चीनी सीसीटीवी बैन; करते थे मुखबिरी…?                               

देश भर में सुरक्षा की दीवार खड़ी करने के नाम पर लगाए जा रहे कैमरे अब खुद सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए थे। लेकिन अब सरकार ने इस चुपके से फैल रही जासूसी के जाल पर सख्ती से हमला बोला है। 1 अप्रैल 2026 से चीनी कंपनियों के इंटरनेट से जुड़े सीसीटीवी कैमरों की बिक्री पर रोक लग जाएगी। हिकविजन, दाहुआ और टीपी लिंक जैसे ब्रांड बिना एसटीक्यूसी सर्टिफिकेशन के अब बाजार में नहीं आ सकेंगे। यह फैसला सिर्फ बाजार को बदलने वाला नहीं है, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा को नई दिशा देने वाला है। हाल की घटनाओं ने साफ कर दिया कि सस्ते कैमरों के पीछे कितना बड़ा खतरा छिपा था। पिछले कुछ हफ्तों में गाजियाबाद पुलिस ने एक ऐसा जासूसी गिरोह पकड़ा, जिसमें पाकिस्तान की आईएसआई सीधे भारतीय रेलवे स्टेशनों की निगरानी कर रही थी। दिल्ली कैंट और सोनीपत स्टेशन के पास सोलर पैनल वाले छिपे कैमरे लगाए गए थे। इनकी लाइव फीड पाकिस्तान तक पहुंच रही थी। अठारह दिन तक सोनीपत स्टेशन के प्लेटफॉर्मों की हर गतिविधि दुश्मन की स्क्रीन पर दिख रही थी। यह सिर्फ एक मामला नहीं था। सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे देश में सीसीटीवी नेटवर्क की जांच शुरू कर दी है। गृह मंत्रालय ने सभी बड़े शहरों में हर कैमरे की फिजिकल वेरिफिकेशन का आदेश दिया है। क्योंकि पता चला कि कई कैमरे न सिर्फ विदेशी सर्वर से जुड़े थे, बल्कि उनकी फीड बिना किसी की जानकारी के बाहर भेजी जा रही थी।

भारत में सीसीटीवी का विस्फोटक विस्तार हुआ है। हर घर के गेट पर, ड्रॉइंग रूम में, बच्चों के कमरे के बाहर, यहां तक कि किचन और बेडरूम तक कैमरे लग रहे हैं। कीमतें गिरने के कारण चीन से सस्ते हार्डवेयर आयात हो रहे थे। भारतीय कंपनियां उन पर अपना स्टिकर चिपका कर बेच रही थीं। लेकिन हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों में कमजोरियां थीं। कैमरा सेटअप करते ही यूजर को कंसेंट देना पड़ता था कि कंपनी रिकॉर्डिंग को ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल करेगी। इसका मतलब साफ था कि आपकी निजी जिंदगी किसी और की स्क्रीन पर भी हो सकती है। डेटा विदेशी सर्वर पर जा रहा था। पासवर्ड डिफॉल्ट रखे जाते थे। इंस्टॉलर सालों तक उसी पासवर्ड से एक्सेस रखता था। फर्मवेयर अपडेट नजरअंदाज कर दिए जाते थे। नतीजा यह कि घर की हर गतिविधि, कब कौन आया, कब बाहर गया, सब किसी और के पास पहुंच जाता था। यह खतरा सिर्फ घरों तक सीमित नहीं था। पब्लिक जगहों पर लगे कैमरे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए और भी खतरनाक साबित हो रहे थे। रेलवे स्टेशनों, सरकारी दफ्तरों और संवेदनशील इलाकों में भी यही चीनी कैमरे लगे थे। हाल की जासूसी घटनाओं ने दिखा दिया कि दुश्मन इन्हें आसानी से हाइजैक कर सकता है। मिडिल ईस्ट की हालिया जंग में भी सीसीटीवी को टारगेट बनाकर प्रेसाइज अटैक किए गए थे। भारत में भी यही आशंका थी। इसलिए सरकार ने अब सख्त गाइडलाइंस जारी की हैं। मीटवाई ने सीसीटीवी के लिए एसेंशियल रिक्वायरमेंट्स तय किए हैं। हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, सोर्स कोड, सबकी जांच होगी। बिना सर्टिफिकेशन के कैमरे बेचना गैरकानूनी होगा। यह नियम सरकारी खरीद पर पहले से लागू था, लेकिन अब निजी बाजार पर भी पूरी तरह लागू हो जाएगा।

नए नियमों का सबसे बड़ा फायदा भारतीय कंपनियों को मिलेगा। सीपी प्लस, स्पार्श, मैट्रिक्स जैसी देशी ब्रांड्स अब बाजार पर कब्जा कर लेंगी। पहले चीनी ब्रांड्स ने सस्ती कीमत के नाम पर तीस प्रतिशत से ज्यादा बाजार हिस्सा हथिया लिया था। अब कीमतें थोड़ी बढ़ सकती हैं, लेकिन सुरक्षा की कीमत चुकाने लायक है। सरकार का कहना है कि हर कैमरे में एंड टू एंड एनक्रिप्शन, लोकल डेटा स्टोरेज और पारदर्शी सर्वर पॉलिसी होनी चाहिए। डेटा भारत में ही रहेगा। कोई विदेशी सर्वर नहीं। यह बदलाव न सिर्फ जासूसी रोकने के लिए जरूरी है, बल्कि आम नागरिक की निजी जिंदगी की रक्षा के लिए भी है। फिर भी सबसे बड़ा सवाल पुराने कैमरों का है। देश में करोड़ों सीसीटीवी पहले से लगे हुए हैं। इनमें ज्यादातर के पासवर्ड कभी बदले नहीं गए। फर्मवेयर अपडेट नहीं हुए। इंस्टॉलर के पास अभी भी एक्सेस हो सकता है। कई मामलों में घर के कैमरे से ब्लैकमेलिंग के प्रयास भी सामने आए हैं। कोई आपके घर की रूटीन जान ले तो फिजिकल सिक्योरिटी भी खतरे में पड़ जाती है। इसलिए सरकार को सिर्फ नई बिक्री रोकने से काम नहीं चलेगा। मौजूदा कैमरों का पूरा ऑडिट करना होगा, खासकर पब्लिक प्लेसेज में। हर कैमरे की लोकेशन, मॉडल और सिक्योरिटी चेक हो। आम लोगों को भी जागरूक होना होगा।

अगर आप घर में सीसीटीवी लगा रहे हैं, तो कुछ बुनियादी बातें याद रखें। इंस्टॉलेशन के तुरंत बाद डिफॉल्ट पासवर्ड बदल दें। मजबूत पासवर्ड रखें, जिसमें अक्षर, अंक और स्पेशल कैरेक्टर हों। इंस्टॉलर को कभी भी एडमिन एक्सेस न दें। उसके फोन से लॉगआउट करवाएं। ब्रांड चुनते समय पूछें कि डेटा कहां स्टोर होता है। एंड टू एंड एनक्रिप्शन वाले कैमरे चुनें। फर्मवेयर और ऐप नियमित अपडेट करें। अगर संभव हो, तो कैमरे को अलग गेस्ट नेटवर्क पर चलाएं। रिमोट एक्सेस की जरूरत न हो, तो उसे बंद रखें। बेडरूम या निजी जगहों पर कैमरा लगाने से पहले दो बार सोचें। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन गोपनीयता उससे भी ज्यादा। यह फैसला सिर्फ एक ब्रांड पर रोक नहीं है। यह पूरे सिस्टम को सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। चीन से आयातित कैमरों में हार्डवेयर बैकडोर की आशंका हमेशा रही है। सॉफ्टवेयर भी थर्ड पार्टी का इस्तेमाल होता था। अब सरकार सुनिश्चित कर रही है कि हर कैमरा टेस्टेड और सर्टिफाइड हो। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे थे कि सस्ते कैमरे सुरक्षा के नाम पर खतरा बन रहे हैं। अब सरकार ने उनकी बात मानी है। लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई। पुराने कैमरों को अपग्रेड करने या बदलने की मुहिम चलानी होगी।

बाजार में पहले से जो स्टॉक है, उसका क्या होगा? कुछ कंपनियां पुराना माल क्लियर करने की तैयारी में हैं, लेकिन एक अप्रैल के बाद बिना सर्टिफिकेशन के बिक्री नहीं होगी। इससे छोटे वेंडरों पर असर पड़ेगा, लेकिन लंबे समय में पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ेगी। भारतीय कंपनियां अब और बेहतर प्रोडक्ट ला रही हैं। वे लोकल सर्वर, बेहतर एन्क्रिप्शन और आसान अपडेट दे रही हैं। आम आदमी को समझना होगा कि सुरक्षा सिर्फ कैमरा लगाने से नहीं आती। उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना और सुरक्षित रखना भी जरूरी है। आज के डिजिटल युग में हर घर और हर सार्वजनिक जगह निगरानी में है। लेकिन निगरानी का मतलब जासूसी नहीं होना चाहिए। सरकार का यह कदम देश को आत्मनिर्भर बनाने और विदेशी खतरे से बचाने का संकेत है। फिर भी जागरूकता सबसे बड़ी सुरक्षा है। हर नागरिक को अपने कैमरे की सेटिंग चेक करनी चाहिए। पासवर्ड बदलना चाहिए। अपडेट करना चाहिए। तभी यह कैमरा सुरक्षा का हथियार बनेगा, न कि कमजोरी। वरना सस्ते कैमरे की चकाचौंध में हम अपनी निजी जिंदगी और राष्ट्र की सुरक्षा दोनों खो सकते हैं। समय आ गया है कि हम सुरक्षा को सिर्फ दिखावा न बनाएं, बल्कि उसे वाकई मजबूत बनाएं।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ

(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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