नीट री-एग्जाम से पहले टेलीग्राम पर प्रतिबंध को लेकर विशेषज्ञों के बीच मतभेद

टेलीग्राम पर प्रतिबंध को लेकर आईआईटी कानपुर के निदेशक, सार्थक और निसर्ग की एक्स पर तकरार

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा नीट यूजी 2026 को लेकर एक बार फिर विवाद और चर्चाएं तेज हो गई हैं। 3 मई को आयोजित परीक्षा के निरस्त होने के बाद अब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने 21 जून को पुनः परीक्षा कराने का निर्णय लिया है। इसी बीच पेपर लीक और फर्जी सूचनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से सरकार ने 22 जून तक टेलीग्राम ऐप पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि इस फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एनटीए का कहना है कि टेलीग्राम पर रोक लगाने का मुख्य उद्देश्य पेपर लीक से जुड़ी अफवाहों और झूठे दावों को फैलने से रोकना है। एजेंसी के अनुसार, परीक्षा से पहले इस तरह की भ्रामक सूचनाएं छात्रों में अनावश्यक भय और भ्रम पैदा करती हैं। लेकिन इस निर्णय पर सोशल मीडिया और विशेषज्ञों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल माध्यमों के उपयोग पर अनावश्यक नियंत्रण के रूप में देख रहे हैं।

आईआईटी कानपुर के निदेशक की चिंता
आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि समस्या केवल पेपर लीक की नहीं है, बल्कि उससे भी अधिक गंभीर मुद्दा ‘फर्जी लीक’ की खबरों का तेजी से फैलना है। उन्होंने बताया कि पहले भी जेईई एडवांस्ड के दौरान इस प्रकार की भ्रामक सूचनाएं फैलाकर छात्रों को भ्रमित किया गया था। उनके अनुसार, टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग इस तरह की नकली जानकारी को विश्वसनीय रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जा सकता है, जिससे परीक्षा की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है। प्रो. अग्रवाल ने अपने जवाब में दावा किया कि टेलीग्राम में पोस्ट को बिना स्पष्ट एडिट हिस्ट्री दिखाए बदला जा सकता है, जिससे फर्जी जानकारी को विश्वसनीय रूप दिया जा सकता है। हालांकि, सार्थक सिद्धांत ने इसका खंडन करते हुए स्क्रीनशॉट साझा किया और बताया कि टेलीग्राम पर भी एडिट किए गए संदेश पर ‘एडिटेड’ का टैग दिखाई देता है। उन्होंने इसे गलत जानकारी बताते हुए कहा कि ऐसे आधार पर किसी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता।

टेलीग्राम फीचर को लेकर विवाद

खुद को एथिकल हैकर बताने वाले निसर्ग अधिकारी ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि टेलीग्राम को पूरी तरह ब्लॉक करना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। उन्होंने दावा किया कि यूजर्स आसानी से प्रॉक्सी और अन्य तकनीकों के माध्यम से इस प्रतिबंध को बायपास कर सकते हैं। उनके अनुसार, “जब पेपर लीक नहीं रोका जा सका, तो अब टेलीग्राम पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, जो व्यावहारिक समाधान नहीं है।” इस बहस में 18 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत भी शामिल हुए और उन्होंने सरकार के फैसले की तार्किकता पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि यदि किसी प्लेटफॉर्म पर गलत जानकारी फैलने की संभावना है, तो क्या उसे बंद कर देना उचित है? उन्होंने सवाल किया कि “क्या व्हाट्सएप या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी खबरें नहीं फैलतीं? फिर केवल टेलीग्राम को ही निशाना क्यों बनाया गया?” सार्थक ने आगे तर्क देते हुए कहा कि यदि गलत सूचना ही आधार है, तो फिर ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म को भी बंद कर देना चाहिए, क्योंकि वहां भी भ्रामक जानकारी तेजी से फैलती है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि “क्या असहमति जताने वाले हर माध्यम को बंद कर देना ही समाधान है?

”गौरतलब है कि निसर्ग अधिकारी हाल ही में आईआईटी कानपुर के साइबर सिक्योरिटी एवं साइबर डिफेंस इनोवेशन सेंटर में अनुबंध के आधार पर थ्रेट इंटेलिजेंस इंजीनियर के रूप में जुड़े हैं। वहीं, सार्थक सिद्धांत पहले भी सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली में कथित खामियों को उजागर कर चर्चा में आ चुके हैं। टेलीग्राम पर लगाया गया प्रतिबंध फिलहाल एक अस्थायी कदम है, लेकिन इसने डिजिटल स्वतंत्रता, सूचना नियंत्रण और तकनीकी व्यवहार्यता जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक बहस छेड़ दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार आगे इस दिशा में क्या कदम उठाती है और क्या यह प्रतिबंध वास्तव में अपने उद्देश्य को पूरा कर पाता है।

विशिखा मीडिया

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