किस्तों में ईंधन के दाम बढ़ा रही है केंद्र सरकार – राहुल गांधी

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव समाप्त होते ही सरकार योजनाबद्ध तरीके से किस्तों में ईंधन के दाम बढ़ाकर आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। राहुल गांधी ने कहा कि महज 10 दिनों के भीतर चौथी बार कीमतों में वृद्धि यह दर्शाती है कि सरकार जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ाने का काम कर रही है।


सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सरकार जानबूझकर ईंधन के दाम धीरे-धीरे बढ़ा रही है, ताकि लोगों पर इसका असर एक साथ न दिखे, लेकिन लगातार उनकी जेब पर भार बढ़ता रहे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछले कई महीनों से देश की आर्थिक स्थिति को लेकर चेतावनियां दी जा रही थीं, लेकिन नरेंद्र मोदी चुनावी व्यस्तताओं में उलझे रहे और चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल-डीजल के दामों में करीब 8 रुपये तक की बढ़ोतरी कर दी गई। इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमतों में हर बढ़ोतरी सीधे तौर पर आम आदमी के घरेलू बजट को प्रभावित करती है और इसका व्यापक असर पूरी अर्थव्यवस्था पर देखने को मिलता है। खड़गे ने आरोप लगाया कि किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी और उद्योग से जुड़े लोग—सभी भाजपा सरकार की नीतियों के कारण बढ़ती महंगाई का बोझ उठा रहे हैं।

पिछले दिनों में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी
हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार इजाफा दर्ज किया गया है। 15 मई को पेट्रोल और डीजल के दामों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। इसके बाद 19 मई को 90 पैसे प्रति लीटर का इजाफा हुआ। वहीं 23 मई को पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा कर दिया गया। इस तरह कम समय में बार-बार हुई बढ़ोतरी ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है। इसका सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ रहा है। लगातार बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों से परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत में इजाफा होने की आशंका है, जिससे खुदरा महंगाई बढ़ सकती है। ऐसे में आम लोगों के मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ने के साथ-साथ व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

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