खामेनेई की मौत ने मिटाई शिया-सुन्नियों के बीच की दूरी

लखनऊ से लेकर पूरे देश में एकजुट खड़े नजर आये मुसलमान

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले ने ईरान को गहरा आघात पहुंचाया है। हमले में ईरान के राष्ट्रपति और सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामनेई सहित उनके निकटतम सहयोगी मारे गए। यह घटना न केवल इस्लामिक जगत को हिला देने वाली थी, बल्कि पूरी दुनिया में आक्रोश की लहर पैदा कर दी। खामेनेई, जो दशकों से ईरान की धार्मिक और राजनीतिक नीतियों के प्रतीक थे, उनकी विदाई ने मुसलमानों के दिलों में गहरा शोक भर दिया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर पाकिस्तान की सड़कों तक, प्रदर्शनकारियों की भीड़ सड़कों पर उतर आई। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह था कि शिया और सुन्नी समुदाय, जो सदियों से विभिन्न मुद्दों पर विभाजित रहे हैं, इस बार एकजुट होकर खड़े दिखे। लखनऊ के इमामबाड़ों और मस्जिदों के बाहर शिया युवा सुन्नी भाइयों के कंधे से कंधा मिलाकर नारेबाजी कर रहे थे। बैनरों पर लिखा था, खामेनेई हमारा नेता, अमेरिका का अंत नजदीक। यह एकजुटता केवल भारत तक सीमित न रही। पाकिस्तान में तो गुस्सा इतना भड़का कि इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास पर हमलावरों ने धावा बोल दिया। वहां की सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें दस लोग मारे गए। ईरान ने भी चुप न बैठने का फैसला किया। उसने न केवल हमले का बदला लिया, बल्कि उन देशों पर भी प्रहार किया जो अमेरिका-इजरायल के साथ खड़े थे। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी राष्ट्रों के ठिकानों पर ईरानी मिसाइलों की बौछार हो गई। जंग का दायरा तेजी से फैल रहा था।

इस घटना ने वैश्विक पटल पर कई सवाल खड़े कर दिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या यह शिया-सुन्नी एकजुटता लंबे समय तक बनी रहेगी? इतिहास गवाह है कि मुसलमानों के इन दो प्रमुख संप्रदायों के बीच दरारें गहरी रही हैं। शिया समुदाय खुद को पैगंबर मुहम्मद के दामाद अली और उनके वंशजों का सच्चा उत्तराधिकारी मानता है, जबकि सुन्नी अधिकांश मुसलमानों को खलीफा अबू बकर, उमर और उस्मान के अनुयायी मानते हैं। इन मतभेदों ने सदियों से संघर्षों को जन्म दिया। लेकिन खामेनेई की मौत ने एक नया मोड़ ला दिया। पूरी दुनिया में मुसलमानों ने इसे इस्लाम पर प्रत्यक्ष हमला माना। लेबनान के हिजबुल्लाह से लेकर यमन के हूती विद्रोहियों तक, सभी शिया गुट सक्रिय हो गए। सुन्नी बहुल देशों जैसे तुर्की, मलेशिया और इंडोनेशिया में भी सड़कें उत्तेजित भीड़ से भर गईं। तुर्की के राष्ट्रपति ने खामेनेई को शहीद घोषित करते हुए अमेरिका के खिलाफ कड़े बयान दिए। मलेशिया की मस्जिदों से फतवे जारी हुए कि इस हमले का जवाब देना हर मुसलमान का फर्ज है। यह एकजुटता इसलिए मजबूत हुई क्योंकि अमेरिका और इजरायल को सामान्य दुश्मन के रूप में देखा गया। खाड़ी के सुन्नी राष्ट्र, जो ईरान के पारंपरिक शत्रु रहे हैं, इस बार चुप्पी साधे रहे। सऊदी अरब ने भी खुले तौर पर अमेरिका का साथ न देकर तटस्थ रुख अपनाया। ईरान के हमलों ने इन देशों को झकझोर दिया, जिससे उनकी चुप्पी और गहरी हो गई।

अब भविष्य का अनुमान लगाना कठिन है। यदि जंग लंबी खिंचती है, तो शिया-सुन्नी एकजुटता टूट सकती है। ईरान के उत्तराधिकारी यदि कट्टर शिया नीतियां अपनाते हैं, तो सुन्नी राष्ट्र फिर से ईरान विरोधी मोर्चा बना सकते हैं। लेकिन यदि अमेरिका-इजरायल का दबाव बढ़ता है, तो यह एकजुटता मजबूत हो सकती है। लखनऊ जैसे शहरों में देखा गया कि युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के जरिए एकत्रित हो रही थी। व्हाट्सएप ग्रुपों और फेसबुक लाइव पर शिया मौलवी सुन्नी विद्वानों के साथ संवाद कर रहे थे। यह बदलाव दीर्घकालिक साबित हो सकता है। पाकिस्तान में सुन्नी तालिबान गुटों ने भी शिया भाइयों का साथ दिया, जो दुर्लभ दृश्य था। ईरान ने अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रखा है। उसके पास बैलिस्टिक मिसाइलें है जो इजरायल तक पहुंच सकती हैं। अमेरिका के नौसैनिक जहाजों पर हमले की योजना बन रही है। यदि रूस और चीन ईरान का साथ देते हैं, तो जंग विश्व युद्ध का रूप ले सकती है। भारत जैसे तटस्थ देशों को भी कूटनीतिक दबाव झेलना पड़ सकता है। लखनऊ में प्रदर्शनकारियों ने भारत सरकार से अपील की कि वह इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में आवाज उठाए।

खामेनेई की मौत से पहले भी शिया-सुन्नी एकजुटता के कई उदाहरण देखे गए थे। सबसे प्रमुख फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष था। जब इजरायल ने गाजा पर बमबारी की, तब शिया बहुल ईरान और सुन्नी बहुल मिस्र, जॉर्डन एक साथ खड़े हुए। 2023 के अक्टूबर हमले में पूरी इस्लामिक दुनिया सड़कों पर उतरी। लेबनान के शिया हिजबुल्लाह और सुन्नी फिलिस्तीनी गुट हमास ने संयुक्त मोर्चा बनाया। दूसरा उदाहरण सीरिया का गृहयुद्ध था। हालांकि वहां आंतरिक कलह थी, लेकिन अमेरिका के हवाई हमलों के खिलाफ शिया ईरान और सुन्नी तुर्की ने कभी-कभी एक सुर में बोलना शुरू किया। 2013 में जब अमेरिका ने सीरिया पर हमला करने की योजना बनाई, तब शिया-सुन्नी नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर विरोध किया। तीसरा बड़ा मामला नरसंहार था। 1990 के दशक में जब सर्बियाई सेना ने मुसलमानों का कत्लेआम किया, तब ईरान ने शिया स्वयंसेवकों को भेजा और सऊदी अरब ने सुन्नी लड़ाकों को। दोनों ने मिलकर सहायता पहुंचाई। चौथा उदाहरण कश्मीर विवाद है। भारत के खिलाफ जब पाकिस्तान बोलता है, तो ईरान भी कभी-कभी समर्थन में आ जाता है। 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटाया गया, तब तेहरान की मस्जिदों में कश्मीर के लिए दुआएं हुईं, और रियाद ने भी चिंता जताई। इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि बाहरी आक्रमण के समय मुसलमान एकजुट हो जाते हैं। खामेनेई की मौत ने इस प्रवृत्ति को नई ताकत दी।

ईरान का जवाबी हमला अब चरम पर है। उसने इजरायल के सैन्य अड्डों पर ड्रोन हमले किए, जिसमें सैकड़ों सैनिक मारे गए। अमेरिका के सहयोगी देशों के तेल संयंत्रों पर प्रहार हुआ। वैश्विक अर्थaव्यवस्था डगमगा रही है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत में भी पेट्रोल महंगा हो गया। लखनऊ के बाजारों में लोग चिंतित हैं। प्रदर्शन अब शांतिपूर्ण से हिंसक हो रहे हैं। सरकार को कर्फ्यू लगाना पड़ सकता है। लेकिन यह एकजुटता मुसलमानों के लिए नया अध्याय लिख रही है। यदि यह बनी रही, तो इस्लामिक जगत मजबूत होगा। अन्यथा, पुरानी दरारें फिर उभरेंगी। भविष्य अनिश्चित है, लेकिन इतिहास सिखाता है कि एकता ही सबसे बड़ा हथियार है। दुनिया अब सांस थामे देख रही है कि अगला कदम कौन उठाएगा। ईरान के नए नेता ने प्रतिज्ञा ली है कि बदला पूरा होगा। वैश्विक शक्तियां मध्यस्थता की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सफलता संदिग्ध है। यह संकट न केवल मध्य पूर्व तक सीमित रहेगा, बल्कि पूरी सभ्यता को प्रभावित करेगा।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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