अखिलेश का महिला आरक्षण विरोध; जातिगत जनगणना का डर या पीडीए की रक्षा

भारतीय राजनीति का मैदान हमेशा रणनीतियों और चालबाजियों से भरा रहता है, जहां हर बिल या नीति चुनावी दांव बन जाती है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार के महिला आरक्षण बिल को भाजपा की चुनावी घबराहट करार देते हुए जोरदार हमला बोला है, जो उत्तर प्रदेश की सियासत को नई ऊंचाई दे रहा है। इस बयान के पीछे सपा का विरोध केवल सतही नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है, जहां जातिगत जनगणना का मुद्दा केंद्र में है और अखिलेश को डर सताने लगा है कि कहीं उनका पीडीए फॉर्मूला कमजोर न पड़ जाए। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर तीखे लहजे में कहा कि भाजपा असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह बिल ला रही है, क्योंकि जनता का आधार खत्म हो चुका है और उनकी विदाई का समय आ गया है। उन्होंने स्पष्ट आरोप लगाया कि बिना जातिगत जनगणना के यह आरक्षण पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के अधिकारों को खत्म करने की साजिश है, जहां ए का मतलब आधी आबादी यानी महिलाओं से भी है। सपा प्रमुख का तर्क है कि जनगणना टाली जा रही है ताकि पिछड़ों और दलितों का वास्तविक हक न मिले, क्योंकि नई गिनती से जातिगत आंकड़े सामने आएंगे, जो भाजपा को असहज करेंगे। यह विरोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों से पहले पीडीए सपा की मुख्य चुनावी रणनीति बनी हुई है, जो 2024 लोकसभा चुनावों में कामयाब रही थी।

मायावती की बसपा ने भी बिल का समर्थन तो किया, लेकिन शर्त रखी कि एससी, एसटी और ओबीसी महिलाओं को अलग कोटा मिले। अखिलेश ने इसी को आधार बनाकर कहा कि भाजपा कभी पिछड़ों-दलितों को उनका हक नहीं देना चाहती। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा का विरोध बिल के कार्यान्वयन पर केंद्रित है। वे 2011 की पुरानी जनगणना के बजाय नई जनगणना और परिसीमन की मांग कर रहे हैं, क्योंकि बिना जाति आधारित आंकड़ों के आरक्षण सामाजिक न्याय से भटक सकता है। अखिलेश ने अमेठी में पत्रकारों से कहा कि सरकार की मंशा में ही आरक्षण देना नहीं है, और महिलाओं की सुरक्षा, सशक्तिकरण पर कोई काम नहीं हुआ। उन्होंने नोएडा और मेरठ की कामगार महिलाओं के दर्द का जिक्र कर सरकार को चुनौती दी कि बिल वहीं घोषित हो। सपा का विरोध इसलिए गहरा है क्योंकि पीडीए फॉर्मूला उनकी राजनीतिक पूंजी है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों को एकजुट कर सपा ने यूपी में वापसी की, और जातिगत जनगणना इसकी कुंजी है। अखिलेश ने जनगणना अधिसूचना पर तंज कसा कि जाति कॉलम न होने से भाजपा पीडीए के खिलाफ साजिश रच रही है। विश्लेषण में साफ है कि महिला बिल से डर यह है कि यह सामान्य महिलाओं को फायदा देगा, लेकिन बिना जाति ब्रेकअप के ओबीसी-एसटी-एससी महिलाओं का हिस्सा प्रभावित होगा, जो सपा के वोट बैंक को कमजोर कर सकता है। भाजपा इसे नारी शक्ति वंदन अभियान से जोड़कर महिला वोटरों को लुभा रही है, खासकर 2027 यूपी चुनावों से पहले। लेकिन अखिलेश का काउंटर है कि महंगाई, बेरोजगारी और महिलाओं की खराब स्थिति में जुमले काम नहीं आएंगे।

सवाल यह है कि अखिलेश को जातिगत जनगणना का दांव फीका पड़ने का डर है? बिल्कुल। सपा लंबे समय से जाति जनगणना की मांग पर अड़ी है, जो ओबीसी को मजबूत प्रतिनिधित्व देगी। अगर बिल बिना जनगणना के लागू होता है, तो पीडीए का नैरेटिव कमजोर पड़ेगा, क्योंकि भाजपा दावा करेगी कि महिलाओं को आरक्षण देकर सामाजिक न्याय हो गया। विपक्षी दलों की एकजुटता पीडीए प्रहरी के रूप में मजबूत हो रही है, जो भाजपा की हर चाल पर नजर रखेगी। अखिलेश का बयान चुनावी धांधली का आरोप लगाते हुए भाजपा को घेरता है, और यह यूपी की सियासत को धु्रवीकरण की ओर ले जा रहा है। भाजपा की रणनीति साफ है, बिल को 2029 लोकसभा से पहले लागू कर महिलाओं को जोड़ना, लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें 273 महिलाओं के लिए। लेकिन सपा इसे घबराहट बता रही है, क्योंकि वोटरों का अकाल है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि सपा का विरोध बिल का नहीं, बल्कि उसके बिना जाति डेटा के है, जो उनके जाति-आधारित राजनीति को चुनौती देता है। मायावती की मांग भी इसी दिशा में है, जो विपक्ष को एकजुट कर सकती है।

बहरहाल, इस पूरे प्रकरण से यूपी राजनीति में नया दौर शुरू हो गया है। अखिलेश ने महिलाओं की दुखी स्थिति पर सवाल उठाकर नैतिक ऊंचाई हासिल की। सिलेंडर महंगा, स्कूल बंद, कमीशनखोरी। लेकिन गहराई में यह पीडीए की रक्षा का संघर्ष है। अगर जनगणना होती है, तो सपा को लाभ, लेकिन भाजपा इसे टालकर बिल थोपना चाहती है। अखिलेश का डर वाजिब है, क्योंकि जातिगत जनगणना का दांव फीका पड़ गया तो पीडीए का जादू टूट सकता है। भाजपा इसे महिला सशक्तिकरण का नाम दे रही, लेकिन सपा इसे साजिश बता रही।लोकसभा में बिल पास होने के बाद राज्यसभा और विधानसभाओं में बहस तेज होगी। सपा ने हमेशा महिला आरक्षण में पिछड़ी-दलित महिलाओं का कोटा मांगा है। अखिलेश का यह हमला 2027 चुनावों की तैयारी है, जहां पीडीए को मजबूत रखना जरूरी। विश्लेषकों का अनुमान है कि यह मुद्दा विपक्ष को मजबूत करेगा, अगर जनगणना की मांग जोर पकड़ती है। भाजपा को अब नारी शक्ति अभियान से जवाब देना होगा।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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