दहेज प्रथा: कानून सख्त, लेकिन सोच अब भी पिछड़ी

जानिए Dowry Act में बदलाव और वर्तमान स्थिति

भारत में दहेज प्रथा एक ऐसी सामाजिक कुरीति है, जो समय के साथ खत्म होने के बजाय नए रूपों में आज भी समाज में गहराई से जड़ें जमाए हुए है। ‘दहेज लेना पाप है’ जैसे संदेश वर्षों से सुनने को मिलते रहे हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह प्रथा अब भी देश के कई हिस्सों में खुलेआम जारी है। आधुनिकता और समानता की बात करने वाले समाज में दहेज की मानसिकता महिलाओं के सम्मान और अधिकारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। हाल के वर्षों में दहेज उत्पीड़न और उससे जुड़ी मौतों के मामलों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। भोपाल की ट्विशा शर्मा, नोएडा की दीपिका नागर और कर्नाटक की ऐश्वर्या जैसे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दहेज की समस्या केवल ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी और शिक्षित समाज में भी उतनी ही गंभीर बनी हुई है। इन घटनाओं में पीड़ित महिलाओं के परिवारों ने ससुराल पक्ष पर दहेज के लिए मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं।

दहेज से जुड़ी भयावह घटनाएं
देशभर में समय-समय पर सामने आए मामलों से इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इंदौर में 2006 का चर्चित हत्या कांड हो या हाल ही में प्रयागराज, ग्रेटर नोएडा, ग्वालियर और लखनऊ के मामले हर घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कानून होने के बावजूद ऐसी घटनाएं क्यों नहीं रुक पा रही हैं। कई मामलों में महिलाओं को जिंदा जलाना, आत्महत्या के लिए मजबूर करना या संदिग्ध परिस्थितियों में मौत जैसी घटनाएं सामने आई हैं।

आंकड़े जो सच्चाई बयां करते हैं

  • राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 2,038 मामले सामने आए, जबकि बिहार दूसरे स्थान पर रहा जहां 1,078 मौतें दर्ज की गईं।
  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में देश में दहेज से जुड़ी 5,737 मौतें दर्ज की गईं। इसका अर्थ है कि प्रति एक लाख महिला आबादी पर लगभग 0.8 मौतें दहेज के कारण होती हैं।
  • इसके अलावा, 2017 से 2022 के बीच हर साल औसतन करीब 7,000 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़ी घटनाओं में हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामले सामाजिक दबाव या डर के कारण दर्ज ही नहीं हो पाते।

दहेज प्रथा की जड़ें कितनी गहरी

  • उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में दहेज से जुड़ी घटनाओं की अधिकता इस बात का संकेत है कि यह कुरीति अभी भी समाज में गहराई से समाई हुई है।
  • विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, 1960 से 2008 के बीच ग्रामीण भारत में हुई 40,000 शादियों में से लगभग 95% में दहेज का लेन-देन हुआ। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दहेज केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव और प्रतिष्ठा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
  • आज भी कई परिवार दहेज को ‘उपहार’ या ‘रिवाज’ का नाम देकर इसे सही ठहराने की कोशिश करते हैं। दुखद यह है कि कई जगहों पर लड़की की योग्यता और उपलब्धियों से ज्यादा उसकी ‘दहेज लाने की क्षमता’ को महत्व दिया जाता है।

Dowry Act और कानूनी प्रावधान
भारत में दहेज प्रथा को रोकने के लिए वर्ष 1961 में दहेज निषेध अधिनियम लागू किया गया था, जिसके बाद समय-समय पर इसमें संशोधन किए गए हैं ताकि इसे और प्रभावी बनाया जा सके। वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दहेज से जुड़े मामलों में सख्त प्रावधान हैं:

  • धारा 80 (दहेज मृत्यु): यदि शादी के 7 साल के भीतर किसी महिला की मृत्यु जलने, चोट या अन्य संदिग्ध परिस्थितियों में होती है और उससे पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया हो, तो इसे ‘दहेज मृत्यु’ माना जाता है।

सजा: कम से कम 7 साल की कैद, जो आजीवन कारावास तक बढ़ाई जा सकती है।

  • धारा 86 (क्रूरता): इसमें किसी महिला के साथ ऐसा व्यवहार शामिल है, जिससे उसे आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़े या उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचे।

इसमें दहेज की मांग को लेकर किया गया उत्पीड़न भी शामिल है। इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304B और 498A भी दहेज उत्पीड़न और क्रूरता से जुड़े मामलों में लागू होती रही हैं, जिन्हें अब नए कानूनों में समाहित किया गया है।

कानून बनाम सामाजिक मानसिकता
हालांकि कानून सख्त हैं, लेकिन समस्या का मूल कारण सामाजिक मानसिकता है। जांच प्रक्रियाओं में देरी, न्याय मिलने में लंबा समय और सामाजिक दबाव के कारण कई पीड़ित परिवार न्याय से वंचित रह जाते हैं। दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज में जागरूकता, शिक्षा और सोच में बदलाव बेहद जरूरी है। जब तक विवाह को आर्थिक लेन-देन से जोड़कर देखा जाएगा, तब तक यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाएगी।

दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकारों और सम्मान पर सीधा हमला है। कानूनों में सुधार और सख्ती के बावजूद, जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक ऐसी दर्दनाक घटनाएं सामने आती रहेंगी।

अब समय आ गया है कि दहेज को ‘परंपरा’ नहीं, बल्कि ‘अपराध’ के रूप में देखा जाए और इसके खिलाफ सामूहिक स्तर पर आवाज उठाई जाए।

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