सेकुलरिज्म का भारतीय चेहरा अब मुस्लिम पॉकेट्स तक सिमट गया

पश्चिम बंगाल और असम के ताजा विधानसभा चुनावी नतीजों ने भारतीय राजनीति की उस गहरी सच्चाई को उजागर कर दिया है जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा था। जहां एक तरफ हिमंता बिस्वा सरमा असम में ‘मियां’ शब्द का इस्तेमाल कर विपक्ष की वोटबैंक राजनीति को निशाने पर ले रहे थे, वहीं शुभेंदु अधिकारी बंगाल में ‘जय सनातन’ का नारा लगाकर हिंदू बहुल इलाकों में भावनाओं को छू रहे थे। यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं था। नतीजे बताते हैं कि ‘सेकुलरिज्म’ का झंडा उठाने वाली पार्टियां अब खास समुदाय के मुट्ठी भर इलाकों तक सिकुड़ गई हैं। कांग्रेस असम में और तृणमूल कांग्रेस बंगाल में मुस्लिम बहुल पॉकेट्स की कैद में फंस गई हैं।असम की 126 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस महज 19 सीटें जीत सकी। इनमें से 18 विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी गैर-मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस को लगभग पूरी तरह नकार दिया। गौरव गोगोई जैसी युवा चेहरों की हार इस बात का प्रमाण है कि पार्टी का आधार अब केवल एक खास वोटबैंक तक रह गया है। बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ को सिर्फ दो सीटों पर संतोष करना पड़ा, जबकि कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों ने टैक्टिकल वोटिंग के जरिए फायदा उठाया। मुस्लिम मतदाताओं ने अजमल को छोड़कर कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ मजबूत विकल्प माना, लेकिन इस प्रक्रिया में कांग्रेस ने अपना पुराना हिंदू और असमिया आधार लगभग गंवा दिया।

असम कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ते वक्त जो आरोप लगाए थे, वे अब नतीजों में साफ दिख रहे हैं। बोरा ने कहा था कि पार्टी मूल निवासियों की भावनाओं को नजरअंदाज कर एक खास वोटबैंक को खुश करने में लगी है। नतीजे इस फ्रस्ट्रेशन की पुष्टि करते हैं। असम में आइडेंटिटी पॉलिटिक्स हमेशा से चरम पर रही है। बंगाल की तरह यहां भी ‘सर्वधर्म समभाव’ का नारा अब ‘तुष्टिकरण’ के रूप में देखा जा रहा है। हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने डेलिमिटेशन के जरिए मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या घटाई, जिससे स्वदेशी समुदायों का वजन बढ़ा। नतीजा यह कि 103 सीटों पर अब मूल निवासी निर्णायक बन गए।बंगाल की तस्वीर और भी चौंकाने वाली है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से 27 से 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं को अपना सबसे मजबूत सहारा मानती रही। इस बार पार्टी ने 47 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और 32 ने जीत हासिल की। यह स्ट्राइक रेट शानदार लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि ये 32 विधायक टीएमसी के कुल विधायकों में करीब 40 फीसदी हिस्सा बनाते हैं। एक कथित सेकुलर पार्टी का इतना बड़ा हिस्सा एक ही समुदाय से आना खुद पार्टी की व्यापक स्वीकार्यता पर सवाल खड़ा करता है।

मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर-दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी पहले निर्विरोध दबदबा रखती थी। अब वहां भी सेंध लग गई है। मुस्लिम वोटरों में बिखराव साफ दिखा। हुमायूं कबीर, कांग्रेस के कुछ मुस्लिम उम्मीदवार और पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेकुलर फ्रंट जैसी ताकतें टीएमसी के एकाधिकार को चुनौती दे रही हैं। मुस्लिम मतदाता अब सिर्फ ‘बीजेपी के डर’ पर वोट नहीं देना चाहते। उन्हें लगता है कि जमीनी स्तर पर स्थानीय विकल्प बेहतर हो सकते हैं। इस बिखराव ने बीजेपी को मुस्लिम बहुल बेल्ट में भी सेंध लगाने का मौका दिया।दोनों राज्यों में एक समान पैटर्न दिखता है। जहां ‘सेकुलर’ पार्टियां मुस्लिम पॉकेट्स में सिमट गईं, वहीं बहुसंख्यक समुदाय में एक काउंटर पोलराइजेशन हुआ। बंगाल में बीजेपी ने हिंदू बहुल इलाकों में भारी बढ़त बनाई, जबकि असम में हिमंता सरकार ने पहले से ही स्वदेशी अस्मिता को मजबूत किया। ‘सेकुलरिज्म’ का भारतीय संस्करण अब कम्युनल रिप्रेजेंटेशन में बदलता जा रहा है। जब कोई पार्टी खुद को सेकुलर बताती है लेकिन उसका इलेक्टोरल बेस मुख्य रूप से एक समुदाय तक सीमित हो जाता है, तो वह दावा खोखला हो जाता है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। पिछले कुछ दशकों में ‘सेकुलरिज्म’ शब्द का मतलब जमीन पर तेजी से बदला है। पहले इसे सर्वधर्म समभाव के रूप में पेश किया जाता था। अब यह खास भौगोलिक इलाकों और खास वोटबैंक तक सिमट गया है। बंगाल में ममता बनर्जी की हिजाब वाली तस्वीरें, ईद पर दिए गए भाषण, सीएए-एनआरसी और वक्फ कानून का विरोध इन सबको बीजेपी ने एजेंडा बनाया। नतीजा यह कि हिंदू बहुल इलाकों में टीएमसी के प्रति नाराजगी बढ़ी और पार्टी मुस्लिम बेल्ट तक धकेल दी गई।असम में कांग्रेस का हाल और बदतर है। 19 में से 18 मुस्लिम विधायकों वाली पार्टी अब ‘मुस्लिम लीग’ जैसी छवि बन गई है। गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में से महज एक जीत सका। यह ध्रुवीकरण का स्पष्ट संकेत है। मुस्लिम मतदाता टैक्टिकल वोटिंग कर रहे हैं, लेकिन इससे कांग्रेस की व्यापक अपील खत्म हो गई है। अजमल के साथ कभी गठबंधन, कभी समझौता यह लव-हेट रिलेशनशिप भी अंततः कांग्रेस के लिए घातक साबित हुई।

ये नतीजे भारतीय राजनीति को एक सबक देते हैं। तुष्टिकरण की राजनीति का एक सैचुरेशन पॉइंट होता है। जब बहुसंख्यक समाज को लगता है कि सेकुलरिज्म उनके हितों की बलि चढ़ाकर एक वर्ग को खुश करने का माध्यम बन गया है, तो वे काउंटर पोलराइजेशन की ओर बढ़ते हैं। बंगाल और असम इसी चौराहे पर खड़े हैं। यहां वोटर अब या तो हिंदू है या मुस्लिम। बीच का ‘सेकुलर’ विकल्प लगभग गायब हो गया है।यह बदलाव सिर्फ दो राज्यों तक सीमित नहीं है। देश भर में वोटिंग पैटर्न में समान रुझान दिख रहे हैं। पार्टियां अब खुलकर अपनी असली पहचान स्वीकार कर रही हैं। भाजपा हिंदू बहुल आधार पर मजबूत हो रही है, जबकि विपक्षी दल मुस्लिम समर्थन पर निर्भर हो गए हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि एक समुदाय विशेष पर निर्भर राजनीति लंबे समय तक टिक नहीं पाती। व्यापक विकास, अस्मिता और स्थानीय मुद्दे अंततः निर्णायक बनते हैं। असम और बंगाल के इन नतीजों ने साबित कर दिया कि भारतीय मतदाता अब ‘सेकुलर’ शब्द के जाल में फंसने को तैयार नहीं है। वह जमीन पर उतरकर देख रहा है कि कौन सी पार्टी वाकई सबके लिए काम कर रही है। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति अब अपनी सीमा पर पहुंच गई है। इसके आगे का सफर या तो समावेशी विकास की ओर होगा या फिर और गहरे ध्रुवीकरण की ओर। फिलहाल नतीजे दूसरी दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं।

अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ
(ये लेखक के अपने स्वयं के निजी विचार हैं)

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