अमेरिका में व्यापार नीति को लेकर एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत अतिरिक्त वैश्विक आयात शुल्क को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। इस फैसले को ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस टैरिफ को लागू करने में जिस कानून का सहारा लिया गया, उसका उचित और वैध तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया। यह फैसला अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अदालत द्वारा सुनाया गया, जिसने 2-1 के बहुमत से सरकार के इस निर्णय को खारिज कर दिया। गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब अदालत ने ट्रंप प्रशासन के किसी फैसले पर सवाल उठाए हों; इससे पहले भी कई मामलों में न्यायपालिका ने प्रशासनिक निर्णयों के खिलाफ निर्णय दिए हैं। दरअसल, ट्रंप प्रशासन ने 24 फरवरी को एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए दुनिया भर से अमेरिका में आयात होने वाले कई उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की थी। सरकार का तर्क था कि इस कदम से अमेरिका के लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और घरेलू उद्योगों को संरक्षण मिलेगा। हालांकि, इस निर्णय का व्यापक विरोध हुआ। अमेरिका के 24 राज्यों की सरकारों के साथ-साथ कई छोटे और मध्यम व्यापारियों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि प्रशासन ने पुराने व्यापार कानूनों का गलत तरीके से इस्तेमाल करते हुए यह शुल्क लागू किया है। उनका आरोप था कि व्हाइट हाउस ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि पहले लगाए गए टैरिफ पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियों के बावजूद नए रास्ते से शुल्क लागू किया जा सके। सुनवाई के बाद अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 का गलत उपयोग किया। कोर्ट के अनुसार, इस धारा का इस्तेमाल केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, जैसे कि जब अमेरिका गंभीर भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा हो या डॉलर की कीमत में तेज गिरावट को रोकना अत्यंत आवश्यक हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं, जिनमें इस प्रावधान का सहारा लिया जाए। इसी आधार पर कोर्ट ने इन टैरिफ को कानूनी रूप से कमजोर और अवैध ठहराया।

सरकार को क्या निर्देश मिले?
अदालत ने अपने आदेश में सरकार को निर्देश दिया है कि वह पांच दिनों के भीतर इस फैसले का पालन सुनिश्चित करे। इसके साथ ही, उन आयातकों को राहत देने के लिए भी कहा गया है जिन्होंने यह अतिरिक्त शुल्क जमा किया था। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे आयातकों को भुगतान की गई अतिरिक्त राशि वापस करने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए। सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि अमेरिका का व्यापार घाटा लगातार बढ़कर लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जबकि चालू खाता घाटा भी GDP के करीब 4 प्रतिशत तक हो गया है। प्रशासन का कहना था कि यह स्थिति आर्थिक दृष्टि से चिंताजनक है और इसके समाधान के लिए यह कदम जरूरी था। हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों ने अदालत में इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका फिलहाल किसी गंभीर आर्थिक आपात स्थिति या भुगतान संकट का सामना नहीं कर रहा है। ऐसे में इस कानून का इस्तेमाल उचित नहीं ठहराया जा सकता। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी न्याय विभाग इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह मामला आगे और लंबा खिंच सकता है और व्यापार नीति को लेकर नई बहस छिड़ सकती है।

इन सेक्टरों पर टैरिफ जारी रहेंगे
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ट्रंप प्रशासन के लिए थोड़ी राहत की बात यह है कि स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पहले से लागू टैरिफ फिलहाल जारी रहेंगे। ये टैरिफ इस मामले के दायरे में शामिल नहीं थे, इसलिए अदालत के फैसले का इन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कुल मिलाकर, अमेरिकी अदालत का यह फैसला न केवल ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीतियों पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि आर्थिक फैसलों में कानूनी प्रावधानों का सही और सीमित उपयोग कितना महत्वपूर्ण है।






