालत ने पीड़ितों के बयान दर्ज करने और पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट तलब करने के बाद आरोपों को प्रथम दृष्टया गंभीर माना तथा स्वतंत्र जांच आवश्यक बताई। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है।

जांच के निर्देश और मेडिकल परीक्षण
अदालत के 14 पृष्ठीय आदेश में कहा गया कि मामले की प्रकृति को देखते हुए पीड़ितों और आरोपियों का चिकित्सीय परीक्षण कराया जा सकता है। साथ ही पुलिस को गवाहों के बयान, घटनास्थल से साक्ष्य, मोबाइल लोकेशन, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच कराने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि नामजद आरोपियों के अलावा कुछ अज्ञात व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच जरूरी है।

पुलिस पर प्रारंभिक निष्क्रियता के आरोप
अदालत ने नोट किया कि पीड़ित पक्ष द्वारा थाने से लेकर कमिश्नर कार्यालय तक शिकायत करने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी। अपर पुलिस आयुक्त की रिपोर्ट में पीड़ितों के ऑडियो-वीडियो बयान प्रथम दृष्टया विश्वसनीय पाए गए हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि मामला जटिल है और सच्चाई तक पहुंचने के लिए विशेषज्ञ पुलिस जांच आवश्यक है।

मौनी अमावस्या विवाद की पृष्ठभूमि
यह प्रकरण उस विवाद के बाद सुर्खियों में आया जो 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर प्रशासन और शंकराचार्य के बीच हुआ था। पालकी से जाने को लेकर पुलिस से कहासुनी के बाद वे अपने शिविर के सामने धरने पर बैठ गए थे और अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की थी। बाद में 28 जनवरी को वे माघ मेला छोड़कर चले गए। इस मुद्दे पर अखिलेश यादव ने भी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि पहली बार किसी शंकराचार्य को संगम स्नान से रोका गया।

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