
संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन सहित 22 देशों ने ईरान की सैन्य गतिविधियों की कड़ी आलोचना की है। इन देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने पर गंभीर चिंता जताते हुए ईरान से अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की अपील की है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच 22 देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर एक संयुक्त बयान जारी किया। इस बयान में क्षेत्र के आसपास ईरान की हालिया गतिविधियों पर सख्त आपत्ति दर्ज कराई गई है। बयान जारी करने वाले देशों में संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, लातविया, स्लोवेनिया, एस्टोनिया, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, चेक गणराज्य, रोमानिया, बहरीन, लिथुआनिया और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
साझा बयान में कहा गया कि खाड़ी क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों पर ईरान के हमले बेहद आपत्तिजनक हैं। ईरानी बलों द्वारा तेल और गैस जैसे नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना गंभीर चिंता का विषय है। साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बाधित करना वैश्विक स्तर पर बड़ा मुद्दा बन सकता है। इन देशों ने क्षेत्र में बढ़ते टकराव पर भी गहरी चिंता व्यक्त की है और ईरान से अपनी आक्रामक गतिविधियां तुरंत रोकने को कहा है। उन्होंने समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने, ड्रोन और मिसाइल हमले करने तथा व्यापारिक जहाजों की आवाजाही में बाधा डालने जैसी कार्रवाइयों को बंद करने की मांग की। साथ ही, ईरान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का पालन करने की सलाह दी गई है।
अंतरराष्ट्रीय नियमों का हवाला
अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार समुद्री मार्गों पर जहाजों की निर्बाध आवाजाही एक मौलिक अधिकार है। ईरान की मौजूदा गतिविधियों का असर वैश्विक स्तर पर पड़ेगा, विशेषकर कमजोर और विकासशील देशों पर। व्यापारिक जहाजों के मार्ग में हस्तक्षेप और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करना अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। इन देशों ने नागरिक ठिकानों और तेल-गैस संयंत्रों पर हमलों को तुरंत बंद करने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) द्वारा आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार जारी करने के निर्णय का भी इन देशों ने स्वागत किया है। ऊर्जा बाजार को स्थिर बनाए रखने के लिए ये देश तेल उत्पादक राष्ट्रों के साथ मिलकर उत्पादन बढ़ाने पर काम करेंगे। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सहयोग से उन देशों को सहायता प्रदान की जाएगी जो इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।






